कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा: कंस का कारागार, यमुना पार और गोकुल
संक्षेप में:कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को मनाई जाती है। कथा के अनुसार इसी रात रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में देवकी और वसुदेव के आठवें पुत्र श्रीकृष्ण जन्मे और वसुदेव उन्हें यमुना पार कर गोकुल में नंद-यशोदा के घर छोड़ आए।
कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है (दक्षिण भारत के अमांत पंचांग में यही दिन श्रावण कृष्ण अष्टमी कहलाता है)। मान्यता है कि इसी तिथि की आधी रात, रोहिणी नक्षत्र में, भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया। घर-घर में लोग दिन भर व्रत रखते हैं, लड्डू गोपाल को झूला झुलाते हैं और आधी रात को जन्म की आरती के बाद प्रसाद लेते हैं। कथा भागवत पुराण के दसवें स्कंध और विष्णु पुराण पर आधारित है।
जन्माष्टमी व्रत कथा
द्वापर युग में मथुरा पर राजा उग्रसेन का राज था। उनका बेटा कंस बहुत बलवान था, पर उतना ही क्रूर भी। उसने अपने पिता को ही कैद कर लिया और ख़ुद राजा बन बैठा। कंस अपनी चचेरी बहन देवकी को बहुत चाहता था। जब देवकी का विवाह यदुवंशी वसुदेव से हुआ, तो कंस ख़ुद रथ हाँककर बहन को विदा करने चला।
रास्ते में अचानक आकाशवाणी हुई, "अरे कंस, जिस बहन को तू इतने प्रेम से ले जा रहा है, उसी की आठवीं संतान तेरी मृत्यु का कारण बनेगी।" यह सुनते ही कंस का प्रेम डर में बदल गया। उसने तलवार निकाल ली और देवकी को मारने चला। वसुदेव ने हाथ जोड़कर कहा, "देवकी से तुम्हें कोई डर नहीं है। मैं वचन देता हूँ कि हमारी हर संतान जन्म लेते ही तुम्हें सौंप दूँगा।" कंस मान गया, पर उसने दोनों को कारागार में डाल दिया और पहरे बिठा दिए।
एक-एक करके देवकी की छह संतानें हुईं और कंस ने हर बच्चे को निर्दयता से मार डाला। सातवीं बार देवकी के गर्भ में शेषनाग के अवतार बलराम आए। भगवान की योगमाया ने उस गर्भ को चुपचाप गोकुल में रह रही वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया। कंस को बताया गया कि देवकी का गर्भ गिर गया।
फिर आठवीं बार देवकी गर्भवती हुईं। कंस ने पहरा और कड़ा कर दिया। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की वह रात थी। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, बादल गरज रहे थे। आधी रात को, रोहिणी नक्षत्र में, कारागार की कोठरी अचानक दिव्य प्रकाश से भर गई। भगवान विष्णु चार भुजाओं में शंख, चक्र, गदा और पद्म लिए देवकी-वसुदेव के सामने प्रकट हुए। उन्होंने बताया कि वे ही उनके पुत्र बनकर आए हैं, फिर एक साधारण नवजात शिशु का रूप ले लिया।
भगवान ने वसुदेव से कहा कि मुझे गोकुल में नंद बाबा के घर पहुँचा दो और वहाँ यशोदा की गोद में अभी-अभी जन्मी कन्या को यहाँ ले आओ। वसुदेव के हाथ-पैरों की बेड़ियाँ अपने आप खुल गईं। पहरेदार गहरी नींद में सो गए और कारागार के भारी दरवाज़े बिना आवाज़ के खुल गए।
वसुदेव ने नन्हे कृष्ण को एक टोकरी (सूप) में लिटाया, टोकरी सिर पर रखी और बरसती रात में यमुना की ओर चल पड़े। यमुना उफान पर थी। जैसे-जैसे वसुदेव आगे बढ़ते, पानी ऊपर चढ़ता जाता। कहते हैं, यमुना जी भगवान के चरण छूना चाहती थीं। बाल कृष्ण ने टोकरी से अपना पैर नीचे लटका दिया। चरण छूते ही यमुना का जल उतर गया और बीच से रास्ता बन गया। पीछे-पीछे शेषनाग अपने फन फैलाकर बच्चे पर छत्र बने रहे, ताकि बारिश की एक बूँद भी उन पर न पड़े।
गोकुल में सब सो रहे थे। उसी रात यशोदा ने एक कन्या को जन्म दिया था, जो स्वयं योगमाया थीं। वसुदेव ने चुपचाप कृष्ण को यशोदा के पास लिटा दिया, कन्या को उठाया और उसी रास्ते मथुरा लौट आए। कारागार में पहुँचते ही बेड़ियाँ फिर लग गईं, दरवाज़े बंद हो गए और कन्या रो पड़ी।
रोने की आवाज़ से पहरेदार जागे और कंस को ख़बर दी। कंस दौड़ता हुआ आया। देवकी ने बहुत विनती की कि यह तो कन्या है, इसे छोड़ दो। कंस ने एक न सुनी और कन्या को पत्थर पर पटकने के लिए उठाया। कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गई और अष्टभुजा देवी के रूप में प्रकट होकर बोली, "मूर्ख कंस, तुझे मारने वाला जन्म ले चुका है और सुरक्षित है।" इतना कहकर देवी अंतर्धान हो गईं। मान्यता है कि यही देवी विंध्याचल में विंध्यवासिनी के रूप में पूजी जाती हैं।
उधर गोकुल में सुबह हुई तो नंद बाबा के घर बेटा होने की ख़बर फैल गई। पूरे गाँव में उत्सव मनाया गया, ग्वालों ने दही-माखन लुटाया और बधाइयाँ गाई गईं। इसी की याद में आज भी जन्माष्टमी के अगले दिन नंदोत्सव मनाया जाता है। आगे चलकर इसी बालक ने पूतना, शकटासुर जैसे राक्षसों का अंत किया और समय आने पर मथुरा जाकर कंस का वध करके उग्रसेन और अपने माता-पिता को मुक्त कराया।
दो दिन जन्माष्टमी क्यों?
