गुरु पूर्णिमा
गुरु पूर्णिमा क्या है और क्यों मनाते हैं
गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। इस दिन शिष्य अपने गुरु की पूजा करते हैं और जीवन में राह दिखाने वाले हर व्यक्ति के प्रति आभार जताते हैं। परंपरा के अनुसार इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं।
वेदव्यास ने वेदों को चार भागों में बाँटा, महाभारत की रचना की और पुराणों को रूप दिया। उन्हें आदि गुरु माना जाता है, इसलिए इस दिन की पहली पूजा व्यास जी की होती है। बौद्ध परंपरा भी इस पूर्णिमा को मानती है, क्योंकि माना जाता है कि भगवान बुद्ध ने सारनाथ में अपना पहला उपदेश इसी दिन दिया था।
किस तिथि को
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा, उदया तिथि के अनुसार, यानी जिस दिन सूर्योदय के समय पूर्णिमा हो। यह दिन आषाढ़ पूर्णिमा ही है। उत्तर भारत में अगले दिन से सावन शुरू हो जाता है।
कैसे मनाते हैं
- सुबह स्नान के बाद साफ आसन पर व्यास जी, अपने गुरु या इष्ट देव का चित्र रखकर चंदन, फूल, अक्षत और फल से पूजा।
- दीक्षा लेने वाले शिष्य गुरु के पास जाकर चरण वंदन करते हैं, गुरु दक्षिणा देते हैं और गुरु मंत्र का जप करते हैं।
- मठों और आश्रमों में व्यास पूजा, भंडारा और प्रवचन होते हैं; संन्यासी यहीं से चातुर्मास्य का संकल्प लेते हैं।
- जिनका कोई दीक्षा गुरु नहीं, वे माता-पिता, शिक्षक या भगवान शिव को (जो जगद्गुरु माने जाते हैं) गुरु मानकर प्रणाम करते हैं।
- पूर्णिमा होने से सत्यनारायण कथा और शाम को चंद्र अर्घ्य भी कई घरों में होता है।
क्षेत्रीय परंपराएँ
मथुरा-वृंदावन में गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा के लिए इस दिन बड़ी भीड़ रहती है, जिसे मुड़िया पूनो मेला कहते हैं। हरिद्वार, काशी और प्रयागराज में संत-महंत अपने शिष्यों से मिलते हैं। स्कूलों और संगीत घरानों में भी गुरु वंदना की परंपरा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गुरु पूर्णिमा किस तिथि को होती है?
इसे व्यास पूर्णिमा क्यों कहते हैं?
जिनका कोई गुरु नहीं है, वे क्या करें?
गुरु पूर्णिमा पर क्या दान करें?
क्या गुरु पूर्णिमा पर व्रत रखा जाता है?
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