मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो
संक्षेप में:मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो सूरदास का वात्सल्य पद है, जिसमें माखन चुराते पकड़े गए बालकृष्ण माँ यशोदा के सामने भोली दलीलें देते हैं और आखिरकार यशोदा हँसकर उन्हें गले लगा लेती हैं। इसे जन्माष्टमी पर खूब गाया जाता है।
पाठ
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ।
भोर भयो गैयन के पाछे, मधुवन मोहिं पठायो ।
चार पहर बंसीबट भटक्यो, साँझ परे घर आयो ॥
मैं बालक बहिंयन को छोटो, छींको किहि बिधि पायो ।
ग्वाल बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो ॥
तू जननी मन की अति भोरी, इनके कहे पतिआयो ।
जिय तेरे कछु भेद उपजि है, जानि परायो जायो ॥
यह लै अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो ।
सूरदास तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो ॥
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो: सूरदास का वात्सल्य पद
"मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो" महाकवि सूरदास का पद है। सूरदास पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी में ब्रज में रहे, वल्लभाचार्य के शिष्य बने और श्रीनाथजी की सेवा में कीर्तन गाते रहे। उनके सूरसागर के पदों में बालकृष्ण की शरारतों और यशोदा के प्रेम (वात्सल्य रस) का जैसा सजीव चित्रण है, वैसा हिंदी साहित्य में कहीं और कम मिलता है। यह पद उसी का सबसे प्यारा उदाहरण है, जिसमें माखन चुराते पकड़े गए नन्हे कान्हा माँ के सामने अपनी सफाई देते हैं।
यह पद एनसीईआरटी की कक्षा 6 की हिंदी पुस्तक "मल्हार" में भी है, जहाँ पहली पंक्ति "मैया मैं नहिं माखन खायो" और एक पंक्ति "तू माता मन की अति भोरी" के रूप में छपी है। भजन-गायन में जो रूप सबसे ज़्यादा सुना जाता है, वही यहाँ दिया गया है।
अंतरा-दर-अंतरा अर्थ
टेक: मैंने माखन नहीं खाया
कान्हा कहते हैं: हे मेरी मैया, मैंने माखन नहीं खाया।
पहली दलील: मैं तो दिन भर बाहर था
सुबह होते ही तूने मुझे गायों के पीछे मधुवन भेज दिया। चारों पहर (पूरा दिन) मैं बंसीवट पर भटकता रहा और शाम होने पर ही घर लौटा हूँ, तो माखन कब खाता?
दूसरी दलील: मेरे हाथ छोटे हैं
मैं तो छोटा-सा बालक हूँ, मेरी बाँहें छोटी हैं; ऊँचे टँगे छींके तक मैं कैसे पहुँचता? सारे ग्वाल-बाल मेरे पीछे पड़े हैं, उन्होंने ही ज़बरदस्ती मेरे मुँह पर माखन लपेट दिया है।
तीसरी दलील: माँ का मन
तू माँ मन की बहुत भोली है, इनकी बातों में आ गई। लगता है तेरे मन में कुछ भेद आ गया है, तू मुझे पराया जाया (किसी और का बेटा) समझने लगी है।
रूठना और गले लगाना
यह ले अपनी लाठी और कंबली, तूने मुझे बहुत नाच नचाया है। सूरदास कहते हैं कि यह सुनकर यशोदा हँस पड़ीं और कान्हा को उठाकर छाती से लगा लिया।
कब और कैसे गाएँ
यह पद कृष्ण जन्माष्टमी की झाँकियों और भजन संध्या में सबसे ज़्यादा गाया जाता है, और जन्माष्टमी का व्रत रखने वाले जन्माष्टमी व्रत कथा के बाद इसे गाते हैं। लड्डू गोपाल की सेवा करने वाले घरों में माखन-मिश्री का भोग लगाते समय भी इसे गुनगुनाया जाता है। भजन के बाद आरती कुंजबिहारी की करें। बच्चों को इसे अभिनय के साथ गवाना ब्रज में पुरानी परंपरा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो किसने लिखा?
यह ब्रज के महाकवि सूरदास का पद है, जो उनके सूरसागर की बाल-लीला परंपरा से है।
इस पद में कौन-सा रस है?
इसमें वात्सल्य रस है, यानी माँ और बच्चे के बीच का स्नेह।
'छींको किहि बिधि पायो' का अर्थ क्या है?
छींका रस्सी से ऊँचा टँगा बर्तन रखने का जाल होता है। कान्हा पूछते हैं कि मेरे छोटे हाथ उस ऊँचे छींके तक कैसे पहुँचते?
क्या यह पद स्कूल की किताब में भी है?
हाँ, यह एनसीईआरटी की कक्षा 6 की हिंदी पुस्तक 'मल्हार' में 'मैया मैं नहिं माखन खायो' शीर्षक से है।
यह भजन कब गाया जाता है?
जन्माष्टमी, लड्डू गोपाल की सेवा, कृष्ण भजन संध्या और बच्चों के कार्यक्रमों में यह भजन खूब गाया जाता है।
