देवउठनी एकादशी व्रत कथा: भगवान विष्णु का जागना और तुलसी विवाह
संक्षेप में:देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी कार्तिक शुक्ल एकादशी को आती है, जब चार महीने की योगनिद्रा के बाद भगवान विष्णु जागते हैं और चातुर्मास पूरा होता है। कथा के अनुसार माता लक्ष्मी के आग्रह पर भगवान ने हर साल चार महीने सोने का नियम बनाया; इसी दिन से विवाह आदि शुभ काम फिर शुरू होते हैं और तुलसी विवाह किया जाता है।
देवउठनी एकादशी कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है। इसे प्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी और मध्य प्रदेश-राजस्थान में देवउठनी ग्यारस भी कहते हैं। देवशयनी एकादशी को जो भगवान विष्णु योगनिद्रा में गए थे, वे इस दिन जागते हैं और चातुर्मास पूरा होता है। इसके साथ ही शादी-ब्याह, गृह-प्रवेश और दूसरे मांगलिक काम फिर से शुरू हो जाते हैं। इसी दिन या अगले दिन द्वादशी को शालिग्राम और तुलसी का विवाह भी किया जाता है। इस एकादशी की महिमा स्कन्द पुराण और पद्म पुराण के कार्तिक माहात्म्य में विस्तार से बताई गई है।
देवउठनी एकादशी व्रत कथा
एक बार माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से बड़े प्रेम से एक शिकायत की। बोलीं, स्वामी, आप या तो दिन-रात लगातार जागते रहते हैं, या फिर जब सोते हैं तो लाखों-करोड़ों वर्षों तक सोते रह जाते हैं, और उस समय सारी सृष्टि थम जाती है। आपके इस तरह जागने से मुझे भी कभी विश्राम नहीं मिलता। आप नियम से सोया करें तो मुझे भी थोड़ा आराम मिल जाए।
भगवान मुस्कुराए। उन्होंने कहा, देवी, तुम ठीक कहती हो। मेरे लगातार जागने से सब देवताओं को और विशेषकर तुम्हें कष्ट होता है। तुम्हें मेरी सेवा से ज़रा भी फ़ुर्सत नहीं मिलती। इसलिए आज से मैं हर वर्ष वर्षा ऋतु में चार महीने सोया करूँगा। आषाढ़ शुक्ल एकादशी को मैं शयन करूँगा और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागूँगा। उस समय तुम्हें और देवताओं को भी विश्राम मिलेगा।
भगवान ने आगे कहा, मेरी यह नींद छोटी नींद कहलाएगी, प्रलय वाली महानिद्रा नहीं। यह भक्तों के लिए बड़ी मंगलकारी होगी। जो भक्त इन चार महीनों में मेरे सोने और जागने का भाव रखकर मेरी सेवा करेंगे, शयन और उत्थान का उत्सव श्रद्धा से मनाएँगे, उनके घर मैं तुम्हारे साथ निवास करूँगा।
तभी से देवशयनी को भगवान को सुलाने और देवउठनी को जगाने की परंपरा चली। कार्तिक शुक्ल एकादशी की शाम को घर-घर में शंख, घंटी और थाली बजाकर भगवान को जगाया जाता है, उन्हें नए मौसम के फल और गन्ना अर्पित किए जाते हैं, और फिर उनके शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी जी से रचाया जाता है। ब्रह्माजी ने नारद को बताया था कि इस एकादशी का व्रत करने वाले को हज़ार अश्वमेध यज्ञों जितना पुण्य मिलता है और रात भर जागरण करने वाले की कई पीढ़ियाँ तर जाती हैं।
राजा और सच्चे भक्त की लोककथा
उत्तर भारत के गाँवों में इस दिन एक और कथा सुनाई जाती है। एक राज्य में एकादशी का नियम इतना कड़ा था कि उस दिन प्रजा तो क्या, पशुओं को भी अन्न नहीं दिया जाता था। एक दिन दूसरे राज्य से एक आदमी नौकरी माँगने आया। राजा ने शर्त रखी कि रोज़ भोजन मिलेगा, पर एकादशी को अन्न नहीं मिलेगा। उसने हाँ कर दी।
एकादशी आई तो उसे केवल फल मिले। वह राजा के सामने गिड़गिड़ाया कि महाराज, फल से मेरा पेट नहीं भरेगा, मैं भूखा मर जाऊँगा। राजा ने शर्त याद दिलाई, पर उसकी हालत देखकर आटा-दाल-चावल दे दिए। वह नदी किनारे गया, स्नान करके भोजन बनाया और भोलेपन से पुकारा — आओ भगवान, भोजन तैयार है। उसकी सरल पुकार पर भगवान पीतांबर पहने चतुर्भुज रूप में आए और उसके साथ बैठकर प्रेम से भोजन किया।
