गणेश चतुर्थी
गणेश चतुर्थी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मनाई जाती है और इसी दिन से दस दिन का गणेशोत्सव शुरू होता है, जो अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन के साथ पूरा होता है। गणेश जी की स्थापना और पूजा दोपहर के मध्याह्न काल में की जाती है, और इस रात चाँद देखना वर्जित माना जाता है।
क्या है और क्यों मनाते हैं
गणेश जी विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य हैं; कोई भी शुभ काम उनकी पूजा से ही शुरू होता है। मान्यता है कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मध्याह्न में उनका प्राकट्य हुआ। इसी दिन चंद्रमा ने गणेश जी का उपहास किया था, और गणेश जी के शाप के कारण इस रात चाँद देखने पर झूठा कलंक लगने की बात कही जाती है। श्रीकृष्ण पर स्यमंतक मणि चुराने का झूठा आरोप इसी से जोड़ा जाता है, इसलिए उत्तर भारत में इसे कलंक चौथ या पत्थर चौथ भी कहते हैं। पूरी कथा गणेश चतुर्थी कथा में पढ़ें।
किस तिथि को
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी, जिस दिन मध्याह्न में चतुर्थी हो। शुक्ल पक्ष होने से अमांत और पूर्णिमांत में महीने का नाम एक ही है।
कैसे मनाते हैं
- मध्याह्न में मिट्टी की गणेश प्रतिमा की स्थापना, प्राण प्रतिष्ठा और षोडशोपचार पूजा।
- 21 दूर्वा, लाल फूल, सिंदूर, मोदक और लड्डू का भोग; रोज़ सुबह-शाम जय गणेश देवा आरती।
- कई परिवार डेढ़, तीन, पाँच या सात दिन बाद ही विसर्जन कर देते हैं; बड़े पंडाल दस दिन बाद अनंत चतुर्दशी पर।
- भूल से चाँद दिख जाए तो स्यमंतक मणि की कथा सुनने का विधान है।
क्षेत्रीय परंपराएँ
महाराष्ट्र में यह सबसे बड़ा उत्सव है, पर अब दिल्ली, इंदौर, भोपाल और लखनऊ जैसे शहरों में भी सार्वजनिक पंडाल लगते हैं। स्थापना से विसर्जन तक का पूरा क्रम गणेश स्थापना और विसर्जन विधि में दिया गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गणेश चतुर्थी कब होती है?
गणेश स्थापना किस समय करें?
गणेश चतुर्थी पर चाँद क्यों नहीं देखते?
गणेश जी को क्या भोग लगाएँ?
गणेश विसर्जन कब करें?
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