Bhaktise – भक्ति से

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई

भजनश्री कृष्णरचना: मीराबाई

संक्षेप में:मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई मीराबाई का पद है, जिसमें वे घोषणा करती हैं कि श्रीकृष्ण ही उनके पति और सर्वस्व हैं, और उनके लिए उन्होंने कुल-मर्यादा और राजसी वैभव छोड़ दिया। इसे जन्माष्टमी और कृष्ण भजन संध्या में गाया जाता है।

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पाठ

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई।।

जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।

तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई।।

छांडि दई कुलकी कानि कहा करिहै कोई।

संतन ढिग बैठि बैठि लोकलाज खोई।।

चुनरी के किये टूक ओढ़ लीन्ही लोई।

मोती मूंगे उतार बनमाला पोई।।

अंसुवन जल सीचि सीचि प्रेम बेलि बोई।

अब तो बेल फैल गई आंणद फल होई।।

दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से बिलोई।

माखन जब काढ़ि लियो छाछ पिये कोई।।

भगति देखि राजी हुई जगत् देखि रोई।

दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही।।

मेरे तो गिरधर गोपाल: मीरा का समर्पण

"मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई" मीराबाई का वह पद है जिसमें उनका पूरा जीवन सिमट आया है। मेवाड़ के राजघराने में ब्याही मीरा ने गिरधर गोपाल, यानी गोवर्धन पर्वत उठाने वाले श्रीकृष्ण, को ही अपना पति माना। घरवालों और समाज ने विरोध किया, पर मीरा साधु-संतों के बीच बैठकर भजन गाती रहीं। यह पद उसी दृढ़ता की घोषणा है। इसकी भाषा राजस्थानी और ब्रज मिली हुई है, और यह कई पाठ्यपुस्तकों में भी पढ़ाया जाता है।

लोकगायन में कई गायक इसके कुछ ही अंतरे गाते हैं, कुछ "कोई कहे कारो, कोई कहे गोरो" जैसी पंक्तियाँ जोड़ते हैं, जो दूसरे पदों से आई हैं। यहाँ भारतकोश (bharatdiscovery.org) पर दिया गया पूरा पाठ रखा गया है।

अंतरा-दर-अंतरा अर्थ

टेक और पहला अंतरा

मेरे तो बस गिरधर गोपाल हैं, दूसरा कोई नहीं। जिनके सिर पर मोर-मुकुट है, वही मेरे पति हैं। पिता, माता, भाई, बंधु, कोई भी अब मेरा अपना नहीं।

कुल की मर्यादा छोड़ना

मैंने कुल की लाज-मर्यादा छोड़ दी है, अब कोई मेरा क्या कर लेगा? संतों के पास बैठ-बैठकर मैंने लोकलाज खो दी है, यानी समाज क्या कहेगा, इसकी चिंता नहीं रही।

रानी से जोगन

मैंने रेशमी चुनरी के टुकड़े कर दिए और साधारण कंबल (लोई) ओढ़ ली। मोती-मूँगे के गहने उतारकर वनफूलों की माला पिरो ली।

प्रेम की बेल

आँसुओं के जल से सींच-सींचकर मैंने प्रेम की बेल बोई। अब वह बेल फैल गई है और उस पर आनंद के फल लगे हैं।

दूध से मक्खन

मैंने दूध की मथनी को बड़े प्रेम से बिलोया, मक्खन (भक्ति का सार) निकाल लिया; अब छाछ (संसार की बातें) जो चाहे पिए।

मीरा की छाप

भक्ति को देखकर मैं प्रसन्न हुई और संसार की हालत देखकर रो पड़ी। दासी मीरा कहती हैं: हे लाल गिरधर, अब मुझे तार दो।

कब और कैसे गाएँ

यह पद कृष्ण-भजन संध्या, एकादशी के कीर्तन और सुबह की पूजा में खूब गाया जाता है। कृष्ण जन्माष्टमी पर और गोवर्धन पूजा पर, जब गिरधर रूप की पूजा होती है, इसका खास महत्व है। मीरा का दूसरा प्रसिद्ध पद पायो जी मैंने राम रतन धन पायो भी साथ में गाया जाता है, और कीर्तन के बाद आरती कुंजबिहारी की की जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मेरे तो गिरधर गोपाल किसने लिखा?

यह सोलहवीं सदी की संत कवयित्री मीराबाई का पद है।

'गिरधर गोपाल' का अर्थ क्या है?

गिरधर का अर्थ है गिरि (पर्वत) धारण करने वाले, यानी गोवर्धन पर्वत उठाने वाले श्रीकृष्ण। गोपाल यानी गायों के पालक।

'छांडि दई कुल की कानि' का क्या मतलब है?

इसका अर्थ है कि मीरा ने अपने कुल की लाज और सामाजिक मर्यादा की परवाह छोड़ दी, क्योंकि उनके लिए कृष्ण-भक्ति सबसे ऊपर थी।

इस भजन के बोल अलग-अलग क्यों सुनाई देते हैं?

मीरा के पद लोकगायन से चले, इसलिए गायक कुछ अंतरे छोड़ देते हैं या दूसरे पदों की पंक्तियाँ जोड़ लेते हैं। मूल भाव सब में एक है।

यह पद कब गाया जाता है?

कृष्ण जन्माष्टमी, गोवर्धन पूजा, एकादशी के कीर्तन और रोज़ की पूजा में इसे गाया जाता है।