अगली एकादशी पर उसने राजा से दुगना सामान माँगा, कहा कि भगवान भी मेरे साथ खाते हैं। राजा को विश्वास नहीं हुआ और वह पेड़ के पीछे छिपकर देखने लगा। उस दिन बहुत पुकारने पर भी भगवान नहीं आए। तब उस आदमी ने कहा कि आप न आए तो मैं नदी में कूद जाऊँगा। जैसे ही वह आगे बढ़ा, भगवान ने प्रकट होकर उसका हाथ थाम लिया और साथ भोजन किया। राजा समझ गया कि व्रत का असली अर्थ नियम से अधिक मन की सच्चाई और प्रेम है। उस दिन से वह भी सच्चे मन से व्रत करने लगा।
देवउठनी एकादशी पूजा विधि
- संकल्प: सुबह स्नान करके भगवान विष्णु के सामने व्रत का संकल्प लें और दिन में फलाहार रखें।
- आँगन की तैयारी: शाम को आँगन या पूजा की जगह पर गेरू और खड़िया से भगवान के चरण और चौक बनाएँ। उत्तर प्रदेश और बिहार में इसे देव बनाना कहते हैं।
- भोग: चौक पर सिंघाड़ा, गन्ना, शकरकंद, बेर, मूली, आँवला, नए चावल का भोग और मिठाई रखें, फिर उसे डलिया या परात से ढक दें।
- दीपदान: घर के दरवाज़े, आँगन और तुलसी के पास घी या तिल के तेल के दीपक जलाएँ।
- भगवान को जगाना: परिवार के लोग थाली, घंटी और शंख बजाते हुए उठो देव, बैठो देव जैसे पारंपरिक गीत गाकर भगवान को जगाते हैं और डलिया हटाकर पूजा करते हैं।
- तुलसी विवाह और आरती: गन्ने का मंडप बनाकर शालिग्राम और तुलसी का विवाह कराएँ, फिर तुलसी माता की आरती और विष्णु जी की आरती करें।
- पारण: अगले दिन द्वादशी को हरि वासर के बाद दान देकर व्रत खोलें।
नियम और परंपराएँ
- इस दिन से विवाह, सगाई, गृह-प्रवेश और मुंडन जैसे शुभ काम फिर शुरू होते हैं; शादियों का मौसम यहीं से खुलता है।
- कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक भीष्म पंचक के पाँच दिन चलते हैं, जिनमें कई लोग विशेष संयम रखते हैं।
- चातुर्मास में जिसका त्याग किया था, वह वस्तु पहले भगवान को अर्पित करके फिर ग्रहण की जाती है।
- एकादशी को तुलसी के पत्ते न तोड़ें; पूजा के लिए पहले से रख लें।
इस साल की तिथि देवउठनी एकादशी पृष्ठ पर और विवाह का मुहूर्त तुलसी विवाह पृष्ठ पर देखें। वृंदा और जालंधर की पूरी कहानी तुलसी विवाह कथा में पढ़ें, और बाकी एकादशियों के लिए एकादशी कैलेंडर देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
देवउठनी एकादशी कब होती है?
देवउठनी एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को होती है, जो आमतौर पर दीपावली के लगभग ग्यारह दिन बाद, नवंबर में पड़ती है।
देवउठनी एकादशी पर भगवान को कैसे जगाते हैं?
शाम को आँगन में गेरू से भगवान के चरण बनाकर सिंघाड़ा, गन्ना, शकरकंद आदि रखे जाते हैं और डलिया से ढक दिए जाते हैं। फिर थाली, घंटी और शंख बजाकर उठो देव, बैठो देव गाते हुए भगवान को जगाया जाता है।
देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह क्यों होता है?
भगवान विष्णु के जागने के बाद पहला मांगलिक काम उनके शालिग्राम रूप का तुलसी से विवाह माना जाता है। यह विवाह वृंदा को दिए गए भगवान के वचन से जुड़ा है।
क्या देवउठनी एकादशी के बाद शादी कर सकते हैं?
हाँ, इसी दिन से चातुर्मास खत्म होता है और विवाह के मुहूर्त फिर शुरू होते हैं। सटीक मुहूर्त के लिए पंचांग देखें।
देवउठनी एकादशी के और क्या नाम हैं?
इसे प्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी, देव प्रबोधिनी और देवउठनी ग्यारस भी कहते हैं। दक्षिण भारत में इसे उत्थान एकादशी कहा जाता है।
