श्री दत्तात्रेय प्रार्थना
ॐ नमस्ते भगवन् श्रीसद्गुरुदेव-दत्तात्रेयाय नमो नमः ||1||
त्वं ब्रह्ममयोऽसि | त्वं आनंदमयोऽसि | त्वं विज्ञानमयोऽसि |
त्वं सत्यमयोऽसि | त्वं शांतिमयोऽसि | त्वं प्रेममयोऽसि |
त्वं निराकारो निरालंबो निर्विकल्पो निर्विषयो निरंजनो निरंकुशो
निरंतरो निराशयो निरामयो निर्धूतकल्मषोऽसि ||2||
त्वदाज्ञया तपंति रविशशि-तारामंडलाः |
त्वदाज्ञया विपुलधनधान्यवती वसुधा |
त्वदाज्ञया वहति वायुस्संदहत्यनलः | त्वदाज्ञयाऽऽकाशं सर्वं व्याप्नोति |
त्वदाज्ञया यथाकालं वर्षति पर्जन्यः | त्वदाज्ञया विकसंति कुसुमानि |
त्वदाज्ञया फलंति पादपाः | त्वदाज्ञया गायंति विहंगमः |
त्वदाज्ञया जीवंति चतुर्विधयोनयः |
त्वदाज्ञया देहे प्राणः संचरति निर्गच्छति देहात् ||3||
त्वं मनश्चित्तांतःकरणबुद्ध्यहंकार-प्रेरकोऽसि |
त्वं शमदम-तितिक्षावैराग्य-भक्तिप्रदायकोऽसि |
त्वं द्वंद्वदुःख-तिमिर-विध्वंसकोऽसि | त्वं मायापाश-निकृंतकोऽसि |
त्वं संसार-बंधनच्छेदकोऽसि |
त्वं सर्वसद्गुणकर्ताऽसि | त्वं सर्वदुर्गुणहर्ताऽसि | त्वं शांतिप्रदोऽसि |
त्वमानंदप्रदोऽसि | त्वं प्रेमप्रदोऽसि | त्वं सकलविघ्नहरोऽसि |
त्वमभयकरोऽसि | त्वं वरदवरोऽसि | त्वं निजपद-प्रदानकरोऽसि ||4||
ऋते त्वत् कोऽपि नेतरो वदान्यः | ऋते त्वत् कोऽपि नेतरः समर्थः |
ऋते त्वत् कोऽपि नेतरो दयालुः | ऋते त्वत् कोऽपि नेतरः क्षमाशीलः |
ऋते त्वत् कोऽपि नेतरो भक्तपालकः ||5||
त्वत्तः सकलैश्वर्य-भोगक्षमत्वं | त्वत्तः सकलवस्तु-रमणीयत्वं |
त्वत्तः कर्मज्ञानेंद्रिय-गणसमर्थत्वं | त्वत्तः सकलयोग-शक्तिमत्त्वं |
त्वत्तः परमवैराग्य-परबुद्धिमत्त्वं ||6||
त्वयि समुपस्थितं ब्रह्मांडोत्पत्ति-स्थितिलयबीजं |
त्वयि सुप्रतिष्ठितं संसृतिनाशनाद्वैत-भावनामूलं |
त्वयि सन्निहितं जन्ममृत्युभय-संहननसामर्थ्यं ||7||
कनक-कामिनी-कमनीयत्वात् त्राहि त्राहि मां |
काम-क्रोध-मोह-मद-मत्सरकोलाहलात् त्राहि त्राहि मां |
जन्म-जरा-मरण-त्रिदोषात् त्राहि त्राहि मां |
संसृति-दावानल-दह्यमानं पाहि पाहि मां |
विषयकर्दम-निमज्जमानं पाहि पाहि मां |
भयकर-कालदंड-निपीडयमानं पाहि पाहि मां |
धर्माचरण-दिङ्मूढोऽहं धैर्यं देहि देहि मे |
अहंकारमलिन-चित्तोऽहमभयं वरं देहि देहि मे |
त्वत् पदपंकज-शरणागतिं देहि देहि मे ||8||
विना त्वया नास्ति कोऽप्यन्य आपत्तिनिवारकः | त्वं प्रियतमा माताऽसि मे |
त्वं प्रियतमः पिताऽसि मे | त्वं प्रियतमो बंधुरसि मे |
त्वं प्रियतमं मित्रमसि मे | त्वं पूज्यतमः सद्गुरुवर्योऽसि मे |
ते कृपाहस्तं देहि मे शिरसि | ते पदतलकंजं देहि मे मनसि |
ते सुखकर-वासोऽस्तु मे वपुषि |
अनंत-जन्मपर्यंतं ते स्मरणं मे चित्तेऽस्तु ||9||
ॐ नमस्ते अत्रिपुत्राय | ॐ नमस्ते अवधूताय | ॐ नमस्ते हंसदेवाय |
ॐ नमस्ते सद्गुरुनाथाय | ॐ नमस्ते यतिनाथाय | ॐ नमस्ते शक्तिनाथाय |
ॐ नमस्ते सिद्धिनाथाय | ॐ नमस्ते मुक्तिनाथाय | ॐ नमस्ते जगन्नाथाय |
ॐ नमस्ते भगवते दत्तात्रेयाय |
ॐ नमस्ते परब्रह्मणे सच्चिदानंदमूर्तये मुनिवर्याय नमो नमः ||10 ||इति श्री दत्तात्रेय प्रार्थना||
अर्थ
श्री दत्तात्रेय प्रार्थना स्तोत्र भगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक अत्यंत दिव्य और शक्तिशाली स्तोत्र है, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के त्रिमूर्ति स्वरूप हैं। यह प्रार्थना भगवान दत्तात्रेय के सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, दयालु और भक्तों के रक्षक स्वरूप का अत्यंत गंभीर और विस्तृत वर्णन करती है। दत्तात्रेय को सद्गुरु के रूप में पूजा जाता है, जो भक्तों को भय, पाप और सांसारिक बंधनों से मुक्त करते हैं। यह स्तोत्र भक्त के निस्वार्थ समर्पण, ज्ञान योग और परमात्मा के साथ एकात्मता के भाव को प्रकट करता है।
