रविवार व्रत कथा: सूर्य देव, गोबर से लीपने वाली बुढ़िया और ईर्ष्यालु पड़ोसन
संक्षेप में:रविवार का व्रत सूर्य देव के लिए रखा जाता है, जिसमें सुबह ताँबे के लोटे से अर्घ्य, लाल चंदन-लाल फूल की पूजा और दिन में एक बार बिना नमक का भोजन होता है। इसकी कथा एक भक्त बुढ़िया की है, जिसे पड़ोसन की जलन के बावजूद सूर्य देव ने सोने का गोबर देने वाली गाय दी।
रविवार या इतवार का व्रत सूर्य देव को समर्पित है। इसे किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले रविवार से शुरू करते हैं और आम तौर पर 12 रविवार या एक साल तक रखते हैं। लोग इसे अच्छे स्वास्थ्य की कामना, मान-सम्मान और घर की सुख-शांति के लिए रखते हैं। सुबह सूर्य को अर्घ्य, लाल चंदन, लाल फूल और दिन ढलने से पहले एक बार बिना नमक का भोजन, यही इस व्रत की रीत है।
रविवार व्रत कथा
एक गाँव में एक बुढ़िया रहती थी। वह हर रविवार सुबह-सवेरे उठती, नहाती, फिर गोबर से अपना आँगन और रसोई लीपती। उसके बाद भोजन बनाकर पहले सूर्य देव को भोग लगाती और तब खुद एक बार भोजन करती। सूर्य देव की कृपा से उसके घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी और वह संतोष से रहती थी।
बुढ़िया के पास अपनी गाय नहीं थी। वह लीपने के लिए गोबर पड़ोसन के आँगन से ले आती थी, जहाँ उसकी गाय बँधी रहती थी। पड़ोसन देखती कि यह बुढ़िया अकेली है, फिर भी हमेशा खुश रहती है और इसके घर में बरकत बनी रहती है। धीरे-धीरे उसके मन में जलन बैठ गई।
एक शनिवार की शाम पड़ोसन ने अपनी गाय को घर के अंदर बाँध दिया ताकि बुढ़िया को रविवार सुबह गोबर न मिले। रविवार को बुढ़िया गोबर लेने गई तो खाली हाथ लौटी। बिना लीपे उसने रसोई नहीं चढ़ाई, न भोग बना, न उसने खुद कुछ खाया। पूरा दिन भूखी रही और रात को भूखी ही सो गई।
रात में सूर्य देव ने सपने में उसे दर्शन दिए और पूछा, “माई, आज तुमने भोग क्यों नहीं लगाया?” बुढ़िया ने कहा, “प्रभु, गोबर नहीं मिला, घर लीप नहीं पाई, तो भोजन कैसे बनाती?” सूर्य देव मुस्कुराए और बोले, “तुम्हारे नियम से मैं प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें एक ऐसी गाय देता हूँ जो सबकी इच्छा पूरी करती है। रविवार का व्रत रखने वाले की हर मनोकामना मैं पूरी करता हूँ।”
सुबह आँख खुली तो बुढ़िया के आँगन में एक सुंदर गाय और उसका बछड़ा बँधा था। बुढ़िया ने बड़े प्रेम से उनकी सेवा शुरू कर दी। पड़ोसन ने यह देखा तो और जल उठी। अगले दिन उसने ध्यान दिया कि उस गाय ने सोने का गोबर किया है। बुढ़िया के उठने से पहले वह चुपचाप आई, सोने का गोबर उठा ले गई और उसकी जगह अपनी गाय का साधारण गोबर रख गई। कई दिन ऐसा ही चलता रहा और भोली बुढ़िया को कुछ पता नहीं चला।
सूर्य देव ने देखा कि पड़ोसन बुढ़िया को ठग रही है। एक शाम उन्होंने ज़ोर की आँधी चला दी। बुढ़िया ने डरकर गाय को आँगन से उठाकर घर के भीतर बाँध दिया। सुबह उसने देखा कि गाय ने सोने का गोबर किया है। तब उसे गाय की महिमा पता चली और उसने रोज़ शाम गाय को अंदर बाँधना शुरू कर दिया। अब पड़ोसन के हाथ कुछ नहीं लगता था।
पड़ोसन ने चाल बदली। वह राजा के दरबार में पहुँची और बोली, “महाराज, गाँव की एक बुढ़िया के पास ऐसी गाय है जो रोज़ सोने का गोबर देती है। ऐसी चीज़ तो राजमहल में होनी चाहिए।” राजा ने सैनिक भेजे और वे बुढ़िया की गाय खोलकर ले गए। बुढ़िया रोती रही, उस दिन रविवार था, उसने कुछ नहीं खाया और सूर्य देव से प्रार्थना करती रही।
