बृहस्पतिवार व्रत कथा: दान से चिढ़ने वाली रानी, साधु और दासी की कहानी
संक्षेप में:बृहस्पतिवार का व्रत देवगुरु बृहस्पति और भगवान विष्णु के लिए रखा जाता है, जिसमें पीले वस्त्र, चने की दाल, गुड़ और केले के पेड़ की पूजा होती है। इसकी कथा उस रानी की है जिसने दान से ऊबकर अपना वैभव गँवाया और व्रत से उसे फिर पाया।
गुरुवार यानी बृहस्पतिवार का व्रत देवगुरु बृहस्पति और भगवान विष्णु को समर्पित है। इसे किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले गुरुवार से शुरू किया जाता है, आम तौर पर 16 गुरुवार या तीन साल तक। उत्तर भारत में कुँवारी लड़कियाँ अच्छे वर के लिए, और गृहस्थ घर में धन-धान्य और विद्या के लिए यह व्रत रखते हैं। इस दिन पीला रंग, चने की दाल, गुड़ और केले के पेड़ की पूजा खास है।
बृहस्पतिवार व्रत कथा
प्राचीन समय में एक प्रतापी और दानी राजा था। वह हर गुरुवार व्रत रखता, बृहस्पति देव की पूजा करता और द्वार पर आए किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाता था। पर उसकी रानी को यह सब बिल्कुल पसंद नहीं था। वह न व्रत रखती, न दान देती, और राजा को भी टोकती रहती कि इतना धन लुटाना ठीक नहीं।
एक बार राजा शिकार खेलने वन में गया था। महल में रानी और उसकी दासी ही थीं। तभी बृहस्पति देव एक साधु का वेश बनाकर महल के द्वार पर भिक्षा माँगने आए। रानी ने झुँझलाकर कहा, “महाराज, मैं तो इस दान-पुण्य से थक गई हूँ। रोज़ कोई न कोई माँगने चला आता है। कोई ऐसा उपाय बताइए कि सारा धन चला जाए और मैं चैन से रह सकूँ।”
साधु ने समझाया, “देवी, धन से ही तो दान होता है, यज्ञ होते हैं, कुएँ-तालाब बनते हैं। ऐसी बात मत कहो।” पर रानी अपनी ज़िद पर अड़ी रही। तब साधु बोले, “ठीक है, जैसी तुम्हारी इच्छा। गुरुवार के दिन घर को गोबर से लीपना, बाल धोना, राजा से हजामत करवाना, धोबी को कपड़े धुलवाना और भोजन में मांस-मदिरा रखना। सात गुरुवार ऐसा करोगी तो तुम्हारा सारा धन चला जाएगा।” इतना कहकर साधु चले गए।
रानी ने वैसा ही किया। तीसरा गुरुवार आते-आते महल का सारा धन, अन्न, गहने सब नष्ट हो गए। हालत यह हो गई कि घर में खाने को दाना नहीं बचा। राजा ने कहा, “यहाँ सब मुझे जानते हैं, मैं यहाँ मज़दूरी नहीं कर सकता।” वह परदेस चला गया और जंगल से लकड़ी काटकर बेचने लगा। महल में रानी और दासी भूखी रहने लगीं।
सात दिन बिना भोजन के बीते तो रानी ने दासी से कहा, “पास के नगर में मेरी बहन रहती है, वह बहुत धनवान है। जाकर उससे थोड़ा अन्न ले आ।” दासी गई। वह दिन गुरुवार था और रानी की बहन बृहस्पति देव की कथा सुन रही थी। व्रत के नियम से वह बीच में उठी नहीं, कुछ बोली भी नहीं। दासी को लगा कि बहन ने जानबूझकर अनदेखा किया है और वह दुखी होकर खाली हाथ लौट आई।
कथा पूरी होने पर बहन को चिंता हुई कि दासी बिना कुछ लिए क्यों चली गई। वह खुद रानी के पास आई और बोली, “बहन, मैं बृहस्पतिवार की कथा में बैठी थी, कथा के बीच न उठा जाता है न बोला जाता है। बताओ, दासी क्यों आई थी?” रानी ने रोते हुए अपनी दशा सुनाई। बहन ने कहा, “बृहस्पति देव सबकी मनोकामना पूरी करते हैं। ज़रा घर में देखो, शायद कुछ अनाज रखा हो।” रानी ने अनमने मन से देखा तो सचमुच एक घड़ा अनाज से भरा मिला। दासी हैरान रह गई।
अब दासी ने रानी से कहा, “रानी जी, जब हमें भोजन नहीं मिलता तब भी तो हम उपवास ही करते हैं। क्यों न आपकी बहन से व्रत की विधि पूछकर हम भी यह व्रत करें?” बहन ने विधि बताई: गुरुवार को केले की जड़ में विष्णु भगवान की पूजा, चने की दाल और मुनक्का चढ़ाना, दीपक जलाना, कथा सुनना और पीला भोजन एक बार करना।
अगले गुरुवार रानी और दासी ने बड़ी श्रद्धा से व्रत किया। घुड़साल से चने की दाल और गुड़ बीनकर लाईं और केले के पेड़ की पूजा की। अब सवाल था कि पीला भोजन कहाँ से आए। तभी एक साधारण-से आदमी के रूप में बृहस्पति देव आए और दो थाल पीला भोजन देकर चले गए। दोनों ने वही प्रसाद पाया। धीरे-धीरे गुरुवार दर गुरुवार उनके दिन फिरने लगे और महल में फिर से धन-धान्य भर गया।
