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पापमोचनी एकादशी व्रत कथा: मेधावी ऋषि और अप्सरा मंजुघोषा

संक्षेप में:पापमोचनी एकादशी चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी को, होली और चैत्र नवरात्रि के बीच आती है। कथा में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी का तप अप्सरा मंजुघोषा के कारण भंग हुआ; क्रोध में उन्होंने उसे पिशाचिनी होने का श्राप दिया, और फिर इसी एकादशी के व्रत से दोनों अपने-अपने पाप से मुक्त हुए।

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पापमोचनी एकादशी चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी को आती है — होली के बाद और चैत्र नवरात्रि से कुछ दिन पहले। पापमोचनी का अर्थ है पापों से छुड़ाने वाली। हिंदू नववर्ष से पहले की यह आख़िरी एकादशी मानी जाती है, इसलिए बहुत-से लोग इसे पूरे साल की भूल-चूक के प्रायश्चित के रूप में रखते हैं। इसकी कथा भविष्योत्तर पुराण में मिलती है, जहाँ श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को बताते हैं कि यही प्रसंग कभी लोमश ऋषि ने राजा मान्धाता को सुनाया था।

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा

प्राचीन समय में कुबेर का चैत्ररथ नाम का एक बहुत सुंदर वन था। वहाँ हर समय वसंत जैसा मौसम रहता, फूल खिले रहते और कोयल कूकती रहती। गंधर्व कन्याएँ और अप्सराएँ वहाँ घूमने आतीं, और देवराज इंद्र भी देवताओं के साथ वहाँ विहार करते थे।

उसी वन में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी तपस्या करते थे। वे युवा थे, भगवान शिव के अनन्य भक्त थे और पूरी लगन से साधना में लगे रहते थे। उनके तप का तेज दूर तक फैलने लगा था।

कामदेव को यह बात खटकती थी, क्योंकि शिव के भक्तों से उसका पुराना बैर था। उसने मेधावी का तप भंग करने की ठानी और इस काम के लिए मंजुघोषा नाम की एक अप्सरा को चुना। मंजुघोषा जानती थी कि ऋषि के शाप से डरना चाहिए, इसलिए वह आश्रम से कुछ दूरी पर बैठ गई और वीणा बजाकर मधुर स्वर में गाने लगी।

उसके गीत की मिठास, वसंत की हवा और कामदेव का प्रभाव — तीनों ने मिलकर ऐसा असर किया कि मेधावी का मन ध्यान से उचट गया। वे गीत की आवाज़ की ओर खिंचे चले आए। मंजुघोषा को देखते ही वे अपनी साधना भूल गए और उसके साथ रहने लगे। धीरे-धीरे उन्हें न दिन का होश रहा, न रात का।

इसी तरह बहुत समय बीत गया। परंपरा में कहा गया है कि सत्तावन वर्ष निकल गए, पर मेधावी को लगता था मानो एक ही रात बीती हो। एक दिन मंजुघोषा ने कहा, ऋषिवर, अब मुझे स्वर्ग लौटने की आज्ञा दीजिए। मेधावी बोले, अभी तो शाम ही हुई है, सुबह चली जाना। मंजुघोषा ने मुस्कुराकर उन्हें याद दिलाया कि कितने वर्ष बीत चुके हैं।

यह सुनकर मेधावी को जैसे झटका लगा। उन्होंने गिनती की और समझ गए कि उनका इतना लंबा तप व्यर्थ चला गया। पछतावा क्रोध में बदल गया और उन्होंने सारा दोष मंजुघोषा पर डालते हुए उसे श्राप दे दिया — तुमने मेरा तप नष्ट किया है, जाओ, पिशाचिनी बन जाओ।

श्राप लगते ही मंजुघोषा का रूप बदलने लगा। वह काँपती हुई ऋषि के पैरों में गिर पड़ी और बोली, ऋषिवर, मैंने जो किया, किसी और के कहने पर किया। आपके साथ इतने वर्ष बिताए हैं, उसका ख़याल करके दया कीजिए और इस श्राप से छूटने का उपाय बताइए।

मेधावी का क्रोध कुछ शांत हुआ। उन्होंने कहा, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में पापमोचनी नाम की एकादशी आती है। उसका व्रत विधि से करो, इससे तुम्हारा श्राप और पाप दोनों दूर हो जाएँगे।

