श्री दत्त गुरु पंचकं
सुनीलमणिभासुरादृतसुरातवार्ता सुरा-
सुरावितदुराशरावितनरावराशांबरा |
वरादरकरा कराक्षणधरा धरापादराद
रारवपरा परा तनुरिमां स्मराम्यादरात् ||1||
सदादृतपदा पदाहृतपदा सदाचारदा
सदानिजहृदास्पदा शुभरदा मुदासम्मदा |
मदांतकपदा कदापि तव दासदारिद्रहा
वदान्यवरदास्तु मेऽन्तर उदारवीरारिहा ||2||
जयाजतनयाभया सदुदया दयार्द्राशया
शयात्तविजयाजया तव तनुस्तया हृत्स्थया |
नयादरदया दयाविशदया वियोगोनया
तयाश्रय न मे हृदास्तु शुभया भया भातया ||3||
चिदात्यय उरुं गुरुं यमृषयोऽपि चेरुर्गुरुः
स्वशांतिविजितागुरुः समभवत्स पृथ्वीगुरुः |
अजं भवरुजं हरंतमुषिजं नरा अत्रिजं
भजंतु तमधोक्षजं सुमनसाऽनसूयात्मजं ||4||
नमोऽस्तु गुरवे स्वकल्पतरवेऽत्र सर्वोरवे
रवेरधिरुचे शुचे मलिनभक्तहृत्कारवे |
अवेहि तव किंकरं शिरसि धेहि मे शंकरं
करं तव वरं वरं न च परं वृणे शंकरं ||5||
इति श्रीवासुदेवानंदसरस्वतीविरचितं श्रीदत्तगुरुपंचकं संपूर्णं |
अर्थ
यह श्री दत्त गुरु पंचकं एक अत्यंत पवित्र पंचश्लोकी स्तोत्र है, जो दिव्य ज्ञान के स्वरूप श्री दत्तात्रेय स्वामी की स्तुति करता है। परम पूज्य श्री वासुदेवानंद सरस्वती स्वामीजी (टेंभे स्वामी महाराज) द्वारा रचित यह स्तोत्र लोक को गुरुतत्व की महिमा को अपनी सुंदर और गहन संस्कृत शैली में प्रतिपादित करता है। दत्तगुरु केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक दिव्य सिद्धांत हैं; वे त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का अवतार हैं, और भक्तों के हृदय में निवास करने वाली दयामय चेतना हैं। वे सृष्टि, स्थिति और लय के कर्ता हैं; भक्तों के दुःख, अज्ञान और पाप को दूर करने वाले सद्गुरु हैं।
इस स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक दत्तगुरु के विशिष्ट गुणों और महिमा को उजागर करता है। पहले श्लोक में, दत्तगुरु को सभी लोकों का रक्षक, धर्म का आधार और पृथ्वी के प्रति असीम करुणाशील बताया गया है। उनका आश्रय सभी जीवों को सुरक्षा और शांति प्रदान करता है। दूसरे श्लोक में, वे शरणागतों को दरिद्रता से बचाकर, उन्हें शुभ और आनंद प्रदान करने वाले महान दाता के रूप में वर्णित हैं। वे अंतरात्मा में निवास करने वाले वीरारिहा (आंतरिक शत्रुओं, अज्ञान का नाश करने वाले) हैं, जिससे भक्तों को निर्भयता मिलती है।
तीसरा श्लोक बताता है कि दत्तगुरु दया का साक्षात् रूप हैं, वे भक्तों के हृदय में स्थित हैं और भय को दूर करने वाली शुभ शक्ति हैं। जब उनकी दयालु काया हृदय में स्थित होती है, तो सभी प्रकार के भय और बाधाएं दूर हो जाती हैं। चौथे श्लोक में, दत्तगुरु को माता अनसूया और महर्षि अत्रि के पुत्र, त्रिमूर्ति स्वरूप और ज्ञानमूर्ति के रूप में स्तुति की गई है। इसमें यह भी बताया गया है कि ऋषि-मुनि भी उन्हें परम गुरु के रूप में स्वीकार करते हैं। उनकी ज्ञान ज्योति अज्ञान के अंधकार को दूर करती है।
अंत में, पांचवें श्लोक में, भक्त गुरु को सर्वोच्च कल्पवृक्ष के समान मानता है और केवल उनके आश्रय की कामना करता है; वह किसी अन्य भौतिक या अलौकिक वरदान की इच्छा नहीं करता। वह गुरु के चरणों में नमन कर केवल उनकी कृपा मांगता है। इस स्तोत्र का नियमित पाठ दत्तगुरु का अनुग्रह प्राप्त करने, आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त करने और लौकिक कष्टों से मुक्ति पाने का एक शक्तिशाली साधन है।
गुरुवार, पूर्णिमा या प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद 'श्री गुरुदेव दत्त' जप के साथ प्रार्थना शुरू करें और पंचश्लोक का भक्तिपूर्वक पाठ करें। अंत में दत्तात्रेय के चरणों का ध्यान करने से मन को शांति मिलती है।
लाभ (Benefits):
- दत्तगुरु की कृपा: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से श्री दत्तात्रेय स्वामी की असीम कृपा प्राप्त होती है, जो आध्यात्मिक और भौतिक जीवन में समृद्धि लाती है।
- ज्ञान और शांति: चूंकि दत्तगुरु ज्ञान के स्वरूप हैं, उनकी स्तुति से ज्ञान, मन की शांति और आंतरिक सुख में वृद्धि होती है।
- भय और दुःख निवारण: दत्तगुरु भक्तों के भय, दुःख, पाप और अज्ञान को दूर करते हैं, जिससे जीवन में निर्भयता और आनंद प्राप्त होता है।
- संसार बंधन से मुक्ति: इस स्तोत्र का पाठ संसार चक्र के बंधनों से मुक्ति प्रदान करता है, मोक्ष के मार्ग को सुगम बनाता है।
- साहस और शक्ति: दत्तगुरु की शक्ति भक्तों में साहस और आत्मविश्वास भरती है, किसी भी कठिनाई का सामना करने की शक्ति प्रदान करती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री दत्त गुरु पंचकं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
श्री दत्त गुरु पंचकं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
किसे श्री दत्त गुरु पंचकं का पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री दत्त गुरु पंचकं स्तोत्र का मूल क्या है?
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