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धनतेरस की कथा

संक्षेप में:धनतेरस कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को मनाई जाती है और यहीं से दीपावली का पाँच दिन का पर्व शुरू होता है। इसकी कथा राजा हिम के पुत्र की है, जिसकी पत्नी ने दीयों और गहनों के ढेर से यमराज को लौटा दिया; इसी कारण इस शाम घर के बाहर दक्षिण दिशा में यमदीप जलाया जाता है।

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धनतेरस, जिसे धनत्रयोदशी भी कहते हैं, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को आती है। यहीं से दीपावली का पाँच दिन का उत्सव शुरू होता है। इस दिन तीन बातें एक साथ जुड़ी हैं: समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि का अमृत कलश लेकर प्रकट होना, नए बर्तन या धातु खरीदने की रीत, और शाम को यमराज के नाम का दीया जलाना, जिसे यमदीप दान कहते हैं। यमदीप की परंपरा स्कन्द पुराण में बताई गई है और उसके पीछे राजा हिम के पुत्र की कथा सुनाई जाती है।

धनतेरस की कथा

प्राचीन काल में हिम नाम के एक राजा थे। बहुत समय बाद उनके घर पुत्र का जन्म हुआ। राज्य में उत्सव मनाया गया, पर जब राज ज्योतिषियों ने बालक की कुंडली देखी तो वे चुप हो गए। बहुत पूछने पर उन्होंने बताया कि राजकुमार के विवाह के चौथे दिन साँप के डसने से उसकी मृत्यु का योग है।

राजा-रानी यह सुनकर टूट गए। उन्होंने राजकुमार को ऐसी जगह रखा जहाँ किसी स्त्री की छाया तक न पड़े, ताकि विवाह की नौबत ही न आए। पर होनी को कौन टाल सकता है। एक दिन राजकुमार की भेंट एक राजकुमारी से हुई, दोनों ने एक-दूसरे को पसंद किया और उनका विवाह हो गया।

राजकुमारी बड़ी समझदार थी। जब उसे पति के भाग्य की बात पता चली तो वह रोई नहीं, बल्कि सोचने लगी कि इस संकट से कैसे निपटा जाए। विवाह का चौथा दिन आया। उस रात उसने पति को सोने नहीं दिया।

उसने शयनकक्ष के दरवाज़े पर अपने सारे सोने-चाँदी के गहने, सिक्के और कीमती चीज़ों का ऊँचा ढेर लगा दिया। पूरे महल में, खासकर कमरे के बाहर, अनगिनत दीये जला दिए, ताकि कहीं अँधेरा न रहे। फिर वह पति के पास बैठकर रात भर उन्हें कहानियाँ सुनाती रही और भजन गाती रही, ताकि वे जागते रहें।

आधी रात को यमराज साँप का रूप धरकर राजकुमार के प्राण लेने आए। पर दरवाज़े पर पहुँचते ही दीयों की तेज़ रोशनी और सोने-चाँदी की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं। वे भीतर नहीं जा सके। साँप उस गहनों के ढेर पर चढ़कर बैठ गया और राजकुमारी के मीठे गीत और कहानियाँ सुनता रहा। सुनते-सुनते पूरी रात बीत गई।

सुबह होते ही मृत्यु का समय निकल चुका था। यमराज चुपचाप लौट गए। राजकुमारी की सूझ-बूझ और जागरण से उसके पति के प्राण बच गए। उस दिन कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी थी।

यमदूतों का प्रश्न

स्कन्द पुराण की परंपरा में इससे जुड़ा एक प्रसंग और आता है। एक बार यमराज ने अपने दूतों से पूछा, क्या प्राण हरते समय तुम्हें कभी किसी पर दया आई? दूत पहले तो डर के मारे चुप रहे, फिर बोले, महाराज, एक बार राजा हिम के पुत्र के प्राण विवाह के चौथे दिन लेने पड़े थे। नवविवाहिता का विलाप सुनकर हमारा हृदय भी काँप गया था। क्या कोई ऐसा उपाय है जिससे अकाल मृत्यु टल सके?