फिर मेधावी अपने पिता च्यवन ऋषि के आश्रम पहुँचे। पुत्र का बुझा हुआ तेज देखकर च्यवन समझ गए कि कुछ ठीक नहीं है। मेधावी ने सब सच-सच बता दिया। च्यवन ऋषि ने गंभीर होकर कहा, बेटा, तुमने केवल तप ही नहीं खोया, एक स्त्री को श्राप देकर भी पाप किया है। तुम्हें भी पापमोचनी एकादशी का व्रत करना चाहिए।

पिता की आज्ञा से मेधावी ने भी पूरी श्रद्धा से यह व्रत रखा। उधर मंजुघोषा ने भी वन में रहकर इसी एकादशी का उपवास किया और भगवान विष्णु का स्मरण किया। व्रत के प्रभाव से मंजुघोषा पिशाच योनि से मुक्त होकर फिर से दिव्य रूप में स्वर्ग लौट गई, और मेधावी के पाप धुल गए; उनका तेज फिर लौट आया।

श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि यह एकादशी जाने-अनजाने हुए पापों को काटने वाली है, और इसकी कथा पढ़ने-सुनने से भी मन शुद्ध होता है। कथा का संदेश साफ़ है — भूल किसी एक की नहीं थी, और सुधार का रास्ता दोनों के लिए खुला था।

पापमोचनी एकादशी पूजा विधि

  1. दशमी: एक दिन पहले सात्विक भोजन करें और मन में व्रत का निश्चय करें।
  2. संकल्प: एकादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु के सामने हाथ में जल लेकर संकल्प करें और अपनी जानी-अनजानी भूलों के लिए क्षमा माँगें।
  3. पूजा: विष्णु जी को पीले फूल, चंदन, तुलसी दल, धूप-दीप, फल और पंचामृत अर्पित करें। घी का दीपक जलाएँ।
  4. कथा और जप: यह कथा पढ़ें, विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें या ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जप करें।
  5. आरती: ॐ जय जगदीश हरे की आरती करें।
  6. जागरण: रात में भजन-कीर्तन करें; हो सके तो पूरी रात।
  7. पारण: द्वादशी की सुबह हरि वासर के बाद ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन, अन्न या वस्त्र दान करके व्रत खोलें।

नियम और सावधानियाँ

  • व्रत के दिन क्रोध से विशेष रूप से बचें — कथा में सबसे बड़ी भूल क्रोध में दिया गया श्राप ही था।
  • किसी की निंदा, झूठ और कठोर वचन से बचें।
  • चावल और अनाज न खाएँ; फलाहार में कुट्टू, सिंघाड़ा, साबूदाना, फल और दूध लें।
  • बीमार, बुज़ुर्ग और गर्भवती महिलाएँ हल्का फलाहार लेकर व्रत रखें।

इस साल की तिथि और पारण का समय पापमोचनी एकादशी पृष्ठ पर देखें। एकादशी देवी के जन्म की मूल कथा एकादशी व्रत कथा में है, और बाकी तिथियाँ एकादशी कैलेंडर में मिलेंगी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पापमोचनी एकादशी कब होती है?

पापमोचनी एकादशी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को होती है, जो होली के बाद और चैत्र नवरात्रि से पहले, मार्च या अप्रैल में पड़ती है।

पापमोचनी एकादशी की कथा क्या है?

च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी का तप अप्सरा मंजुघोषा के कारण भंग हुआ और उन्होंने उसे पिशाचिनी होने का श्राप दिया। फिर दोनों ने पापमोचनी एकादशी का व्रत रखा और अपने-अपने पाप से मुक्त हुए।

पापमोचनी एकादशी का क्या महत्व है?

मान्यता है कि यह व्रत जाने-अनजाने हुए पापों से मुक्ति देता है। हिंदू नववर्ष से पहले की आख़िरी एकादशी होने के कारण इसे साल भर की भूलों के प्रायश्चित के रूप में भी रखा जाता है।

पापमोचनी एकादशी की कथा किस पुराण में है?

यह कथा भविष्योत्तर पुराण में है, जहाँ श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को लोमश ऋषि और राजा मान्धाता का संवाद सुनाते हैं।

पापमोचनी एकादशी पर क्या दान करें?

इस दिन अन्न, वस्त्र, फल, जल का घड़ा और ज़रूरतमंदों को भोजन दान करना शुभ माना जाता है। दान द्वादशी को पारण से पहले किया जाता है।