एकादशी व्रत कथा: एकादशी माता का जन्म, व्रत के नियम और पारण
संक्षेप में:एकादशी व्रत की मूल कथा उत्पन्ना एकादशी से जुड़ी है: मुर दैत्य से लड़ते-लड़ते योगनिद्रा में गए भगवान विष्णु के शरीर से एक देवी प्रकट हुईं, जिन्होंने दैत्य का वध किया और एकादशी कहलाईं। यह व्रत हर महीने दोनों पक्षों की ग्यारहवीं तिथि को रखा जाता है और अगले दिन द्वादशी को पारण होता है।
एकादशी हर महीने दो बार आती है — शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को। इस दिन भगवान विष्णु के लिए उपवास रखा जाता है। साल भर की चौबीस एकादशियों की शुरुआत उत्पन्ना एकादशी से मानी जाती है, जो मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष में पड़ती है, इसलिए जो लोग पहली बार एकादशी का नियम लेना चाहते हैं, वे परंपरा से इसी दिन संकल्प करते हैं। इसकी कथा भविष्योत्तर पुराण में भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई है, और यही बताती है कि एकादशी तिथि को देवी क्यों माना जाता है।
एकादशी व्रत कथा
सतयुग की बात है। चंद्रावती नाम की नगरी में नाड़ीजंघ दैत्य का पुत्र मुर राज करता था। वह बहुत बलवान था और उतना ही घमंडी भी। उसने अपनी सेना लेकर स्वर्ग पर चढ़ाई की और इंद्र समेत सभी देवताओं को वहाँ से निकाल दिया। सूर्य, चंद्रमा, वायु, अग्नि — सबके काम उसने अपने हाथ में ले लिए। देवता अपना घर छोड़कर धरती पर इधर-उधर भटकने लगे।
परेशान होकर देवता कैलास पहुँचे और भगवान शिव को अपना दुख सुनाया। शिवजी ने कहा कि इस संकट से निकालने वाले केवल जगत के पालनहार विष्णु हैं, आप सब क्षीरसागर जाइए। देवता क्षीरसागर पहुँचे, जहाँ भगवान शेषनाग की शय्या पर विश्राम कर रहे थे। इंद्र ने हाथ जोड़कर स्तुति की और मुर के अत्याचार की पूरी बात कह सुनाई।
भगवान ने देवताओं को धीरज बँधाया और उनके साथ चंद्रावती की ओर चल पड़े। वहाँ मुर की विशाल सेना खड़ी थी। लड़ाई शुरू होते ही देवता दैत्यों के सामने टिक नहीं पाए और पीछे हट गए। तब भगवान स्वयं आगे आए। उनके सुदर्शन चक्र और बाणों से दैत्यों की सेना कटने लगी, पर मुर अकेला डटा रहा। भगवान जो भी अस्त्र चलाते, वह उसके शरीर से टकराकर जैसे बेअसर हो जाता।
कहते हैं यह युद्ध देवताओं के हज़ार वर्षों तक चला। फिर अस्त्र छोड़कर दोनों बाहुयुद्ध करने लगे। लंबी लड़ाई के बाद भगवान ने एक लीला रची। थकान का भाव दिखाते हुए वे युद्धभूमि छोड़कर बदरिकाश्रम चले गए और वहाँ हेमवती नाम की एक गुफा में योगनिद्रा में लेट गए। उस गुफा में आने-जाने का एक ही रास्ता था।
मुर ने सोचा कि यही मौका है। वह भगवान का पीछा करते-करते गुफा तक आ पहुँचा और सोए हुए विष्णु पर वार करने के लिए आगे बढ़ा। उसी क्षण भगवान के शरीर से एक तेजस्वी कन्या प्रकट हुई। उसके हाथों में दिव्य अस्त्र थे और चेहरे पर ऐसा तेज था कि मुर भी एक पल को ठिठक गया। कन्या ने उसे युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में भयंकर लड़ाई हुई और आख़िरकार उस देवी ने मुर का सिर धड़ से अलग कर दिया। बचे हुए दैत्य डरकर पाताल भाग गए।
जब भगवान की नींद खुली तो उन्होंने सामने मुर को मरा पड़ा देखा और पास में हाथ जोड़े खड़ी उस कन्या को। आश्चर्य से पूछा — यह किसने किया? कन्या बोली, प्रभु, मैं आपके ही अंश से जन्मी हूँ। यह दैत्य सोते हुए आपको मारने आया था, इसलिए मैंने इसका वध किया।
भगवान बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, तुम्हारा जन्म एकादशी तिथि को हुआ है, इसलिए तुम्हारा नाम एकादशी होगा। जो मनुष्य तुम्हारे दिन श्रद्धा से उपवास रखेगा, रात को मेरा स्मरण करेगा और अगले दिन विधि से पारण करेगा, उसके पाप धुल जाएँगे और उसे मेरा धाम मिलेगा। सब तिथियों में तुम मुझे सबसे प्रिय रहोगी। देवी ने भी वर माँगा कि जो लोग उनका व्रत रखें, भगवान सदा उनकी रक्षा करें। भगवान ने तथास्तु कहा। तभी से एकादशी का व्रत शुरू हुआ और इस दिन को उत्पन्ना एकादशी कहा जाने लगा — जिस दिन एकादशी देवी उत्पन्न हुईं।
कथा सुनाकर श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि जो व्यक्ति इस प्रसंग को श्रद्धा से सुनता या सुनाता है, उसे भी व्रत का पुण्य मिलता है। इसीलिए एकादशी के दिन पूजा के बाद परिवार के साथ बैठकर कथा पढ़ने का चलन है।
एकादशी को चावल क्यों नहीं खाते
उत्तर भारत के घरों में एकादशी को चावल न खाने का नियम बड़ी सख़्ती से माना जाता है — कई घरों में तो उस दिन चावल पकता ही नहीं, चाहे व्रत कोई रखे या न रखे। लोक-मान्यता है कि इस दिन अन्न, ख़ासकर चावल, में पाप का वास रहता है। सीधी बात यह है कि उपवास के दिन अनाज छोड़कर शरीर और मन दोनों को हल्का रखा जाए। जो पूरा उपवास नहीं रख पाते, वे भी चावल और अनाज से परहेज़ करते हैं।
