Bhaktise – भक्ति से

निर्जला एकादशी व्रत कथा: भीमसेन और महर्षि व्यास की कहानी

संक्षेप में:निर्जला एकादशी ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को रखी जाती है। कथा के अनुसार भूख न सह पाने वाले भीमसेन को महर्षि व्यास ने बताया कि इस एक दिन बिना जल और अन्न के व्रत रखने से साल की सभी एकादशियों का पुण्य मिल जाता है, इसलिए इसे भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं।

कोई रेटिंग नहीं
0 व्यूज़

निर्जला एकादशी ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है, ठीक गंगा दशहरा के अगले दिन। यह साल की सबसे कठिन एकादशी मानी जाती है, क्योंकि इसमें सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय तक अन्न तो क्या, पानी की एक बूँद भी नहीं ली जाती — और यह जून की तपती गर्मी में पड़ती है। जो लोग पूरे साल एकादशी नहीं रख पाते, वे इस एक व्रत को पूरे मन से निभाते हैं, क्योंकि मान्यता है कि इससे चौबीसों एकादशियों का फल मिलता है। इसकी कथा महाभारत के भीमसेन और महर्षि वेदव्यास से जुड़ी है, जो पद्म पुराण की परंपरा में मिलती है।

निर्जला एकादशी व्रत कथा

पांडवों के घर में एकादशी का व्रत बड़े नियम से होता था। माता कुंती, द्रौपदी, युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल और सहदेव — सब हर महीने दोनों एकादशियों को उपवास रखते थे। केवल भीमसेन ऐसा नहीं कर पाते थे। उनके पेट में वृक नाम की अग्नि रहती थी, जिसके कारण उन्हें बहुत भूख लगती थी और भोजन के बिना वे बेचैन हो जाते थे। घर के लोग बार-बार उनसे कहते कि तुम भी एकादशी रखा करो, और भीम मन ही मन दुखी रहते।

एक बार महर्षि वेदव्यास पांडवों के पास आए। भीम ने हाथ जोड़कर अपनी उलझन उनके सामने रख दी। बोले, गुरुदेव, मैं दान कर सकता हूँ, भगवान की पूजा कर सकता हूँ, ब्राह्मणों की सेवा कर सकता हूँ, पर भूखा नहीं रह सकता। मेरे भाई और माता कहते हैं कि एकादशी के बिना मुक्ति नहीं मिलती। अब आप ही बताइए, मैं क्या करूँ?

व्यासजी ने पहले उन्हें समझाया कि यदि स्वर्ग की इच्छा है और नरक से बचना है तो हर एकादशी को अन्न नहीं खाना चाहिए। भीम ने सिर झुका लिया और कहा, महाराज, मुझसे तो दिन में एक बार खाकर रहना भी नहीं होता। साल भर में चौबीस व्रत मेरे बस का नहीं। कोई ऐसा एक व्रत बताइए जिससे मेरा भी कल्याण हो जाए।

भीम की सच्चाई देखकर व्यासजी मुस्कुराए। उन्होंने कहा, तो सुनो। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में, जब सूर्य वृष या मिथुन राशि में हों, जो एकादशी आती है, उस दिन तुम निर्जल व्रत रखो। सूर्योदय से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक न कुछ खाना, न पानी पीना। केवल आचमन के लिए जितना जल हथेली में आए, उतना ले सकते हो, उससे अधिक नहीं। अगले दिन द्वादशी को स्नान करके भगवान की पूजा करना, ब्राह्मणों को जल से भरे घड़े, अन्न और दक्षिणा देना, फिर स्वयं भोजन करना। ऐसा करने से तुम्हें साल की सभी एकादशियों का पुण्य एक साथ मिल जाएगा। यह बात स्वयं भगवान ने मुझसे कही है।

व्यासजी ने यह भी बताया कि इस व्रत को करने वाले के अंत समय यमदूत नहीं आते, बल्कि भगवान विष्णु के पार्षद उसे अपने साथ ले जाते हैं। जो इस दिन जल का दान करता है, प्यासे को पानी पिलाता है, उसे भी बड़ा पुण्य मिलता है।

भीमसेन ने पूरे संकल्प के साथ यह व्रत रखा। दिन भर की गर्मी और भूख-प्यास से वे इतने थक गए कि अगली सुबह तक उनका शरीर ढीला पड़ गया, पर उन्होंने व्रत नहीं तोड़ा। द्वादशी की सुबह स्नान-पूजा और दान के बाद ही उन्होंने जल ग्रहण किया। तभी से इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी और पांडव एकादशी भी कहा जाने लगा।