कई बार अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र अलग-अलग दिन पड़ते हैं। ऐसे में स्मार्त परंपरा के लोग पहले दिन और वैष्णव संप्रदाय (मथुरा-वृंदावन के कई मंदिर, इस्कॉन) अगले दिन जन्माष्टमी मनाते हैं। आप अपने कुल और मंदिर की परंपरा मानें।
जन्माष्टमी पूजा विधि
- सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें। ज़्यादातर लोग दिन में फलाहार करते हैं; अनाज, ख़ासकर चावल नहीं खाया जाता।
- शाम तक पूजा स्थान सजाएँ: लड्डू गोपाल के लिए झूला, नए वस्त्र, मोरपंख, बाँसुरी, तुलसी दल, पंचामृत, माखन-मिश्री, धनिये की पंजीरी, फल और मेवे।
- रात में भजन-कीर्तन करते हुए जागें और परिवार के साथ बैठकर यह जन्म कथा पढ़ें।
- ठीक निशीथ काल (आधी रात) में बाल गोपाल का पंचामृत से अभिषेक करें, फिर साफ़ जल से स्नान कराकर नए वस्त्र और शृंगार पहनाएँ।
- तुलसी दल के साथ माखन-मिश्री और पंजीरी का भोग लगाएँ, शंख बजाएँ, झूला झुलाएँ और आरती करें।
- पारण: बहुत से परिवार आधी रात की पूजा के बाद प्रसाद लेकर व्रत खोलते हैं। शास्त्रीय नियम यह है कि अगले दिन अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र समाप्त होने के बाद पारण हो। अपनी परंपरा के अनुसार चलें और समय पंचांग में देख लें।
नियम और सावधानियाँ
- भोग में तुलसी दल ज़रूर रखें, कृष्ण भोग तुलसी के बिना अधूरा माना जाता है।
- व्रत के दिन लहसुन-प्याज़ और तामसिक भोजन से बचें।
- बच्चों, बुज़ुर्गों और बीमार लोगों के लिए फलाहार और दूध लेना ठीक है।
- अगले दिन नंदोत्सव पर ब्राह्मण, गाय या ज़रूरतमंद को भोजन और दान दें।
इस साल अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र और निशीथ पूजा का समय कृष्ण जन्माष्टमी पृष्ठ पर देखें, और दिन की तिथि के लिए आज का पंचांग खोलें। जन्म के बाद आरती कुंजबिहारी की गाएँ और बच्चों के साथ सूरदास का मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो भजन सुनाएँ। विष्णु भक्ति के दूसरे व्रत के लिए एकादशी व्रत कथा पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
जन्माष्टमी किस तिथि को मनाई जाती है?
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को, जब आधी रात को रोहिणी नक्षत्र हो तो उसे सबसे शुभ माना जाता है। दक्षिण के अमांत पंचांग में यही दिन श्रावण कृष्ण अष्टमी है।
जन्माष्टमी का व्रत कब खोलें?
बहुत से परिवार आधी रात की पूजा के बाद प्रसाद लेकर व्रत खोलते हैं। शास्त्रीय नियम अगले दिन अष्टमी और रोहिणी दोनों समाप्त होने के बाद पारण का है।
जन्माष्टमी दो दिन क्यों मनाई जाती है?
जब अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र अलग दिन पड़ते हैं, तो स्मार्त परंपरा पहले दिन और वैष्णव संप्रदाय अगले दिन व्रत रखते हैं।
जन्माष्टमी पर कृष्ण को क्या भोग लगाएँ?
माखन-मिश्री, धनिये की पंजीरी, पंचामृत, फल और मेवे का भोग लगाया जाता है, और हर भोग में तुलसी दल रखा जाता है।
वसुदेव कृष्ण को कहाँ ले गए थे?
वसुदेव यमुना पार करके नवजात कृष्ण को गोकुल में नंद बाबा और यशोदा के घर छोड़ आए और बदले में यशोदा की कन्या को मथुरा ले आए।