यह प्रार्थना दत्तात्रेय को सच्चिदानंदमय, निराकार और माया से परे बताती है। इसमें वर्णन है कि सृष्टि में सूर्य, चंद्रमा, वायु, जल और सभी प्राणी उनकी आज्ञा से ही कार्य करते हैं। भक्त स्वीकार करता है कि मन, बुद्धि, भक्ति, शांति और प्रेम – ये सभी दत्तात्रेय का ही प्रसाद हैं। दया, क्षमा और करुणा में दत्तात्रेय के समान कोई नहीं है। स्तोत्र यह भी बताता है कि ऐश्वर्य, ज्ञान, योगशक्ति और वैराग्य हमें दत्तात्रेय से ही प्राप्त होते हैं। सृष्टि, स्थिति और लय के मूल कारण दत्तात्रेय ही हैं, ऐसी भावना इसमें ध्यान की जाती है। भक्त भय, कष्ट, पाप और मोह से रक्षा के लिए प्रार्थना करता है, और दत्तात्रेय गुरु को माता, पिता, बंधु, मित्र और सद्गुरु के रूप में स्वीकार करते हुए कृतज्ञता व्यक्त करता है। अंत में, विभिन्न नामों से दत्तात्रेय को नमस्कार करते हुए उनके सच्चिदानंद रूप का स्मरण किया जाता है।
इस प्रार्थना का प्रत्येक श्लोक भगवान की महिमा और भक्त की गहन भावनाओं को उजागर करता है। दत्तात्रेय केवल एक देवता नहीं, बल्कि समस्त ज्ञान के स्रोत और परम गुरु हैं। उनकी कृपा से ही मनुष्य लौकिक और अलौकिक सुखों को प्राप्त कर सकता है। यह प्रार्थना केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि भक्त के हृदय से निकलने वाली भगवान के साथ एक गहरी बातचीत है। इसका पाठ करने से मन को शांति, आत्मा को ज्ञान और जीवन को सार्थकता मिलती है। यह हमें माया के भ्रम से ऊपर उठकर आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है।
लाभ (Benefits):
- भय, पाप और सांसारिक बंधनों से मुक्ति: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से भक्त अपने सभी भय, संचित पापों और सांसारिक मोह-माया के बंधनों से मुक्त होते हैं, जिससे आत्मिक शांति मिलती है।
- दत्तगुरु कृपा और ज्ञानोदय: दत्तात्रेय गुरु की असीम कृपा प्राप्त होती है, जिससे आध्यात्मिक ज्ञान, विवेक और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त होता है।
- रोग और दरिद्रता का निवारण: भगवान दत्तात्रेय के आशीर्वाद से शारीरिक रोगों और आर्थिक कठिनाइयों का नाश होता है, जिससे स्वास्थ्य और समृद्धि प्राप्त होती है।
- पारिवारिक सुख और स्थिरता: यह प्रार्थना परिवार में शांति, सद्भाव और सुरक्षा प्रदान करती है, सभी प्रकार की बाधाओं से रक्षा करती है और पारिवारिक जीवन को स्थिर बनाती है।
- मानसिक शांति और वैराग्य: मन की चंचलता दूर होती है, जिससे गहरी मानसिक शांति और सांसारिक विषयों के प्रति वैराग्य का भाव उत्पन्न होता है, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री दत्तात्रेय प्रार्थना क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री दत्तात्रेय प्रार्थना के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
कौन श्री दत्तात्रेय प्रार्थना स्तोत्र का पाठ कर सकता है?
इस प्रार्थना का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री दत्तात्रेय प्रार्थना स्तोत्र का उद्गम क्या है?
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