व्रत कथा संग्रह
करवा चौथ, अहोई अष्टमी, तीज, एकादशी, सत्यनारायण, प्रदोष और सोमवार से शनिवार तक के व्रतों की पूरी कथा, पूजा विधि और नियम — सरल हिंदी में, हर कथा के साथ उस व्रत की इस साल की तिथि का लिंक।
त्योहारों की व्रत कथाएँ
- अहोई अष्टमी व्रत कथा: साहूकारनी और स्याहू की कहानी, पूजा विधिअहोई अष्टमी कार्तिक कृष्ण अष्टमी को माताएँ संतान की लंबी उम्र के लिए रखती हैं। इसकी कथा उस साहूकारनी की है जिसकी कुदाल से अनजाने में स्याहू का बच्चा मर गया था; उसने अहोई माता का व्रत रखकर प्रायश्चित किया और तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोलने की परंपरा चली।
- अनंत चतुर्दशी व्रत कथा: सुशीला, कौण्डिन्य और चौदह गाँठों वाला अनंत सूत्रअनंत चतुर्दशी भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को आती है, जब भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा करके चौदह गाँठों वाला अनंत सूत्र बाँधा जाता है। भविष्य पुराण की कथा में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को सुशीला और कौण्डिन्य का प्रसंग सुनाकर बताते हैं कि यह व्रत खोया हुआ सुख और वैभव लौटाता है।
- भाई दूज की कथाभाई दूज कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाया जाता है, जब बहनें भाई को तिलक करके भोजन कराती हैं और उसकी लंबी उम्र माँगती हैं। कथा के अनुसार इसी दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर गए थे और वरदान दिया था कि इस दिन बहन के घर तिलक कराने वाले भाई को यम का भय नहीं रहेगा।
- छठ पूजा व्रत कथाछठ पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का चार दिन का व्रत है, जिसमें डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। कथा के अनुसार षष्ठी देवी ने निःसंतान राजा प्रियव्रत के मृत पुत्र को जीवन दिया था, तभी से संतान की कामना और रक्षा के लिए यह व्रत रखा जाता है।
- धनतेरस की कथाधनतेरस कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को मनाई जाती है और यहीं से दीपावली का पाँच दिन का पर्व शुरू होता है। इसकी कथा राजा हिम के पुत्र की है, जिसकी पत्नी ने दीयों और गहनों के ढेर से यमराज को लौटा दिया; इसी कारण इस शाम घर के बाहर दक्षिण दिशा में यमदीप जलाया जाता है।
- गणेश चतुर्थी व्रत कथा: गणेश जन्म, चंद्र दर्शन दोष और स्यमंतक मणिगणेश चतुर्थी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मनाई जाती है, जिस दिन माता पार्वती के पुत्र गणेश जी का जन्मोत्सव होता है। इस दिन चंद्रमा देखना वर्जित है, क्योंकि गणेश जी ने चंद्र को शाप दिया था; भूल से चंद्र दिख जाए तो श्रीकृष्ण की स्यमंतक मणि कथा सुनने से कलंक दोष दूर माना जाता है।
- गणगौर व्रत कथागणगौर चैत्र शुक्ल तृतीया को ईसर (शिव) और गौर (पार्वती) की पूजा का पर्व है, जिसकी पूजा होली के अगले दिन से 16-18 दिन चलती है। कथा में माता पार्वती गाँव की स्त्रियों को सुहाग रस छिड़ककर अखंड सौभाग्य का वरदान देती हैं।
- हरियाली तीज कथा: 108 जन्मों का तप और सावन में शिव-पार्वती मिलनहरियाली तीज सावन शुक्ल तृतीया को मनाई जाती है। कथा के अनुसार पार्वती ने 107 जन्मों तक तप किया और 108वें जन्म में हिमालय की पुत्री बनकर कठोर तपस्या की, जिसके बाद सावन की इसी तीज पर शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।