धन लौटा तो रानी फिर आलस करने लगी। तब उसी गरीब दासी ने समझाया, “रानी जी, पहले आपके पास धन था, पर आप दान से कतराती थीं, इसीलिए सब गया। अब बृहस्पति देव की कृपा से धन आया है तो इसे भूखों को भोजन कराने, प्याऊ लगवाने, ब्राह्मणों और कन्याओं को दान देने में लगाइए।” रानी को अपनी भूल समझ आ गई। उसने वैसा ही किया और पूरे नगर में उसका यश फैल गया।
उधर परदेस में लकड़ी बेचता राजा भी एक दिन जंगल में बैठा अपनी दशा पर रो रहा था। बृहस्पति देव साधु बनकर वहाँ भी आए और उसे गुरुवार व्रत की विधि बताई। राजा ने लकड़ी बेचकर मिले पैसों से चने की दाल और गुड़ लिया और व्रत किया। उसके भी दुख दूर हुए और वह सम्मान के साथ अपने महल लौटा, जहाँ रानी और दासी ने उसका स्वागत किया। तब से वह राज्य बृहस्पतिवार के व्रत के लिए प्रसिद्ध हो गया।
बृहस्पतिवार व्रत की पूजा विधि
- सुबह नहाकर पीले कपड़े पहनें। हाथ में जल, पीले फूल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें (कितने गुरुवार करेंगे, यह भी मन में कहें)।
- केले के पेड़ की जड़ में जल चढ़ाएँ, हल्दी, चने की दाल, गुड़ और मुनक्का अर्पित करें। घर में केला न हो तो भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र के सामने यही पूजा करें।
- पीले फूल, पीला चंदन या हल्दी का तिलक, और घी का दीपक भगवान को अर्पित करें।
- दीपक जलाकर बृहस्पतिवार व्रत कथा पढ़ें या सुनें। कथा के बीच न उठें, न बात करें, जैसा कथा में रानी की बहन ने किया।
- इसके बाद ॐ जय जगदीश हरे आरती गाएँ और चने की दाल-गुड़ का प्रसाद बाँटें।
- दिन में एक बार पीला भोजन लें, जैसे चने की दाल, बेसन के लड्डू या केसर वाले चावल। नमक से परहेज़ करें या बहुत कम रखें।
नियम और उद्यापन
- गुरुवार को बाल धोना, बाल-दाढ़ी कटवाना, कपड़े धोबी को देना और घर में पोंछा लगाना वर्जित माना जाता है, जैसा कथा में बताया गया है।
- केले के पेड़ की पूजा होती है, इसलिए उस दिन केला खाया नहीं जाता, केवल चढ़ाया या दान किया जाता है।
- संकल्प के गुरुवार पूरे होने पर उद्यापन करें: पीले वस्त्र, चने की दाल, गुड़, हल्दी, पीले फल और पुस्तकें किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को दान दें।
- कथा की सीख को व्यवहार में रखें: दान अपनी सामर्थ्य के अनुसार, पर खुले मन से।
गुरु के सम्मान का सबसे बड़ा दिन गुरु पूर्णिमा है। विष्णु भक्ति से जुड़ी सत्यनारायण व्रत कथा और हर पखवाड़े आने वाली एकादशी की तिथियाँ भी देखें। गुरुवार व्रत शुरू करने के लिए शुक्ल पक्ष का पहला गुरुवार पंचांग में देख लें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बृहस्पतिवार का व्रत कितने गुरुवार करना चाहिए?
ज़्यादातर लोग 16 गुरुवार का संकल्प लेते हैं। कुछ परिवारों में 1, 3 या 5 साल तक हर गुरुवार व्रत रखने की परंपरा भी है।
गुरुवार व्रत में क्या खाएँ?
दिन में एक बार पीला भोजन किया जाता है, जैसे चने की दाल, बेसन की चीज़ें या केसर-हल्दी वाले चावल। केला नहीं खाया जाता।
गुरुवार को बाल क्यों नहीं धोने चाहिए?
बृहस्पतिवार व्रत कथा में रानी ने साधु के कहने पर गुरुवार को बाल धोए और घर लीपा, जिससे उसका धन चला गया। इसी कथा के कारण यह नियम माना जाता है।
बृहस्पतिवार व्रत में केले के पेड़ की पूजा क्यों होती है?
मान्यता है कि केले के पेड़ में भगवान विष्णु और बृहस्पति देव का वास है, इसलिए उसकी जड़ में जल, हल्दी, चने की दाल और गुड़ चढ़ाया जाता है।
गुरुवार व्रत कब से शुरू करें?
किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले गुरुवार से, पौष मास और पितृपक्ष को छोड़कर। अनुराधा नक्षत्र वाला गुरुवार भी शुभ माना जाता है।
