पायो जी मैंने राम रतन धन पायो
संक्षेप में:पायो जी मैंने राम रतन धन पायो मीराबाई का पद है, जिसमें वे कहती हैं कि सतगुरु की कृपा से उन्हें राम-नाम का ऐसा अनमोल धन मिला है जो न घटता है, न लुटता है। इसे सत्संग, गुरु पूर्णिमा और जन्माष्टमी की भजन संध्या में गाया जाता है।
पाठ
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ॥
वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु किरपा करि अपनायो ।
जनम जनम की पूंजी पाई जग में सभी खोवायो ।
खरचै न खूटै चोर न लूटै दिन दिन बढ़त सवायो ।
सत की नाव खेवटिया सतगुरु भवसागर तर आयो ।
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर हरष हरष जस गायो ॥
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो: मीराबाई का पद
"पायो जी मैंने राम रतन धन पायो" मीराबाई का सबसे ज़्यादा गाया जाने वाला पद है। मीरा (लगभग 1498–1547) मेवाड़ के राजघराने की बहू थीं, पर उन्होंने बचपन से ही गिरिधर गोपाल, यानी श्रीकृष्ण, को अपना पति और सर्वस्व माना। राजसी बंधनों और विरोध के बीच भी वे साधुओं की संगत में भजन गाती रहीं। परंपरा में संत रैदास को उनका गुरु माना जाता है, और इस पद में "सतगुरु" की कृपा का जो ज़िक्र है, उसे इसी से जोड़ा जाता है।
मीरा के पद राजस्थानी, ब्रज और गुजराती के मेल वाली भाषा में हैं और लोकगायकों के मुँह से सदियों तक चलते रहे, इसलिए एक ही पद के कई पाठ मिलते हैं। पुराने संकलनों में इसकी पहली पंक्ति "पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो" और "वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरु" के रूप में मिलती है। आज भजन-मंडलियों में जो रूप गाया जाता है, वही यहाँ दिया गया है।
पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ
टेक: राम रूपी रत्न
मीरा कहती हैं: मैंने राम-नाम रूपी रत्न का धन पा लिया है। यहाँ "राम" का अर्थ हर कण में रमे हुए परमात्मा से है, जो मीरा के लिए गिरिधर गोपाल ही हैं।
सतगुरु की देन
मेरे सतगुरु ने कृपा करके मुझे अपनाया और यह अनमोल वस्तु दी। मुझे जन्म-जन्म की पूँजी मिल गई, और इसके बदले मैंने दुनिया का सब कुछ छोड़ दिया, यानी सांसारिक मोह अब खो गया।
ऐसा धन जो घटता नहीं
यह धन खर्च करने से खत्म नहीं होता, न कोई चोर इसे लूट सकता है; उल्टे यह दिन-दिन सवाया बढ़ता जाता है। सत्य की नाव है और सतगुरु उसके खेवनहार हैं, इसी नाव से मैं भवसागर पार कर आई हूँ।
मीरा की छाप
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर हैं, और वे बार-बार हर्षित होकर उनका यश गाती हैं।
कब और कैसे गाएँ
यह पद सत्संग, कीर्तन और सुबह की पूजा में खूब गाया जाता है। गुरु पूर्णिमा पर गुरु-कृपा के भाव के कारण इसका विशेष चलन है, और कृष्ण जन्माष्टमी की भजन संध्या में भी यह ज़रूर सुनाई देता है। इसके साथ मीरा का दूसरा प्रसिद्ध पद मेरे तो गिरिधर गोपाल गाया जा सकता है, और कीर्तन के समापन पर आरती कुंजबिहारी की की जा सकती है। टेक को हर अंतरे के बाद दोहराना परंपरागत तरीका है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो किसने लिखा?
यह संत कवयित्री मीराबाई का पद है, जो सोलहवीं सदी में मेवाड़ में हुईं।
मीराबाई तो कृष्ण भक्त थीं, फिर इस भजन में राम क्यों?
यहाँ 'राम' का अर्थ सर्वत्र रमे हुए परमात्मा और उनके नाम से है। पद के आखिर में मीरा अपने प्रभु को गिरिधर नागर ही कहती हैं।
इस भजन में 'सतगुरु' कौन हैं?
परंपरा में संत रैदास को मीरा का गुरु माना जाता है, इसलिए सतगुरु को उन्हीं से जोड़ा जाता है।
'खरचै न खूटै चोर न लूटै' का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है कि राम-नाम का धन खर्च करने से कम नहीं होता और कोई चोर इसे लूट नहीं सकता; यह रोज़ बढ़ता ही है।
इस पद के बोल अलग-अलग क्यों मिलते हैं?
मीरा के पद लोकगायन से पीढ़ियों तक चले, इसलिए कई पाठ बन गए। पुराने संकलनों में 'पायो जी म्हें तो' जैसा राजस्थानी रूप मिलता है।