- हरतालिका तीज व्रत कथा: सखियों द्वारा पार्वती का हरण और बालू का शिवलिंगहरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल तृतीया को रखी जाती है। कथा के अनुसार पार्वती की सखियाँ उन्हें जंगल ले गईं ताकि पिता उनका विवाह विष्णु से न कर दें; वहाँ बालू का शिवलिंग बनाकर निर्जल व्रत और रात्रि जागरण करने पर शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।
- होलिका दहन की कथा: भक्त प्रह्लाद, होलिका और भगवान नृसिंहहोलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की रात, भद्रा रहित प्रदोष काल में किया जाता है, और अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है। कथा के अनुसार हिरण्यकशिपु की बहन होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठी, पर होलिका जल गई और विष्णु भक्त प्रह्लाद सुरक्षित बच गए।
- कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा: कंस का कारागार, यमुना पार और गोकुलकृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को मनाई जाती है। कथा के अनुसार इसी रात रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में देवकी और वसुदेव के आठवें पुत्र श्रीकृष्ण जन्मे और वसुदेव उन्हें यमुना पार कर गोकुल में नंद-यशोदा के घर छोड़ आए।
- जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत कथाजितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत आश्विन कृष्ण अष्टमी को माताएँ संतान की लंबी उम्र के लिए निर्जला रखती हैं। इसमें राजा जीमूतवाहन की कथा सुनी जाती है, जिन्होंने एक नाग बालक की जान बचाने के लिए खुद को गरुड़ के सामने रख दिया था।
- कजरी तीज व्रत कथा: गरीब ब्राह्मण और सत्तू की कहानी, नीमड़ी पूजाकजरी तीज (बड़ी या सातुड़ी तीज) भाद्रपद कृष्ण तृतीया को मनाई जाती है। इसकी कथा उस गरीब ब्राह्मण की है जो पत्नी के व्रत के लिए साहूकार की दुकान से सत्तू बनाकर ले जाते पकड़ा गया और अपनी सच्चाई से साहूकार का मन जीत लिया; व्रत नीमड़ी पूजा और चंद्र अर्घ्य के बाद सत्तू से खोला जाता है।
- करवा चौथ व्रत कथा: वीरावती और सात भाइयों की कहानी, पूजा विधिकरवा चौथ कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को सुहागिनें पति की लंबी उम्र के लिए निर्जल रखती हैं। शाम की पूजा में वीरावती की कथा सुनी जाती है, जिसके भाइयों ने छलनी के पीछे दीया दिखाकर नकली चाँद से उसका व्रत तुड़वा दिया था, और रात को असली चाँद को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है।
- महाशिवरात्रि व्रत कथा: शिकारी चित्रभानु और बेल का पेड़महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात मनाई जाती है। इसकी मुख्य कथा शिकारी चित्रभानु की है, जिसने भूखे-प्यासे रहकर रात भर बेल के पेड़ पर जागते हुए अनजाने में शिवलिंग पर बेलपत्र और जल चढ़ाया और शिव की कृपा से मुक्ति पाई।
- मंगला गौरी व्रत कथामंगला गौरी व्रत सावन मास के हर मंगलवार को सुहागिनें, खासकर नवविवाहिताएँ, पति की लंबी उम्र और सुखी दांपत्य के लिए रखती हैं। कथा में सेठ धर्मपाल का अल्पायु पुत्र अपनी पत्नी के मंगला गौरी व्रत के पुण्य से सौ वर्ष की आयु पाता है।
