वैष्णव जन तो तेने कहिये
संक्षेप में:वैष्णव जन तो तेने कहिये गुजरात के संत कवि नरसिंह मेहता का गुजराती पद है, जो बताता है कि सच्चा वैष्णव वही है जो दूसरों की पीड़ा समझे, सच बोले और लोभ-कपट से दूर रहे। यह महात्मा गांधी का प्रिय भजन था और प्रार्थना सभाओं में गाया जाता है।
पाठ
वैष्णव जन तो तेने कहिये
जे पीड परायी जाणे रे ।
पर दुःखे उपकार करे तो ये
मन अभिमान न आणे रे ॥
सकळ लोकमां सहुने वंदे,
निंदा न करे केनी रे ।
वाच काछ मन निश्चल राखे,
धन धन जननी तेनी रे ॥
समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी,
परस्त्री जेने मात रे ।
जिह्वा थकी असत्य न बोले,
परधन नव झाले हाथ रे ॥
मोह माया व्यापे नहि जेने,
दृढ़ वैराग्य जेना मनमां रे ।
रामनाम शु ताळी रे लागी,
सकळ तीरथ तेना तनमां रे ॥
वणलोभी ने कपटरहित छे,
काम क्रोध निवार्या रे ।
भणे नरसैयो तेनुं दरसन करतां,
कुळ एकोतेर तार्या रे ॥
वैष्णव जन तो तेने कहिये: नरसिंह मेहता का पद
"वैष्णव जन तो तेने कहिये" गुजरात के संत कवि नरसिंह मेहता (नरसी मेहता) का पद है, जिन्हें गुजराती भक्ति-काव्य का आदि कवि माना जाता है। पंद्रहवीं सदी में जूनागढ़ में रहे नरसिंह मेहता कृष्ण के भक्त थे, और उनके जीवन से जुड़ी "नानी बाई रो मायरो" जैसी कथाएँ आज भी राजस्थान और गुजरात में गाई जाती हैं। यह पद मूल रूप से गुजराती में है; यहाँ उसे देवनागरी लिपि में वैसे ही लिखा गया है, जैसे यह आम तौर पर छपता और गाया जाता है। महात्मा गांधी को यह भजन बहुत प्रिय था और साबरमती आश्रम की प्रार्थना में यह रोज़ गाया जाता था।
इस पद की खास बात यह है कि इसमें वैष्णव की पहचान तिलक, माला या कर्मकांड से नहीं, बल्कि उसके आचरण से की गई है: दूसरों का दर्द समझना, सच बोलना, लोभ और कपट से दूर रहना।
अंतरा-दर-अंतरा अर्थ (हिंदी में)
टेक: पराई पीड़ा समझने वाला
सच्चा वैष्णव उसी को कहिए जो दूसरों की पीड़ा को अपनी तरह समझे। जो दुखी की मदद करे, फिर भी मन में इस बात का घमंड न आने दे।
दूसरा अंतरा: सबका आदर
वह संसार में सबको प्रणाम करता है, किसी की निंदा नहीं करता। वाणी, आचरण (काछ) और मन, तीनों को स्थिर और पवित्र रखता है। ऐसे व्यक्ति की माँ धन्य है।
तीसरा अंतरा: समदृष्टि और सत्य
वह सबको एक नज़र से देखता है और तृष्णा छोड़ चुका है। पराई स्त्री को माँ के समान मानता है, उसकी जीभ कभी झूठ नहीं बोलती, और वह पराए धन को हाथ नहीं लगाता।
चौथा अंतरा: वैराग्य और राम-नाम
उसे मोह-माया नहीं घेरती, उसके मन में दृढ़ वैराग्य है। राम-नाम से उसकी लगन (ताळी) लगी है, इसलिए सारे तीर्थ उसके शरीर में ही बसते हैं।
पाँचवाँ अंतरा: नरसिंह की छाप
वह लोभ और कपट से रहित है, उसने काम और क्रोध को जीत लिया है। नरसैयो (नरसिंह) कहते हैं: ऐसे व्यक्ति के दर्शन मात्र से इकहत्तर पीढ़ियाँ तर जाती हैं।
कब और कैसे गाएँ
यह भजन सुबह-शाम की प्रार्थना, स्कूलों की सभा और सत्संग में गाया जाता है। एकादशी के कीर्तन में, और कृष्ण जन्माष्टमी पर कृष्ण-भक्ति के भजनों के साथ भी यह खूब सुनाई देता है। गांधी-परंपरा की प्रार्थना सभाओं में इसके साथ रघुपति राघव राजा राम की धुन गाई जाती है। गुजराती उच्चारण, जैसे "जाणे", "आणे" में मूर्धन्य "ण", को सँभालकर गाएँ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वैष्णव जन तो तेने कहिये किसने लिखा?
यह पंद्रहवीं सदी के गुजराती संत कवि नरसिंह मेहता (नरसी मेहता) का पद है।
यह भजन किस भाषा में है?
यह मूल रूप से गुजराती में है। हिंदी भाषी इसे देवनागरी लिपि में पढ़ते-गाते हैं, जैसा यहाँ दिया गया है।
'पीड परायी जाणे रे' का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है जो दूसरों की पीड़ा को जानता और समझता है।
'कुळ एकोतेर तार्या' का क्या मतलब है?
इसका अर्थ है कि ऐसे वैष्णव के दर्शन से इकहत्तर पीढ़ियाँ तर जाती हैं, यानी उसका पुण्य बहुत बड़ा है।
गांधी जी से इस भजन का क्या संबंध है?
यह महात्मा गांधी का प्रिय भजन था और उनके आश्रम की रोज़ की प्रार्थना में गाया जाता था।
