सोलह सोमवार व्रत कथा: अमरपुरी का पुजारी, चौसर और सोलह सोमवार
संक्षेप में:सोलह सोमवार व्रत लगातार सोलह सोमवार शिव-पार्वती के लिए रखा जाता है और सत्रहवें सोमवार को चूरमे से उद्यापन होता है। इसकी कथा अमरपुरी के उस पुजारी से शुरू होती है, जो पार्वती जी के शाप से रोगी हुआ और अप्सराओं के बताए इस व्रत से ठीक हुआ।
सोलह सोमवार का व्रत लगातार सोलह सोमवार तक भगवान शिव और माता पार्वती के लिए रखा जाता है, और सत्रहवें सोमवार को चूरमे के प्रसाद के साथ उद्यापन होता है। ज़्यादातर लोग इसे सावन के पहले सोमवार से शुरू करते हैं; चैत्र, वैशाख, कार्तिक या मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष के पहले सोमवार से भी संकल्प लिया जाता है। कुँवारी लड़कियाँ मनचाहे जीवनसाथी के लिए और विवाहित लोग घर की सुख-शांति, संतान या किसी बड़ी परेशानी से छुटकारे के लिए यह व्रत रखते हैं। यह साधारण सोमवार व्रत से अलग और कुछ कठिन नियम वाला व्रत है।
सोलह सोमवार व्रत कथा
एक बार भगवान शिव और माता पार्वती घूमते हुए मृत्युलोक में अमरपुरी नाम की नगरी में पहुँचे। वहाँ के राजा ने शिवजी का एक भव्य मंदिर बनवाया था। मंदिर की सुंदरता देखकर शिव-पार्वती कुछ दिन वहीं ठहर गए।
एक दिन पार्वती जी ने कहा, "आइए, चौसर खेलते हैं।" खेल शुरू हुआ ही था कि मंदिर का पुजारी पूजा करने आ गया। पार्वती जी ने उससे पूछा, "पुजारी जी, बताइए, इस खेल में कौन जीतेगा?" पुजारी ने बिना सोचे कह दिया, "महादेव जी ही जीतेंगे।" खेल हुआ और जीत पार्वती जी की हुई। पुजारी की इस बिना विचारे कही बात पर पार्वती जी नाराज़ हुईं और उन्होंने उसे कोढ़ी होने का शाप दे दिया। शिवजी ने कुछ नहीं कहा और दोनों कैलास लौट गए।
पुजारी का शरीर रोग से भर गया। लोग उससे दूर रहने लगे और वह बड़े कष्ट में दिन काटने लगा। कुछ समय बाद स्वर्ग की कुछ अप्सराएँ शिवजी की पूजा करने उसी मंदिर में आईं। पुजारी की हालत देखकर उन्होंने कारण पूछा। पुजारी ने सारी बात सच-सच बता दी।
अप्सराओं ने कहा, "आप सोलह सोमवार का व्रत कीजिए। हर सोमवार स्नान करके साफ़ कपड़े पहनिए, आधा सेर गेहूँ का आटा लेकर घी और गुड़ के साथ उसके तीन अंगाकड़े (मोटी रोटियाँ) बनाइए। शाम को दीप, नैवेद्य, बेलपत्र, जनेऊ, चंदन, अक्षत और फूल से शिवजी की पूजा कीजिए। एक अंगाकड़ा शिवजी को चढ़ाइए, बाकी प्रसाद के रूप में बाँटिए और स्वयं भी लीजिए। सोलह सोमवार पूरे होने पर सत्रहवें सोमवार को सवा सेर आटे का चूरमा बनाकर भोग लगाइए और सबको बाँटिए।" इतना कहकर वे स्वर्ग लौट गईं।
पुजारी ने पूरी श्रद्धा से यह व्रत किया और शिवजी की कृपा से उसका रोग दूर हो गया। कुछ दिन बाद शिव-पार्वती फिर उसी मंदिर में आए। पुजारी को स्वस्थ देखकर पार्वती जी ने अचरज से पूछा कि शाप से छुटकारा कैसे मिला। पुजारी ने सोलह सोमवार के व्रत की बात बताई।
उन दिनों पार्वती जी के पुत्र कार्तिकेय उनसे रूठकर दूर चले गए थे। पार्वती जी ने भी सोलह सोमवार का व्रत किया, और व्रत पूरा होते ही कार्तिकेय स्वयं माँ के पास लौट आए। उन्होंने पूछा, "माँ, ऐसा क्या किया कि मेरा मन आपकी ओर खिंच आया?" पार्वती जी ने उन्हें इस व्रत के बारे में बताया।
कार्तिकेय का एक ब्राह्मण मित्र बहुत दिनों से परदेस गया हुआ था और उसकी कोई ख़बर न थी। कार्तिकेय ने मित्र से मिलने की इच्छा से यह व्रत किया, और व्रत पूरा होते ही वह मित्र लौट आया। मित्र ने भी पूरी बात जानी और विवाह की कामना से सोलह सोमवार का व्रत किया।
व्रत के बाद वह घूमते हुए एक नगर में पहुँचा, जहाँ राजा ने अपनी बेटी का स्वयंवर रखा था। राजा की शर्त थी कि सजी हुई हथिनी जिसके गले में वरमाला डालेगी, उसी से राजकुमारी का विवाह होगा। हथिनी ने भीड़ में से उस ब्राह्मण के गले में माला डाल दी। राजा ने धूमधाम से विवाह किया और बहुत-सा धन देकर विदा किया।