- नाग पंचमी व्रत कथा: किसान, नागिन और बेटी की भक्तिनाग पंचमी सावन शुक्ल पंचमी को नाग देवता की पूजा का पर्व है। इसकी प्रचलित कथा में एक किसान के हल से नाग के बच्चे मर जाते हैं, क्रोधित नागिन उसके परिवार को डस लेती है, पर किसान की बेटी की सच्ची नाग पूजा से प्रसन्न होकर वह सबको फिर जीवित कर देती है।
- रक्षाबंधन की कथा: इंद्राणी का रक्षा सूत्र और राजा बलि को लक्ष्मी जी की राखीरक्षाबंधन श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाता है, जब बहनें भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधती हैं। भविष्य पुराण के अनुसार सबसे पहले इंद्राणी ने देव-असुर युद्ध में इंद्र को रक्षा सूत्र बाँधा था, और एक दूसरी कथा में लक्ष्मी जी ने राजा बलि को राखी बाँधकर भगवान विष्णु को वैकुंठ लौटाया।
- ऋषि पंचमी व्रत कथा: उत्तंक ब्राह्मण की बेटी की कहानी और सप्तर्षि पूजाऋषि पंचमी भाद्रपद शुक्ल पंचमी को सप्तर्षियों और अरुंधती की पूजा का शुद्धि-व्रत है। इसकी कथा विदर्भ के उत्तंक ब्राह्मण की बेटी की है, जिसने पिता के कहने पर यह व्रत रखकर अनजाने में हुई भूलों का प्रायश्चित किया और कष्ट से मुक्ति पाई।
- सकट चौथ व्रत कथा: कुम्हार का आवा और बुढ़िया माई के बेटे की कहानीसकट चौथ माघ कृष्ण चतुर्थी को माताएँ संतान की रक्षा के लिए रखती हैं। कथा के अनुसार कुम्हार के आवे में बलि के लिए बिठाए गए बुढ़िया के इकलौते बेटे को सकट माता और गणेश जी ने बचा लिया; पूजा में तिलकुट चढ़ता है और चाँद को अर्घ्य देकर व्रत खुलता है।
- शरद पूर्णिमा व्रत कथा: साहूकार की दो बेटियाँ, चाँदनी की खीर और कोजागरी लक्ष्मीशरद पूर्णिमा आश्विन महीने की पूर्णिमा है, जब रात भर चाँदनी में खीर रखकर सुबह प्रसाद के रूप में खाई जाती है और कोजागरी लक्ष्मी पूजा होती है। व्रत कथा में साहूकार की बड़ी बेटी ने पूर्णिमा का व्रत पूरा रखा और छोटी ने अधूरा, जिसका फल दोनों को अलग-अलग मिला; इसी से पूरा व्रत रखने की सीख मिलती है।
- शीतला अष्टमी (बसौड़ा) व्रत कथाशीतला अष्टमी, जिसे बसौड़ा भी कहते हैं, चैत्र कृष्ण अष्टमी को मनाई जाती है। इस दिन चूल्हा नहीं जलता और शीतला माता को एक दिन पहले बना ठंडा भोजन चढ़ाया जाता है; कथा में ठंडा भोग देने वाली एक बूढ़ी माई का घर आग से बच जाता है।
- तुलसी विवाह की कथा: वृंदा, जालंधर और शालिग्राम भगवानतुलसी विवाह कार्तिक शुक्ल एकादशी या द्वादशी को, देवउठनी एकादशी के आसपास, शालिग्राम रूप भगवान विष्णु और तुलसी माता का विवाह कराकर मनाया जाता है। कथा के अनुसार पतिव्रता वृंदा ने विष्णु को पत्थर बनने का श्राप दिया और उसकी देह से तुलसी उगी; विष्णु ने उसे हर साल विवाह का वचन दिया।
- वट सावित्री व्रत कथा: सावित्री, सत्यवान और यमराजवट सावित्री व्रत उत्तर भारत में ज्येष्ठ अमावस्या को और महाराष्ट्र-गुजरात में ज्येष्ठ पूर्णिमा (वट पूर्णिमा) को रखा जाता है। कथा के अनुसार सावित्री ने बरगद के नीचे यमराज का पीछा करके, अपनी बुद्धि और पतिव्रत से पति सत्यवान के प्राण लौटा लिए थे।
एकादशी व्रत कथाएँ
- देवउठनी एकादशी व्रत कथा: भगवान विष्णु का जागना और तुलसी विवाहदेवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी कार्तिक शुक्ल एकादशी को आती है, जब चार महीने की योगनिद्रा के बाद भगवान विष्णु जागते हैं और चातुर्मास पूरा होता है। कथा के अनुसार माता लक्ष्मी के आग्रह पर भगवान ने हर साल चार महीने सोने का नियम बनाया; इसी दिन से विवाह आदि शुभ काम फिर शुरू होते हैं और तुलसी विवाह किया जाता है।
