Bhaktise – भक्ति से

छठ पूजा व्रत कथा

संक्षेप में:छठ पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का चार दिन का व्रत है, जिसमें डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। कथा के अनुसार षष्ठी देवी ने निःसंतान राजा प्रियव्रत के मृत पुत्र को जीवन दिया था, तभी से संतान की कामना और रक्षा के लिए यह व्रत रखा जाता है।

कोई रेटिंग नहीं
0 व्यूज़

छठ पूजा बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र का सबसे बड़ा लोकपर्व है, और आज दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में भी पूरे विधि-विधान से मनाया जाता है। यह दीपावली के छह दिन बाद, कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी तक चार दिन चलता है, और मुख्य दिन षष्ठी है। इसमें सूर्य देव और छठी मैया की पूजा होती है। व्रती, जिन्हें परवैतिन भी कहते हैं, लगभग छत्तीस घंटे का निर्जला उपवास रखते हैं और डूबते व उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। चैत्र मास में भी छोटा छठ होता है, जिसे चैती छठ कहते हैं।

छठ पूजा व्रत कथा

ब्रह्मवैवर्त पुराण में षष्ठी देवी की कथा आती है। स्वायंभुव मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत बड़े धर्मात्मा राजा थे। उनकी रानी का नाम मालिनी था। राज्य में सब कुछ था, पर बहुत समय तक उनके कोई संतान नहीं हुई। इस दुख में राजा-रानी का मन किसी काम में नहीं लगता था।

आखिर राजा ने महर्षि कश्यप से उपाय पूछा। महर्षि ने उनके लिए पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया और यज्ञ की खीर रानी को खाने के लिए दी। समय आने पर रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया। पर दुर्भाग्य, बालक मरा हुआ पैदा हुआ।

राजा का हृदय टूट गया। वे अपने मृत पुत्र को गोद में लेकर श्मशान गए। वहाँ बच्चे को देखते हुए उनसे सहा नहीं गया और उन्होंने तय किया कि वे भी अपने प्राण त्याग देंगे।

तभी आकाश से एक दिव्य विमान उतरा। उसमें से तेज़ से भरी एक देवी प्रकट हुईं। उन्होंने राजा से कहा, राजन, मैं ब्रह्मा जी की मानस पुत्री देवसेना हूँ। प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मुझे षष्ठी देवी कहते हैं। मैं बच्चों की रक्षा करती हूँ और निःसंतान को संतान देती हूँ।

यह कहकर देवी ने मृत बालक को अपनी गोद में उठाया। उनके स्पर्श से बालक जीवित हो उठा और रोने लगा। राजा की आँखों से आँसू बह निकले। वे देवी के चरणों में गिर पड़े।

देवी ने कहा, राजन, तुम मेरी पूजा करो और अपने राज्य में सबको मेरी पूजा करने के लिए प्रेरित करो। जो मेरी उपासना करेगा, उसकी संतान पर कोई संकट नहीं आएगा। यह कहकर देवी बालक को राजा की गोद में देकर अंतर्धान हो गईं।

राजा प्रियव्रत ने महल लौटकर बड़े उत्साह से षष्ठी देवी की पूजा की और पूरे राज्य में घोषणा करवाई कि सब लोग शुक्ल पक्ष की षष्ठी को देवी की पूजा करें। तभी से षष्ठी देवी, जिन्हें गाँव-घर में प्यार से छठी मैया कहा जाता है, की पूजा चली आ रही है। बच्चे के जन्म के छठे दिन होने वाली छठी की पूजा भी इन्हीं देवी से जुड़ी है।

सूर्य उपासना की परंपरा: कर्ण और द्रौपदी

छठ में सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा को लोग महाभारत से भी जोड़ते हैं। कहा जाता है कि सूर्यपुत्र कर्ण रोज़ घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे, और सूर्य की कृपा से ही वे महान योद्धा बने। आज भी छठ में व्रती इसी तरह पानी में खड़े होकर अर्घ्य देते हैं। बिहार में अंग प्रदेश, यानी आज के भागलपुर-मुंगेर इलाके को कर्ण की धरती माना जाता है।

एक और लोककथा के अनुसार जब पांडव जुए में अपना राज-पाट हार गए, तो धौम्य ऋषि की सलाह पर द्रौपदी ने छठ का व्रत रखा और सूर्य की उपासना की। उसी के फल से पांडवों को अपना राज्य फिर मिला। कुछ परंपराओं में यह भी कहा जाता है कि लंका से लौटने के बाद भगवान राम और माता सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य की पूजा की थी। ये कथाएँ लोक-आस्था का हिस्सा हैं और अलग-अलग इलाकों में अलग ढंग से सुनाई जाती हैं।

