गणेश चतुर्थी व्रत कथा: गणेश जन्म, चंद्र दर्शन दोष और स्यमंतक मणि
संक्षेप में:गणेश चतुर्थी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मनाई जाती है, जिस दिन माता पार्वती के पुत्र गणेश जी का जन्मोत्सव होता है। इस दिन चंद्रमा देखना वर्जित है, क्योंकि गणेश जी ने चंद्र को शाप दिया था; भूल से चंद्र दिख जाए तो श्रीकृष्ण की स्यमंतक मणि कथा सुनने से कलंक दोष दूर माना जाता है।
गणेश चतुर्थी भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को आती है। इस दिन घरों और पंडालों में गणपति की मूर्ति स्थापित की जाती है, दोपहर के मध्याह्न काल में पूजा होती है और डेढ़, तीन, पाँच, सात या दस दिन बाद विसर्जन किया जाता है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र-तेलंगाना में यह सबसे बड़े त्योहारों में है, और उत्तर भारत में भी अब घर-घर गणपति बैठाए जाते हैं। इस चतुर्थी की तीन कथाएँ एक साथ सुनी जाती हैं: गणेश जन्म, चंद्रमा का शाप और स्यमंतक मणि।
गणेश चतुर्थी व्रत कथा
गणेश जी का जन्म
शिव पुराण के अनुसार एक बार कैलाश पर माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं। उस समय भगवान शिव बाहर गए हुए थे और द्वार पर कोई अपना पहरेदार नहीं था। माता ने अपने शरीर पर लगे उबटन से एक सुंदर बालक बनाया और उसमें प्राण डाल दिए। उन्होंने बालक से कहा, "तुम मेरे पुत्र हो। जब तक मैं स्नान कर रही हूँ, किसी को भीतर मत आने देना।"
थोड़ी देर बाद भगवान शिव लौटे। बालक ने उन्हें द्वार पर ही रोक दिया। शिव जी ने समझाया कि यह उनका अपना घर है, पर बालक माता की आज्ञा पर अड़ा रहा। शिवगणों ने उसे हटाने की कोशिश की, पर वह अकेला सब पर भारी पड़ा। बात बढ़ती गई और क्रोध में आकर शिव जी ने त्रिशूल से बालक का सिर काट दिया।
जब पार्वती जी बाहर आईं और अपने पुत्र को इस हाल में देखा, तो उनका दुख और क्रोध सँभाले नहीं सँभला। उन्होंने कहा कि जब तक उनका बेटा जीवित नहीं होगा, वे शांत नहीं होंगी। तब शिव जी ने गणों को उत्तर दिशा में भेजा और कहा कि जो पहला प्राणी मिले, उसका सिर ले आओ। गणों को एक हाथी मिला। उसका सिर लाकर बालक के धड़ पर जोड़ा गया और शिव जी ने उसे फिर से जीवित कर दिया।
शिव जी ने बालक को अपने गणों का स्वामी, यानी गणपति, बनाया और वरदान दिया कि हर शुभ काम में सबसे पहले उनकी पूजा होगी। मान्यता है कि यह भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी का दिन था, इसलिए इसी दिन गणेश जन्मोत्सव मनाया जाता है।
चंद्रमा को शाप
एक बार गणेश जी भक्तों के घर से ढेर सारे मोदक खाकर रात में अपने वाहन मूषक पर लौट रहे थे। रास्ते में एक साँप देखकर मूषक घबरा गया और गणेश जी गिर पड़े। भारी पेट और बिखरे मोदक देखकर आकाश में चमक रहे चंद्रदेव ठहाका मारकर हँस पड़े। चंद्रमा को अपनी सुंदरता पर घमंड था।
गणेश जी ने शाप दिया, "जिस रूप पर तुम्हें इतना घमंड है, आज से उसे जो देखेगा उस पर झूठा कलंक लगेगा।" चंद्रमा का घमंड उतर गया और उन्होंने बहुत क्षमा माँगी। देवताओं ने भी विनती की। तब गणेश जी ने शाप को सीमित कर दिया: केवल भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की रात चंद्र दर्शन से मिथ्या कलंक लगेगा। इसीलिए इस चतुर्थी को कई जगह कलंक चतुर्थी कहा जाता है और लोग उस रात आकाश की ओर देखने से बचते हैं।
श्रीकृष्ण और स्यमंतक मणि
भागवत और विष्णु पुराण में आता है कि द्वारका के सत्राजित को सूर्यदेव से स्यमंतक नाम की चमत्कारी मणि मिली थी, जो रोज़ ढेर सारा सोना देती थी। श्रीकृष्ण ने सुझाव दिया कि यह मणि राजा उग्रसेन को दे दी जाए ताकि पूरी प्रजा का भला हो। सत्राजित ने मना कर दिया।
परंपरा कहती है कि उसी भाद्रपद चतुर्थी की रात कृष्ण ने दूध के कटोरे में चंद्रमा का प्रतिबिंब देख लिया था। कुछ दिन बाद सत्राजित का भाई प्रसेन मणि पहनकर शिकार पर गया। जंगल में एक शेर ने उसे मार डाला और मणि ले ली। फिर ऋक्षराज जाम्बवान ने शेर को मारकर मणि अपनी गुफ़ा में ले ली। द्वारका में बात फैल गई कि मणि के लालच में कृष्ण ने ही प्रसेन को मारा है।