- देवशयनी एकादशी व्रत कथा: राजा मान्धाता और चातुर्मास की शुरुआतदेवशयनी एकादशी आषाढ़ शुक्ल एकादशी को आती है; इसी दिन से भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में जाते हैं और चातुर्मास शुरू होता है। इसकी कथा में तीन साल के अकाल से परेशान राजा मान्धाता ने अंगिरा ऋषि के कहने पर प्रजा के साथ यह व्रत रखा और राज्य में फिर से वर्षा हुई।
- एकादशी व्रत कथा: एकादशी माता का जन्म, व्रत के नियम और पारणएकादशी व्रत की मूल कथा उत्पन्ना एकादशी से जुड़ी है: मुर दैत्य से लड़ते-लड़ते योगनिद्रा में गए भगवान विष्णु के शरीर से एक देवी प्रकट हुईं, जिन्होंने दैत्य का वध किया और एकादशी कहलाईं। यह व्रत हर महीने दोनों पक्षों की ग्यारहवीं तिथि को रखा जाता है और अगले दिन द्वादशी को पारण होता है।
- मोक्षदा एकादशी व्रत कथा: राजा वैखानस और पितरों की मुक्तिमोक्षदा एकादशी मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को आती है और इसी दिन गीता जयंती भी मनाई जाती है। कथा के अनुसार राजा वैखानस ने सपने में अपने पिता को कष्ट में देखा और पर्वत मुनि के कहने पर यह व्रत रखकर उसका पुण्य पिता को अर्पित किया, जिससे उन्हें मुक्ति मिली।
- निर्जला एकादशी व्रत कथा: भीमसेन और महर्षि व्यास की कहानीनिर्जला एकादशी ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को रखी जाती है। कथा के अनुसार भूख न सह पाने वाले भीमसेन को महर्षि व्यास ने बताया कि इस एक दिन बिना जल और अन्न के व्रत रखने से साल की सभी एकादशियों का पुण्य मिल जाता है, इसलिए इसे भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं।
- पापमोचनी एकादशी व्रत कथा: मेधावी ऋषि और अप्सरा मंजुघोषापापमोचनी एकादशी चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी को, होली और चैत्र नवरात्रि के बीच आती है। कथा में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी का तप अप्सरा मंजुघोषा के कारण भंग हुआ; क्रोध में उन्होंने उसे पिशाचिनी होने का श्राप दिया, और फिर इसी एकादशी के व्रत से दोनों अपने-अपने पाप से मुक्त हुए।
मासिक व्रत कथाएँ
- प्रदोष व्रत कथा: ब्राह्मणी, राजकुमार धर्मगुप्त और वार अनुसार प्रदोषप्रदोष व्रत हर महीने दोनों पक्षों की त्रयोदशी को सूर्यास्त के समय शिवजी की पूजा के साथ रखा जाता है। इसकी कथा स्कन्द पुराण की है, जिसमें प्रदोष व्रत के प्रभाव से एक गरीब ब्राह्मणी के पाले हुए राजकुमार धर्मगुप्त को अपना खोया राज्य वापस मिलता है।
- पूर्णिमा व्रत कथा: धनेश्वर ब्राह्मण, देवदास और बत्तीस पूर्णिमा का व्रतपूर्णिमा व्रत हर महीने शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को स्नान-दान, विष्णु पूजा और रात को चंद्र अर्घ्य के साथ रखा जाता है। घरों में इसकी सबसे प्रचलित कथा धनेश्वर ब्राह्मण के बेटे देवदास की है, जिसके प्राण माँ के बत्तीस पूर्णिमा व्रत से बचे।
- संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा: शिव-पार्वती की चौपड़ और गणेश व्रतसंकष्टी चतुर्थी हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी के लिए रखा जाने वाला व्रत है, जो रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर खोला जाता है। इसकी प्रचलित कथा में शिव-पार्वती की चौपड़ के निर्णायक बालक को गणेश व्रत से शाप से मुक्ति मिलती है।
