ॐ जय जगदीश हरे आरती
संक्षेप में:ॐ जय जगदीश हरे भगवान विष्णु की वह आरती है जो उत्तर भारत के लगभग हर घर और मंदिर में पूजा के अंत में गाई जाती है। इसे 19वीं सदी में पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी ने रचा था।
पाठ
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतरयामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम रक्षक मेरे।
करुणा हस्त बढ़ाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
आरती का परिचय
ॐ जय जगदीश हरे की रचना पंजाब के फिल्लौर में जन्मे पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी (शर्मा) ने लगभग 1870 के आसपास की थी। आज यह इतनी घर-घर की चीज़ बन चुकी है कि बहुत से लोग इसे बहुत पुरानी लोक आरती मानते हैं। भगवान विष्णु को 'जगदीश' यानी जगत का स्वामी कहकर पुकारा गया है, इसीलिए किसी भी देवता की पूजा के अंत में भी लोग यही आरती गा लेते हैं।
पहला पद: टेक
हे जगत के स्वामी हरि, आपकी जय हो। आप अपने भक्तों का संकट पल भर में दूर कर देते हैं। यही पंक्ति हर पद के बाद दोहराई जाती है।
दूसरा और तीसरा पद
जो आपका ध्यान करता है उसे फल मिलता है, मन का दुख मिटता है, घर में सुख-संपत्ति आती है और शरीर का कष्ट दूर होता है। भक्त कहता है कि आप ही माता-पिता हैं, आपके सिवा किसकी शरण लूं, किससे आस लगाऊं।
चौथा और पाँचवाँ पद
आप पूर्ण परमात्मा हैं, सबके मन की जानने वाले हैं, परब्रह्म हैं और सबके स्वामी हैं। आप करुणा के सागर और पालनहार हैं; मैं सेवक हूँ, आप स्वामी हैं, मुझ पर कृपा कीजिए।
छठा और सातवाँ पद
आप एक हैं और इंद्रियों से परे हैं, फिर भी सबके प्राणों के पति हैं। भक्त अपनी कमज़ोर बुद्धि मानते हुए पूछता है कि मैं आपसे किस तरह मिलूं। फिर विनती करता है कि हे दीनबंधु, करुणा का हाथ बढ़ाइए, मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ।
आठवाँ पद
मन के विषय-विकार मिटाइए, पाप हरिए, श्रद्धा और भक्ति बढ़ाइए और संतों की सेवा का भाव दीजिए। आरती यहीं विनम्र प्रार्थना पर खत्म होती है।
पाठ-भेद
अलग-अलग पुस्तकों में कुछ पंक्तियाँ थोड़ी बदली मिलती हैं। भारतकोश जैसे स्रोतों में पाँचवें पद में 'मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता' और सातवें पद में 'तुम ठाकुर मेरे, अपने हाथ उठाओ' मिलता है। कई परिवार 'मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी' दोनों जोड़कर गाते हैं। यहाँ sanskritdocuments.org का पाठ दिया गया है।
कब और कैसे पढ़ें
यह आरती रोज़ सुबह-शाम की पूजा, एकादशी व्रत और सत्यनारायण पूजा के अंत में खास तौर पर गाई जाती है। घी या कपूर का दीपक थाली में रखकर, खड़े होकर, घंटी बजाते हुए गाएं और अंत में सबको आरती दें। एकादशी पर कथा सुनने के लिए एकादशी व्रत कथा पढ़ें, और दीपावली पर इसके साथ लक्ष्मी जी की आरती भी गाई जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ॐ जय जगदीश हरे आरती किसने लिखी?
यह आरती पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी ने 19वीं सदी में लिखी थी। उनका जन्म पंजाब के फिल्लौर में हुआ था और 1881 में उनका निधन हुआ।
ॐ जय जगदीश हरे किस भगवान की आरती है?
यह भगवान विष्णु की आरती है, जिन्हें जगदीश यानी जगत का स्वामी कहा गया है। फिर भी उत्तर भारत में लगभग हर पूजा के अंत में इसे गाया जाता है।
इस आरती में कितने पद हैं?
प्रचलित पाठ में टेक सहित आठ पद हैं। कुछ पुस्तकों में बाद में जोड़े गए अतिरिक्त पद भी मिलते हैं।
क्या सत्यनारायण पूजा में यही आरती गाते हैं?
सत्यनारायण पूजा में मुख्य रूप से 'जय लक्ष्मी रमणा' आरती गाई जाती है, पर बहुत से घरों में उसके बाद ॐ जय जगदीश हरे भी गाते हैं।
आरती कितनी बार घुमानी चाहिए?
प्रचलित परंपरा में दीपक को भगवान के चरणों के सामने चार बार, नाभि के सामने दो बार, मुख के सामने एक बार और फिर पूरे विग्रह के सामने सात बार घुमाया जाता है।