राजकुमारी ने एक दिन पति से पूछा कि ऐसा कौन-सा पुण्य था जिससे हथिनी ने उन्हें चुना। ब्राह्मण ने सोलह सोमवार के व्रत की बात बताई। राजकुमारी ने संतान की कामना से यह व्रत किया और उसके घर एक सुंदर, गुणी बेटा हुआ। बड़े होकर बेटे ने भी यह व्रत किया, और उसके प्रभाव से एक निःसंतान राजा के दूतों ने उसे अपनी राजकुमारी के लिए चुना। राजा के देहांत के बाद वही युवक उस राज्य का राजा बना।
रानी का अहंकार और व्रत से वापसी
राजा बनने के बाद भी वह युवक सोलह सोमवार का नियम निभाता रहा। एक सोमवार उसने रानी से पूजा की सामग्री लेकर मंदिर चलने को कहा। रानी ने इसे छोटा काम समझा और ख़ुद न जाकर दासियों के हाथ सामग्री भेज दी। पूजा के बाद आकाशवाणी हुई कि जब तक यह रानी महल में है, राजा का कल्याण नहीं होगा। दुखी मन से राजा ने रानी को महल से निकाल दिया।
रानी भूखी-प्यासी भटकने लगी। कथा में आता है कि वह जहाँ भी जाती, वहाँ कुछ न कुछ बिगड़ जाता: बुढ़िया का सूत उड़ जाता, तेली के घड़े चटक जाते, नदी का पानी सूख जाता। आख़िर वह एक मंदिर में पहुँची, जहाँ के पुजारी (गुसाईं) ने उसे बेटी की तरह आश्रय दिया। रानी की दशा देखकर पुजारी ने समझ लिया कि यह शिव-अपराध का फल है और उसे सोलह सोमवार का व्रत करने को कहा। रानी ने सच्चे मन से व्रत किया। सत्रहवें सोमवार को राजा के मन में रानी की याद जागी, उसके दूत उसे ढूँढ़ते हुए मंदिर तक पहुँचे और राजा आदर से रानी को महल ले आया। उसके बाद दोनों ने मिलकर जीवन भर यह व्रत निभाया।
सोलह सोमवार पूजा विधि
- सावन या किसी शुभ महीने के शुक्ल पक्ष के पहले सोमवार को स्नान करके सोलह सोमवार का संकल्प लें।
- दिन भर उपवास रखें। शाम को प्रदोष के समय दोबारा स्नान करके पूजा की तैयारी करें।
- शिवलिंग पर जल, दूध और गंगाजल से अभिषेक करें; बेलपत्र, धतूरा, जनेऊ, सफ़ेद चंदन, अक्षत और फूल चढ़ाएँ। माता पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित करें।
- आधा सेर (लगभग आधा किलो) गेहूँ के आटे में घी-गुड़ मिलाकर तीन अंगाकड़े या चूरमा बनाएँ। एक भाग शिवजी को भोग लगाएँ, दूसरा प्रसाद में बाँटें, तीसरा स्वयं ग्रहण करें।
- घी का दीपक जलाकर सोलह सोमवार व्रत कथा सुनें और शिवजी की आरती करें।
- सत्रहवें सोमवार को सवा सेर आटे का चूरमा बनाकर शिव-पार्वती की पूजा करें, परिवार और पड़ोस में प्रसाद बाँटें और व्रत का उद्यापन करें।
नियम और सावधानियाँ
- परंपरा में व्रत वाले दिन केवल प्रसाद का अपना भाग ही खाया जाता है; स्वास्थ्य के हिसाब से फल-दूध लेना हो तो अपने घर की रीति के अनुसार करें।
- हर सोमवार पूजा का समय और स्थान एक ही रखने की कोशिश करें।
- पूजा का काम किसी और पर न टालें; कथा की रानी की भूल से यही सीख मिलती है।
- सोलह में से कोई सोमवार छूट जाए तो उसकी जगह अगला सोमवार जोड़कर गिनती पूरी करें।
सोलह सोमवार का उद्यापन बहुत से लोग महाशिवरात्रि या सावन के अंतिम सोमवार के आसपास रखते हैं। पूजा के बाद ॐ जय शिव ओंकारा गाएँ और शिव चालीसा पढ़ें। शिवरात्रि की कथा महाशिवरात्रि व्रत कथा में है, मासिक शिवरात्रि की तिथियाँ कैलेंडर में हैं, और आज का वार-तिथि पंचांग पर देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सोलह सोमवार व्रत कब से शुरू करें?
सबसे शुभ सावन का पहला सोमवार माना जाता है। चैत्र, वैशाख, कार्तिक या मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष के पहले सोमवार से भी शुरू कर सकते हैं।
सोलह सोमवार में क्या प्रसाद बनता है?
हर सोमवार आधा सेर गेहूँ के आटे से घी-गुड़ मिलाकर अंगाकड़े या चूरमा बनता है, और सत्रहवें सोमवार को सवा सेर आटे का चूरमा।
सोलह सोमवार और साधारण सोमवार व्रत में क्या अंतर है?
सोलह सोमवार निश्चित सोलह हफ़्तों का संकल्प है, जिसमें चूरमे का विशेष प्रसाद और सत्रहवें सोमवार को उद्यापन होता है। साधारण सोमवार व्रत अपनी इच्छा से कितने भी समय रखा जा सकता है।
क्या सोलह सोमवार में बीच में व्रत छूट सकता है?
बीमारी या मजबूरी में कोई सोमवार छूट जाए तो उसकी जगह अगला सोमवार जोड़कर सोलह की गिनती पूरी की जाती है।
कुँवारी लड़कियाँ सोलह सोमवार क्यों रखती हैं?
मान्यता है कि इस व्रत से मनचाहा जीवनसाथी मिलता है, जैसे कथा में ब्राह्मण मित्र का विवाह राजकुमारी से हुआ।