- श्री सत्यनारायण व्रत कथा: पाँचों अध्याय, प्रसाद और पूजा विधिसत्यनारायण व्रत कथा स्कन्द पुराण के रेवा खंड की पाँच अध्यायों वाली कथा है, जो ज़्यादातर पूर्णिमा या किसी शुभ अवसर पर शाम को सुनी जाती है। इसका सार है सत्य पर टिके रहना, मन्नत को न टालना और प्रसाद का आदर करना।
वार के व्रत
- बुधवार व्रत कथा: बुधवार को पत्नी की विदाई और हमशक्ल बुध देवबुधवार का व्रत बुध ग्रह और भगवान गणेश के लिए रखा जाता है, जिसमें हरे वस्त्र, हरी मूंग और दूर्वा की पूजा होती है। इसकी कथा उस पति की है जो मना करने पर भी बुधवार को पत्नी को विदा कराकर ले गया और रास्ते में उसका हमशक्ल बनकर बुध देव प्रकट हुए।
- बृहस्पतिवार व्रत कथा: दान से चिढ़ने वाली रानी, साधु और दासी की कहानीबृहस्पतिवार का व्रत देवगुरु बृहस्पति और भगवान विष्णु के लिए रखा जाता है, जिसमें पीले वस्त्र, चने की दाल, गुड़ और केले के पेड़ की पूजा होती है। इसकी कथा उस रानी की है जिसने दान से ऊबकर अपना वैभव गँवाया और व्रत से उसे फिर पाया।
- मंगलवार व्रत कथा: हनुमान जी, ब्राह्मण दंपती और बालक मंगलियामंगलवार का व्रत हनुमान जी के लिए रखा जाता है और लगातार 21 मंगलवार करने की परंपरा है। इसकी कथा एक निःसंतान ब्राह्मण दंपती की है, जिन्हें हनुमान जी की कृपा से पुत्र मंगल मिला और जिनके संदेह को स्वयं बजरंगबली ने दूर किया।
- रविवार व्रत कथा: सूर्य देव, गोबर से लीपने वाली बुढ़िया और ईर्ष्यालु पड़ोसनरविवार का व्रत सूर्य देव के लिए रखा जाता है, जिसमें सुबह ताँबे के लोटे से अर्घ्य, लाल चंदन-लाल फूल की पूजा और दिन में एक बार बिना नमक का भोजन होता है। इसकी कथा एक भक्त बुढ़िया की है, जिसे पड़ोसन की जलन के बावजूद सूर्य देव ने सोने का गोबर देने वाली गाय दी।
- शनिवार व्रत कथा: शनि देव और राजा विक्रमादित्य की कहानीशनिवार का व्रत शनि देव की प्रसन्नता और साढ़ेसाती-ढैया की पीड़ा शांत करने के लिए रखा जाता है। इसकी प्रसिद्ध कथा राजा विक्रमादित्य की है, जिन्होंने शनि को सबसे छोटा आसन देकर साढ़ेसाती के कष्ट झेले और आख़िरकार शनि देव की कृपा पाई।
- शुक्रवार संतोषी माता व्रत कथा: छोटी बहू की श्रद्धा और गुड़-चने का व्रतसंतोषी माता का व्रत 16 शुक्रवार तक गुड़-चने के भोग के साथ रखा जाता है और उस दिन खट्टी चीज़ बिल्कुल नहीं खाई जाती। इसकी लोककथा उस छोटी बहू की है जिसका पति परदेस में उसे भूल गया था और जो इसी व्रत से फिर सुहागिन सुख पा सकी।
- सोलह सोमवार व्रत कथा: अमरपुरी का पुजारी, चौसर और सोलह सोमवारसोलह सोमवार व्रत लगातार सोलह सोमवार शिव-पार्वती के लिए रखा जाता है और सत्रहवें सोमवार को चूरमे से उद्यापन होता है। इसकी कथा अमरपुरी के उस पुजारी से शुरू होती है, जो पार्वती जी के शाप से रोगी हुआ और अप्सराओं के बताए इस व्रत से ठीक हुआ।
- सोमवार व्रत कथा: साहूकार का बेटा, बारह वर्ष की आयु और शिव कृपासोमवार व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के लिए हर सोमवार रखा जाता है, ख़ासकर सावन और कार्तिक में। इसकी कथा में शिवजी के वरदान से जन्मे साहूकार के बेटे की बारह वर्ष की आयु पूरी होने पर पार्वती जी के आग्रह से उसे फिर जीवन मिलता है।