उधर राजमहल में अगली सुबह अजीब हाल था। गाय ने सोना तो दिया नहीं, पूरा महल बदबूदार गोबर से भर गया। उसी रात सूर्य देव ने राजा को सपने में कहा, “राजन, यह गाय मैंने उस बुढ़िया को उसके रविवार व्रत के फल में दी है। इसे तुरंत लौटा दो, वरना संकट आएगा।”
राजा घबराकर उठा, उसने सम्मान के साथ गाय-बछड़ा बुढ़िया को लौटाया और उसे बहुत-सा धन भी दिया। सच्चाई जानकर राजा ने उस ईर्ष्यालु पड़ोसन को दंड दिया। फिर पूरे राज्य में घोषणा करवाई कि सब लोग रविवार का व्रत रखें और सूर्य देव की पूजा करें। कहते हैं, उसके बाद उस राज्य में सब सुखी और निरोग रहने लगे।
रविवार व्रत की पूजा विधि
- सूर्योदय से पहले उठकर नहाएँ और लाल या केसरिया कपड़े पहनें। घर का आँगन या पूजा स्थान साफ़ करें; गाँवों में आज भी इसे गोबर से लीपते हैं।
- ताँबे के लोटे में जल, लाल चंदन, लाल फूल, अक्षत और थोड़ा गुड़ डालकर उगते सूर्य को अर्घ्य दें। अर्घ्य देते हुए “ॐ घृणि सूर्याय नमः” का जाप करें।
- हाथ में जल लेकर रविवार व्रत का संकल्प लें और बताएँ कितने रविवार करेंगे।
- पूजा स्थान पर सूर्य देव को लाल चंदन, लाल फूल, गुड़ और घी का दीपक अर्पित करें, फिर रविवार व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- संभव हो तो आदित्य हृदय स्तोत्र या सूर्य के 12 नामों का पाठ करें और आरती करें।
- दिन ढलने से पहले एक बार भोजन करें, बिना नमक का: गेहूँ की रोटी, गुड़, दलिया या खीर। सूर्यास्त के बाद कुछ न खाएँ।
नियम और उद्यापन
- पूरे दिन नमक और तेल से बनी चीज़ें न खाएँ; भोजन सूर्य के रहते ही कर लें।
- नीले या काले कपड़े पहनने से बचें; लाल, केसरिया या सफ़ेद रंग शुभ माने जाते हैं।
- संकल्प के रविवार पूरे होने पर उद्यापन करें: हवन, ब्राह्मण भोजन, और लाल कपड़ा, गेहूँ, गुड़, ताँबे का बर्तन दान करें।
- कथा की सीख भी याद रखें: किसी की खुशहाली देखकर जलन न करें।
सूर्य देव के बड़े पर्व हैं रथ सप्तमी, मकर संक्रांति और पूर्वांचल-बिहार का छठ पूजा, जिसकी कथा छठ पूजा व्रत कथा में पढ़ें। रविवार को सूर्योदय का सही समय आज के पंचांग में देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
रविवार का व्रत कितने रविवार करना चाहिए?
आम तौर पर 12 रविवार का संकल्प लिया जाता है। कुछ लोग एक साल या 30 रविवार तक भी यह व्रत रखते हैं।
रविवार के व्रत में नमक क्यों नहीं खाते?
परंपरा से रविवार व्रत में दिन में एक बार बिना नमक का सात्विक भोजन किया जाता है, जिसे संयम और सूर्य की उपासना का हिस्सा माना जाता है।
सूर्य को अर्घ्य कैसे दें?
ताँबे के लोटे में जल, लाल चंदन, लाल फूल और अक्षत डालकर उगते सूर्य की ओर मुँह करके धीरे-धीरे जल चढ़ाएँ और सूर्य मंत्र जपें।
रविवार व्रत कथा में बुढ़िया को क्या मिला?
सूर्य देव ने बुढ़िया को एक गाय और बछड़ा दिया, जो सोने का गोबर करती थी। राजा के ले जाने पर भी सूर्य देव ने वह गाय उसे वापस दिलाई।
रविवार व्रत कब शुरू करें?
किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले रविवार से। मकर संक्रांति के बाद का पहला रविवार भी अच्छा माना जाता है।