झूठा आरोप मिटाने के लिए कृष्ण ख़ुद जंगल गए। प्रसेन और शेर के निशानों का पीछा करते-करते वे जाम्बवान की गुफ़ा तक पहुँचे। वहाँ दोनों में कई दिन तक भयंकर युद्ध हुआ। आख़िर जाम्बवान ने पहचान लिया कि सामने वही प्रभु हैं, जिनकी उन्होंने त्रेता युग में राम रूप में सेवा की थी। उन्होंने मणि लौटा दी और अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह कृष्ण से कर दिया।
कृष्ण ने द्वारका लौटकर सबके सामने मणि सत्राजित को सौंप दी। सत्राजित को अपनी भूल पर पछतावा हुआ और उसने अपनी बेटी सत्यभामा का विवाह कृष्ण से कर दिया। इस तरह कृष्ण पर लगा कलंक मिटा। तभी से माना जाता है कि भूल से इस चतुर्थी का चंद्रमा दिख जाए तो स्यमंतक मणि की यह कथा सुनने से दोष शांत होता है। साथ में यह श्लोक पढ़ा जाता है:
सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥
बिहार और पूर्वांचल के कुछ इलाकों में इस रात को चौठ चंद्र या पत्थर चौथ के नाम से भी जाना जाता है, और वहाँ की अपनी लोक परंपराएँ हैं।
गणेश चतुर्थी पूजा विधि
- सुबह स्नान करके घर साफ़ करें। पूजा स्थान पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर चौकी पर गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति रखें।
- हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें कि कितने दिन गणपति बैठाएँगे। फिर मध्याह्न काल में प्राण-प्रतिष्ठा और षोडशोपचार पूजा करें।
- गणेश जी को सिंदूर, लाल फूल, 21 दूर्वा, जनेऊ, मोदक या लड्डू, केला और नारियल चढ़ाएँ।
- पूजा के बाद गणेश जन्म की कथा पढ़ें, फिर स्यमंतक मणि की कथा सुनें और गणेश जी की आरती करें।
- रात को चंद्रमा की ओर न देखें। भूल से दिख जाए तो ऊपर वाला श्लोक पढ़ें और स्यमंतक कथा फिर से सुन लें।
- जितने दिन मूर्ति रखी है, रोज़ सुबह-शाम आरती और भोग लगाएँ। विसर्जन से पहले उत्तर पूजा करके क्षमा माँगें और मूर्ति को बहते पानी या घर पर ही बाल्टी/टब में विसर्जित करें।
नियम और सावधानियाँ
- गणेश पूजा में आम तौर पर तुलसी दल नहीं चढ़ाया जाता; दूर्वा और लाल फूल ज़रूर रखें।
- मिट्टी की बिना रंग वाली या प्राकृतिक रंग वाली मूर्ति चुनें, ताकि विसर्जन से नदी-तालाब गंदे न हों।
- मूर्ति स्थापित है तो घर को सूना न छोड़ें; सुबह-शाम दीपक जलता रहे।
- व्रत रखने वाले फलाहार करें और शाम की पूजा के बाद भोजन लें।
इस साल चतुर्थी कब है, मध्याह्न पूजा मुहूर्त और चंद्र दर्शन से बचने का समय गणेश चतुर्थी पृष्ठ पर देखें। पूजा के बाद जय गणेश जय गणेश देवा आरती और गणेश चालीसा पढ़ें। हर महीने की संकष्टी चतुर्थी के लिए संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा और विसर्जन वाले दिन की अनंत चतुर्दशी व्रत कथा भी देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गणेश चतुर्थी किस तिथि को मनाई जाती है?
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को। पूजा दोपहर के मध्याह्न काल में करना सबसे शुभ माना जाता है।
गणेश चतुर्थी पर चाँद क्यों नहीं देखते?
कथा के अनुसार गणेश जी का मज़ाक उड़ाने पर चंद्रमा को शाप मिला कि इस चतुर्थी की रात उसे देखने वाले पर झूठा कलंक लगेगा।
गलती से चाँद दिख जाए तो क्या करें?
श्रीकृष्ण की स्यमंतक मणि की कथा सुनें या पढ़ें और 'सिंहः प्रसेनमवधीत्' वाला श्लोक बोलें। परंपरा में इसे दोष शांति का उपाय माना गया है।
स्यमंतक मणि की कथा क्या है?
सत्राजित की स्यमंतक मणि खोने पर कृष्ण पर चोरी का झूठा आरोप लगा। कृष्ण ने जाम्बवान से मणि वापस लाकर सत्राजित को लौटाई और कलंक मिटाया।
गणेश जी को कितनी दूर्वा चढ़ाई जाती है?
परंपरा में 21 दूर्वा (या 21 गाँठें) और 21 मोदक चढ़ाने का चलन है।