इस कथा की सबसे सुंदर बात यह है कि व्यासजी ने भीम को उनकी कमज़ोरी के लिए डाँटा नहीं, बल्कि उनके बस का रास्ता दिखाया। इसीलिए जो लोग किसी कारण से हर महीने व्रत नहीं रख पाते, उनके लिए यह एकादशी एक बड़ा अवसर मानी जाती है।

निर्जला एकादशी पूजा विधि

  1. दशमी: एक दिन पहले शाम को हल्का सात्विक भोजन करें और खूब पानी पी लें, ताकि अगले दिन शरीर तैयार रहे।
  2. संकल्प: एकादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु के सामने निर्जल व्रत का संकल्प लें। आचमन के अलावा पूरे दिन जल न लें।
  3. पूजा: पीले वस्त्र पहनकर विष्णु जी को पीले फूल, पीला चंदन, तुलसी दल, फल और पंचामृत अर्पित करें। घी का दीपक जलाएँ।
  4. कथा: दोपहर से पहले परिवार के साथ बैठकर यह कथा पढ़ें और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जप करें।
  5. दान: इस दिन का सबसे बड़ा काम जल-दान है। मिट्टी के घड़े में पानी भरकर, ऊपर से ढककर, साथ में पंखा, छाता, खरबूजा, आम, चीनी और कुछ दक्षिणा दान करें। उत्तर भारत में कई जगह लोग इस दिन सड़क किनारे ठंडे शरबत की छबील लगाते हैं।
  6. आरती और जागरण: शाम को ॐ जय जगदीश हरे की आरती करें और हो सके तो रात में भजन करें।
  7. पारण: द्वादशी की सुबह सूर्योदय के बाद, हरि वासर बीतने पर, पूजा और दान करके पहले जल ग्रहण करें, फिर हल्का भोजन लें।

नियम और सावधानियाँ

  • पूरा निर्जल व्रत केवल वही रखें जिनका स्वास्थ्य साथ दे। बीमार व्यक्ति, गर्भवती या दूध पिलाने वाली माताएँ, बुज़ुर्ग और बच्चे जल और फल लेकर व्रत रखें — नीयत और श्रद्धा ही मुख्य है।
  • दिन में तेज़ धूप में बाहर काम करने से बचें और ठंडी जगह में रहें।
  • पारण के समय एकदम भारी भोजन न करें; पहले पानी, फिर फल या हल्का खाना लें।
  • इस दिन चावल नहीं खाया जाता और तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते।
  • किसी प्यासे को पानी पिलाने से मना न करें; यही इस व्रत का भाव है।

इस साल निर्जला एकादशी की तिथि और पारण का समय निर्जला एकादशी पृष्ठ पर देखें। एकादशी देवी के जन्म की मूल कथा एकादशी व्रत कथा में है, और साल भर की बाकी तिथियाँ एकादशी कैलेंडर में मिल जाएँगी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

निर्जला एकादशी कब होती है?

निर्जला एकादशी ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को होती है, जो आमतौर पर मई के अंत या जून में पड़ती है। यह गंगा दशहरा के अगले दिन आती है।

निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी क्यों कहते हैं?

भीमसेन भूख न सह पाने के कारण हर एकादशी का व्रत नहीं रख पाते थे। महर्षि व्यास के कहने पर उन्होंने केवल यही एक निर्जल व्रत रखा, इसलिए इसे भीमसेनी या पांडव एकादशी कहा जाता है।

क्या निर्जला एकादशी पर पानी पी सकते हैं?

परंपरा में सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक जल नहीं लिया जाता, केवल आचमन की अनुमति है। जो स्वास्थ्य कारणों से निर्जल नहीं रह सकते, वे जल और फल लेकर भी श्रद्धा से व्रत रख सकते हैं।

निर्जला एकादशी पर क्या दान करना चाहिए?

इस दिन जल से भरा मिट्टी का घड़ा, पंखा, छाता, खरबूजा, आम, शरबत, अन्न और वस्त्र का दान शुभ माना जाता है। प्यासे लोगों को पानी पिलाना सबसे बड़ा दान माना गया है।

निर्जला एकादशी का पारण कैसे करें?

द्वादशी की सुबह सूर्योदय के बाद, हरि वासर बीतने पर, भगवान की पूजा और दान करके पहले जल पिएँ, फिर हल्का भोजन लें। पारण द्वादशी तिथि खत्म होने से पहले कर लेना चाहिए।