यमराज ने कहा, कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी की शाम जो व्यक्ति मेरे नाम से घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके दीपक जलाएगा, उसके घर में अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा। तभी से धनतेरस की शाम यमदीप दान की परंपरा चली आ रही है। दोनों कथाओं में घटना का अंत अलग है, पर दोनों का संदेश वही है: इस शाम का दीया परिवार की रक्षा का दीया है।

भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य

पुराणों के अनुसार देवताओं और असुरों ने जब समुद्र मंथन किया, तो कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत से भरा कलश लेकर प्रकट हुए। उन्हें आयुर्वेद का देवता और भगवान विष्णु का अंश माना जाता है। इसीलिए इस दिन को धन्वंतरि जयंती भी कहते हैं, और कलश की याद में नए बर्तन, खासकर पीतल या चाँदी के, खरीदे जाते हैं।

धनतेरस पूजा विधि

  1. खरीदारी: शुभ मुहूर्त में नए बर्तन, चाँदी का सिक्का, झाड़ू या धनिया के बीज खरीदने की रीत है। नए बर्तन को खाली घर न लाएँ, उसमें थोड़ा अनाज या मिठाई भरकर लाएँ।
  2. शाम की तैयारी: प्रदोष काल में घर साफ़ करके पूजा स्थान पर लाल कपड़ा बिछाएँ।
  3. धन्वंतरि पूजा: भगवान धन्वंतरि की तस्वीर रखकर रोली, अक्षत, फूल, धूप-दीप और नैवेद्य चढ़ाएँ और परिवार के आरोग्य की प्रार्थना करें।
  4. कुबेर और लक्ष्मी पूजा: कुबेर जी और माता लक्ष्मी की पूजा करें। नए खरीदे सिक्के या बर्तन को भी पूजा में रखें।
  5. यमदीप दान: आटे या मिट्टी का चौमुखा दीया सरसों के तेल से जलाएँ। उसे घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखें और यमराज को प्रणाम करें। कई घरों में यह दीया घर की सबसे बड़ी स्त्री जलाती है।
  6. कथा: दीया जलाने के बाद परिवार के साथ बैठकर राजा हिम के पुत्र की कथा सुनें।

नियम और सावधानियाँ

  • यमदीप घर के भीतर नहीं, बाहर द्वार पर और दक्षिण मुख करके ही रखा जाता है।
  • इस शाम घर के किसी कोने में अँधेरा न छोड़ें; कम से कम तेरह दीये जलाने की रीत कई परिवारों में है।
  • खरीदारी अपनी सामर्थ्य के अनुसार करें; परंपरा में धनिया या एक छोटा बर्तन भी उतना ही शुभ माना जाता है।
  • धनतेरस के दिन उधार देने से कई घरों में परहेज़ किया जाता है।

धनतेरस के अगले दिन नरक चतुर्दशी (छोटी दीपावली) और फिर अमावस्या को लक्ष्मी पूजा होती है। लक्ष्मी पूजन के बाद ॐ जय लक्ष्मी माता की आरती गाई जाती है। पाँचवें दिन यमराज और यमुना से जुड़ी भाई दूज की कथा के साथ यह पर्व पूरा होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

धनतेरस कब मनाई जाती है?

धनतेरस कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाई जाती है। यह दीपावली से दो दिन पहले आती है और पाँच दिन के दीप पर्व का पहला दिन है।

धनतेरस पर यमदीप क्यों जलाया जाता है?

मान्यता है कि यमराज ने वचन दिया था कि इस शाम जो उनके नाम से दक्षिण दिशा में दीपक जलाएगा, उसके घर अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा। इसी कारण घर के बाहर चौमुखा दीया जलाया जाता है।

धनतेरस पर धन्वंतरि की पूजा क्यों होती है?

पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन में भगवान धन्वंतरि इसी तिथि को अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्हें आयुर्वेद का देवता माना जाता है, इसलिए इसे धन्वंतरि जयंती भी कहते हैं।

धनतेरस पर क्या खरीदना शुभ है?

परंपरा में नए बर्तन, चाँदी का सिक्का, झाड़ू और धनिया के बीज खरीदना शुभ माना जाता है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार छोटी चीज़ भी उतनी ही शुभ मानी जाती है।

यमदीप किस दिशा में रखें?

यमदीप को घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखा जाता है, क्योंकि दक्षिण को यमराज की दिशा माना गया है।