जय लक्ष्मी रमणा – सत्यनारायण जी की आरती
संक्षेप में:जय लक्ष्मी रमणा भगवान सत्यनारायण की आरती है, जो सत्यनारायण व्रत कथा के पाँचों अध्याय पूरे होने के बाद गाई जाती है। इसके पदों में कथा के पात्रों, यानी गरीब ब्राह्मण, लकड़हारे, राजा चंद्रचूड़, साधु वैश्य और ग्वालों की झलक मिलती है।
पाठ
जय लक्ष्मीरमणा, श्री जय लक्ष्मीरमणा।
सत्यनारायण स्वामी, जनपातक हरणा॥
॥ जय लक्ष्मीरमणा ॥
रत्नजड़ित सिंहासन, अद्भुत छवि राजे।
नारद करत निराजन, घंटा ध्वनि बाजे॥
॥ जय लक्ष्मीरमणा ॥
प्रगट भये कलि कारण, द्विज को दर्श दियो।
बूढ़ो ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो॥
॥ जय लक्ष्मीरमणा ॥
दुर्बल भील कठारो, इन पर कृपा करी।
चन्द्रचूड़ एक राजा, जिनकी विपति हरी॥
॥ जय लक्ष्मीरमणा ॥
वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीनी।
सो फल भोग्यो प्रभुजी, फिर स्तुति कीनी॥
॥ जय लक्ष्मीरमणा ॥
भाव भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धर्यो।
श्रद्धा धारण कीनी, तिनको काज सर्यो॥
॥ जय लक्ष्मीरमणा ॥
ग्वाल बाल संग राजा, वन में भक्ति करी।
मनवांछित फल दीनो, दीनदयाल हरी॥
॥ जय लक्ष्मीरमणा ॥
चढ़त प्रसाद सवाया, कदली फल मेवा।
धूप दीप तुलसी से, राजी सत्यदेवा॥
॥ जय लक्ष्मीरमणा ॥
श्री सत्यनारायणजी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावे॥
॥ जय लक्ष्मीरमणा ॥
आरती का परिचय
सत्यनारायण पूजा उत्तर भारत में पूर्णिमा, गृह प्रवेश, शादी-ब्याह और किसी मनोकामना के पूरी होने पर कराई जाती है। स्कन्द पुराण के रेवा खंड से जुड़ी मानी जाने वाली सत्यनारायण कथा के पाँचों अध्याय सुनने के बाद यही आरती गाई जाती है। अंतिम पद में 'कहत शिवानंद स्वामी' की छाप है। आरती की खासियत यह है कि इसके पद लगभग पूरी कथा को छोटे में दोहरा देते हैं।
पहला और दूसरा पद
हे लक्ष्मी जी के पति, सत्यनारायण स्वामी, आपकी जय हो; आप लोगों के पाप हरते हैं। रत्नों से जड़े सिंहासन पर आपकी अद्भुत छवि है, नारद मुनि आरती उतार रहे हैं और घंटे की ध्वनि गूंज रही है।
तीसरा पद: गरीब ब्राह्मण
कलियुग में लोगों के कल्याण के लिए आप प्रकट हुए और एक गरीब ब्राह्मण को दर्शन दिए। बूढ़े ब्राह्मण का वेश धरकर उसे व्रत बताया और उसका घर सोने के महल जैसा कर दिया। यह कथा के पहले अध्याय की घटना है।
चौथा पद: लकड़हारा और राजा
कमज़ोर, गरीब लकड़हारे (भील) पर आपने कृपा की, और राजा चंद्रचूड़ की विपत्ति दूर की।
पाँचवाँ और छठा पद: साधु वैश्य
साधु वैश्य ने मनोकामना पूरी होने के बाद व्रत करने में ढील दी और श्रद्धा छोड़ दी, तो उसे उसका फल भोगना पड़ा; बाद में उसने आपकी स्तुति की। भाव और भक्ति देखकर आप पल-पल में रूप बदलते हैं, और जिसने श्रद्धा रखी उसका काम बन गया।
सातवाँ और आठवाँ पद: राजा तुंगध्वज और प्रसाद
वन में ग्वालों के साथ पूजा का प्रसाद ठुकराने वाले राजा (कथा में तुंगध्वज) ने बाद में भक्ति की, तो दीनदयालु हरि ने उसे मनचाहा फल दिया। आपको सवाया प्रसाद, केला, फल और मेवा चढ़ता है, और आप धूप, दीप और तुलसी से ही प्रसन्न हो जाते हैं।
नौवाँ पद: फलश्रुति
जो सत्यनारायण जी की यह आरती गाता है, स्वामी शिवानंद कहते हैं कि उसे मनचाहा फल मिलता है।
पाठ-भेद
भारतकोश के पाठ में अंतिम पद 'तन-मन-सुख-सम्पत्ति मन-वांछित फल पावै' है और तीसरे पद में 'बूढ़े ब्राह्मण बनकर' मिलता है। बहुत से परिवार टेक को 'ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा' के रूप में गाते हैं। यहाँ द्रिक पंचांग का पाठ रखा गया है।
कब और कैसे पढ़ें
हर पूर्णिमा को या किसी शुभ अवसर पर सत्यनारायण पूजा कराई जाती है। केले के पत्तों का मंडप सजाकर, पंचामृत और सवा मात्रा में आटे-सूजी का पंजीरी या हलवे का प्रसाद बनाकर पहले सत्यनारायण व्रत कथा सुनें, फिर यह आरती गाएं। अंत में ॐ जय जगदीश हरे गाकर प्रसाद बाँटा जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सत्यनारायण जी की आरती कब गाई जाती है?
सत्यनारायण व्रत कथा के पाँचों अध्याय पूरे होने के बाद। अधिकतर परिवार इसके बाद ॐ जय जगदीश हरे भी गाते हैं।
आरती में 'सवाया प्रसाद' का क्या अर्थ है?
सवाया यानी सवा गुना। परंपरा है कि प्रसाद का सामान सवा की मात्रा में लिया जाए, जैसे सवा किलो आटा या सूजी।
आरती में किन पात्रों का ज़िक्र है?
गरीब ब्राह्मण, लकड़हारा, राजा चंद्रचूड़, साधु वैश्य और ग्वालों के साथ पूजा करने वाले राजा का, जो सब सत्यनारायण कथा के पात्र हैं।
क्या सत्यनारायण पूजा केवल पूर्णिमा को होती है?
पूर्णिमा सबसे शुभ मानी जाती है, पर गृह प्रवेश, विवाह, जन्मदिन या मनोकामना पूरी होने पर किसी भी शुभ दिन यह पूजा कराई जाती है।
