Bhaktise – भक्ति से

ॐ जय गंगे माता आरती

आरतीगंगा माँरचना: पारंपरिक

संक्षेप में:ॐ जय गंगे माता माँ गंगा की घर-घर गाई जाने वाली आरती है, जो गंगा दशहरा, गंगा सप्तमी, कार्तिक पूर्णिमा के स्नान और घाटों की संध्या आरती में गाई जाती है। इसमें राजा सगर के पुत्रों के उद्धार का ज़िक्र है।

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पाठ

ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।

जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥

॥ ॐ जय गंगे माता ॥

चन्द्र-सी ज्योति तुम्हारी, जल निर्मल आता।

शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता॥

॥ ॐ जय गंगे माता ॥

पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता।

कृपा दृष्टि हो तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता॥

॥ ॐ जय गंगे माता ॥

एक बार जो प्राणी, शरण तेरी आता।

यम की त्रास मिटाकर, परमगति पाता॥

॥ ॐ जय गंगे माता ॥

आरती मातु तुम्हारी, जो नर नित गाता।

सेवक वही सहज में, मुक्ति को पाता॥

॥ ॐ जय गंगे माता ॥

आरती का परिचय

हरिद्वार, प्रयागराज और काशी के घाटों पर रोज़ शाम जो भव्य गंगा आरती होती है, उसमें और घरों में गंगाजल के कलश के सामने यही छोटी, सरल आरती गाई जाती है। इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है। गंगा जी के धरती पर आने की कथा, जिसमें राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों यानी राजा सगर के साठ हज़ार पुत्रों के उद्धार के लिए तप किया, वाल्मीकि रामायण और भागवत पुराण में मिलती है। आरती का तीसरा पद इसी कथा की ओर इशारा करता है।

पहला पद: टेक

हे गंगा माँ, आपकी जय हो। जो मनुष्य आपका ध्यान करता है, उसे मनचाहा फल मिलता है।

दूसरा पद

आपकी आभा चंद्रमा जैसी है और आपका जल निर्मल होकर बहता है। जो आपकी शरण में आता है, वह संसार-सागर से पार हो जाता है।

तीसरा पद: सगर-पुत्रों का उद्धार

आपने राजा सगर के पुत्रों को तारा, यह सारा जगत जानता है। आपकी कृपा-दृष्टि हो तो तीनों लोकों को सुख मिलता है।

चौथा और पाँचवाँ पद

जो प्राणी एक बार भी आपकी शरण आता है, उसका यम का डर मिट जाता है और वह परम गति पाता है। हे माँ, जो रोज़ आपकी आरती गाता है, वह सेवक सहज ही मुक्ति पा लेता है।

पाठ-भेद

भारतकोश के पाठ में टेक 'ॐ जय गंगे माता श्री जय गंगे माता' है; तीसरे पद में 'कृपा दृष्टि तुम्हारी', चौथे में 'एक ही बार जो तेरी शरणागति आता' और अंतिम पद में 'जो जन नित्य गाता, दास वही सहज में मुक्ति को पाता' मिलता है। घरों में दोनों रूप गाए जाते हैं। यहाँ द्रिक पंचांग का पाठ रखा गया है।

कब और कैसे पढ़ें

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को गंगा दशहरा और वैशाख शुक्ल सप्तमी को गंगा सप्तमी पर गंगा स्नान के बाद दीपदान करके यह आरती गाएं। कार्तिक पूर्णिमा पर घाटों पर दीये बहाते समय भी यही आरती गूंजती है। घर में हों तो गंगाजल के कलश या लोटे के सामने घी का दीपक जलाकर आरती कर सकते हैं। माघ की मौनी अमावस्या के स्नान के बाद भी इसे गाने का चलन है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गंगा मैया की आरती कब की जाती है?

घाटों पर रोज़ शाम, और खास तौर पर गंगा दशहरा, गंगा सप्तमी, कार्तिक पूर्णिमा और मौनी अमावस्या के स्नान के बाद।

आरती में 'पुत्र सगर के तारे' का क्या अर्थ है?

राजा सगर के साठ हज़ार पुत्र कपिल मुनि के श्राप से भस्म हो गए थे। भगीरथ के तप से गंगा धरती पर आईं और उनके जल से उन पुत्रों का उद्धार हुआ।

क्या घर पर गंगा आरती कर सकते हैं?

हाँ, गंगाजल के कलश या लोटे के सामने दीपक जलाकर यही आरती गाई जा सकती है।

गंगा दशहरा किस दिन होता है?

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को। इसी दिन गंगा जी के धरती पर अवतरण की मान्यता है।