एकादशी व्रत की पूजा विधि
- दशमी की तैयारी: व्रत से एक दिन पहले, दशमी को सूर्यास्त से पहले एक बार सादा सात्विक भोजन करें। प्याज़, लहसुन, मसूर और चावल न लें।
- संकल्प: एकादशी की सुबह स्नान करके पीले या साफ़ वस्त्र पहनें। हाथ में जल और फूल लेकर संकल्प करें कि आज आप निर्जल, फलाहार या केवल अन्न छोड़कर — इनमें से कौन-सा व्रत रखेंगे।
- पूजा: चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु, लड्डू गोपाल या शालिग्राम को स्थापित करें। पंचामृत से स्नान कराएँ, पीला चंदन, पीले फूल, तुलसी दल, धूप-दीप और फल-मिठाई का भोग लगाएँ। तुलसी दल एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें, क्योंकि एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।
- कथा और जप: पूजा के बाद यह कथा पढ़ें या सुनें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करें और समय हो तो विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
- आरती: ॐ जय जगदीश हरे आरती गाकर पूजा पूरी करें। शाम को फिर घी का दीपक जलाकर आरती करें।
- जागरण: हो सके तो रात में भजन-कीर्तन करें। पूरी रात न जाग सकें तो देर तक नाम-स्मरण करके सोएँ।
- द्वादशी पारण: अगले दिन सूर्योदय के बाद, पारण के तय समय के भीतर व्रत खोलें। पहले भगवान को भोग लगाएँ, किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन या अन्न दान करें, फिर तुलसी दल डालकर जल ग्रहण करके व्रत खोलें।
एकादशी व्रत के नियम और पारण की सावधानियाँ
- व्रत एकादशी के सूर्योदय से अगले दिन के सूर्योदय तक चलता है; पारण द्वादशी तिथि रहते ही कर लेना चाहिए।
- द्वादशी का पहला चौथाई भाग हरि वासर कहलाता है। इस दौरान पारण नहीं किया जाता। हरि वासर बीतने के बाद, हो सके तो सुबह ही व्रत खोलें; दोपहर में पारण टालने की सलाह दी जाती है।
- जिस साल एकादशी दो दिन पड़े, वहाँ गृहस्थ (स्मार्त) प्रायः पहले दिन और वैष्णव संप्रदाय के लोग दूसरे दिन व्रत रखते हैं। अपने घर की परंपरा देखें।
- व्रत के दिन क्रोध, झूठ, निंदा और दिन में सोने से बचें, ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- बीमार व्यक्ति, गर्भवती महिलाएँ, बुज़ुर्ग और बच्चे निर्जल व्रत न रखें; फलाहार या केवल अनाज छोड़कर रखा गया व्रत भी पूरा माना जाता है।
- फलाहार में कुट्टू, सिंघाड़ा, साबूदाना, आलू, दूध, दही, फल और सेंधा नमक लिया जाता है।
हर महीने की दोनों एकादशियों की तारीख़ और पारण का समय एकादशी व्रत कैलेंडर में देखें, और व्रत वाले दिन का सूर्योदय आज के पंचांग से मिला लें। इस साल की तिथि उत्पन्ना एकादशी पृष्ठ पर है। साल की सबसे कठिन एकादशी की कहानी निर्जला एकादशी व्रत कथा में पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
एकादशी व्रत की शुरुआत किस एकादशी से करनी चाहिए?
परंपरा के अनुसार नया व्रत उत्पन्ना एकादशी से शुरू किया जाता है, जो मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष में आती है, क्योंकि इसी दिन एकादशी देवी प्रकट हुई थीं। कई लोग निर्जला या देवउठनी एकादशी से भी आरंभ करते हैं।
एकादशी देवी कौन हैं?
भविष्योत्तर पुराण के अनुसार एकादशी भगवान विष्णु के शरीर से प्रकट हुई शक्ति हैं, जिन्होंने सोते हुए विष्णु पर हमला करने आए मुर दैत्य का वध किया। प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें एकादशी नाम और यह वर दिया कि उनका व्रत रखने वालों के पाप नष्ट होंगे।
एकादशी का पारण कब करना चाहिए?
पारण द्वादशी के दिन सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि खत्म होने से पहले किया जाता है। द्वादशी के पहले चौथाई भाग, जिसे हरि वासर कहते हैं, में पारण नहीं किया जाता।
एकादशी के व्रत में क्या खा सकते हैं?
फलाहार में फल, दूध, दही, कुट्टू, सिंघाड़ा, साबूदाना, आलू, मूँगफली और सेंधा नमक लिया जा सकता है। चावल, गेहूँ, दालें, प्याज़ और लहसुन नहीं खाए जाते।
क्या एकादशी को तुलसी तोड़ सकते हैं?
नहीं, एकादशी को तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते। पूजा के लिए तुलसी दल एक दिन पहले, दशमी को तोड़कर रख लिए जाते हैं।
एक साल में कितनी एकादशी होती हैं?
सामान्य वर्ष में 24 एकादशी होती हैं, हर महीने दो। जिस वर्ष अधिक मास पड़ता है, उसमें पद्मिनी और परमा नाम की दो एकादशी और जुड़कर संख्या 26 हो जाती है।