छठ पूजा की विधि: चार दिन

  1. पहला दिन, नहाय-खाय (चतुर्थी): व्रती नदी या घर में स्नान करके घर की पूरी सफ़ाई करते हैं। फिर अरवा चावल, चने की दाल और लौकी (कद्दू) की सब्ज़ी सेंधा नमक और घी में बनाकर खाते हैं। इसी से व्रत की शुरुआत होती है।
  2. दूसरा दिन, खरना (पंचमी): दिन भर निर्जला उपवास के बाद शाम को मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी से गुड़ की खीर (रसियाव) और रोटी बनती है। पूजा के बाद व्रती यही प्रसाद ग्रहण करते हैं और फिर परिवार में बाँटा जाता है। इसके बाद लगभग छत्तीस घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है।
  3. तीसरा दिन, संध्या अर्घ्य (षष्ठी): घर में ठेकुआ, कसार (चावल के लड्डू) बनते हैं। बाँस के सूप और दउरा में ठेकुआ, गन्ना, नारियल, केला, सिंघाड़ा, नींबू, मूली, हल्दी-अदरक के पौधे और मौसमी फल सजाए जाते हैं। शाम को परिवार घाट पर जाता है, व्रती पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य को दूध और जल से अर्घ्य देते हैं। रात में कई घरों में कोसी भरी जाती है।
  4. चौथा दिन, उषा अर्घ्य (सप्तमी): भोर से पहले फिर घाट पर पहुँचकर उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। छठी मैया से संतान और परिवार की कुशलता माँगी जाती है।
  5. पारण: अर्घ्य के बाद व्रती घाट पर ही प्रसाद बाँटते हैं, बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं और अदरक-गुड़ या जल लेकर व्रत खोलते हैं। सूर्योदय का सही समय पंचांग में देखें।

नियम और सावधानियाँ

  • प्रसाद बनाने में पूरी शुद्धता रखी जाती है; नया या धुला हुआ चूल्हा और बर्तन इस्तेमाल होते हैं, और लहसुन-प्याज़ घर में नहीं बनता।
  • व्रती चार दिन ज़मीन पर सोते हैं और नए, बिना सिले कपड़े पहनने की रीत है।
  • प्रसाद को बनाते समय चखा नहीं जाता।
  • घाट पर बच्चों और बुज़ुर्गों का ध्यान रखें; गहरे पानी में न जाएँ और प्रशासन के बताए घाट ही चुनें।
  • बीमार या बुज़ुर्ग व्रती अपने स्वास्थ्य के अनुसार व्रत का रूप तय करें; परिवार के दूसरे सदस्य भी अर्घ्य में सहयोग कर सकते हैं।

छठ से कुछ हफ़्ते पहले पूर्वांचल की माताएँ जितिया व्रत रखती हैं, जिसकी कथा भी संतान की रक्षा से जुड़ी है। इस साल अर्घ्य का समय छठ पूजा पृष्ठ पर देखें। हर रविवार सूर्य देव का व्रत रखने वाले रविवार व्रत कथा भी पढ़ सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

छठ पूजा कब मनाई जाती है?

मुख्य छठ कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है, जो दीपावली के छह दिन बाद आती है। पूरा व्रत चतुर्थी से सप्तमी तक चार दिन चलता है। चैत्र शुक्ल षष्ठी को चैती छठ भी होता है।

छठी मैया कौन हैं?

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार छठी मैया षष्ठी देवी हैं, जिन्हें देवसेना भी कहते हैं। वे बच्चों की रक्षा करने वाली और संतान देने वाली देवी मानी जाती हैं।

छठ के चार दिन कौन-कौन से हैं?

पहला दिन नहाय-खाय, दूसरा खरना, तीसरा संध्या अर्घ्य और चौथा उषा अर्घ्य होता है। उषा अर्घ्य के बाद व्रत का पारण किया जाता है।

खरना में क्या बनाया जाता है?

खरना की शाम मिट्टी के चूल्हे पर गुड़ की खीर, जिसे रसियाव भी कहते हैं, और रोटी बनाई जाती है। व्रती यही प्रसाद लेकर छत्तीस घंटे का निर्जला व्रत शुरू करते हैं।

छठ में डूबते सूर्य को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?

छठ अकेला ऐसा बड़ा पर्व है जिसमें अस्त होते और उदय होते, दोनों सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। लोक-मान्यता में शाम का अर्घ्य सूर्य की पत्नी प्रत्यूषा और सुबह का उषा को समर्पित माना जाता है।