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श्री विनायक अष्टोत्तर शतनामावळि

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  1. ॐ गजाननाय नमः
  2. ॐ गणाध्यक्षाय नमः
  3. ॐ विघ्नराजाय नमः
  4. ॐ विघ्नेश्वराय नमः
  5. ॐ द्वैमातुराय नमः
  6. ॐ द्विमुखाय नमः
  7. ॐ प्रमुखाय नमः
  8. ॐ सुमुखाय नमः
  9. ॐ कृतिने नमः
  10. ॐ सुप्रदीप्ताय नमः
  11. ॐ सुखनिधये नमः
  12. ॐ सुराध्यक्षाय नमः
  13. ॐ सुरारिघ्नाय नमः
  14. ॐ महागणपतये नमः
  15. ॐ मान्याय नमः
  16. ॐ महाकालाय नमः
  17. ॐ महाबलाय नमः
  18. ॐ हेरंबाय नमः
  19. ॐ लंबजठराय नमः
  20. ॐ ह्रस्व ग्रीवाय नमः
  21. ॐ प्रथमाय नमः
  22. ॐ प्राज्ञाय नमः
  23. ॐ प्रमोदाय नमः
  24. ॐ मोदकप्रियाय नमः
  25. ॐ विघ्नकर्त्रे नमः
  26. ॐ विघ्नहंत्रे नमः
  27. ॐ विश्वनेत्रे नमः
  28. ॐ विराट्पतये नमः
  29. ॐ श्रीपतये नमः
  30. ॐ वाक्पतये नमः
  31. ॐ शृंगारिणे नमः
  32. ॐ आश्रित वत्सलाय नमः
  33. ॐ शिवप्रियाय नमः
  34. ॐ शीघ्रकारिणे नमः
  35. ॐ शाश्वताय नमः
  36. ॐ बल्वान्विताय नमः
  37. ॐ बलोद्दताय नमः
  38. ॐ भक्तनिधये नमः
  39. ॐ भावगम्याय नमः
  40. ॐ भावात्मजाय नमः
  41. ॐ अग्रगामिने नमः
  42. ॐ मंत्रकृते नमः
  43. ॐ चामीकर प्रभाय नमः
  44. ॐ सर्वाय नमः
  45. ॐ सर्वोपास्याय नमः
  46. ॐ सर्वकर्त्रे नमः
  47. ॐ सर्वनेत्रे नमः
  48. ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नमः
  49. ॐ सर्वसिद्धये नमः
  50. ॐ पंचहस्ताय नमः
  51. ॐ पार्वतीनंदनाय नमः
  52. ॐ प्रभवे नमः
  53. ॐ कुमारगुरवे नमः
  54. ॐ कुंजरासुरभंजनाय नमः
  55. ॐ कांतिमते नमः
  56. ॐ धृतिमते नमः
  57. ॐ कामिने नमः
  58. ॐ कपित्थफलप्रियाय नमः
  59. ॐ ब्रह्म चारिणे नमः
  60. ॐ ब्रह्मरूपिणे नमः
  61. ॐ महोदराय नमः
  62. ॐ मदोत्कटाय नमः
  63. ॐ महावीराय नमः
  64. ॐ मंत्रिणे नमः
  65. ॐ मंगळसुस्वराय नमः
  66. ॐ प्रमदाय नमः
  67. ॐ ज्यायसे नमः
  68. ॐ यक्षकिन्नर सेविताय नमः
  69. ॐ गंगासुताय नमः
  70. ॐ गणाधीशाय नमः
  71. ॐ गंभीरनिनदाय नमः
  72. ॐ वटवे नमः
  73. ॐ परस्मे नमः
  74. ॐ ज्योतिषे नमः
  75. ॐ आक्रांतपदचित्प्रभवे नमः
  76. ॐ अभीष्टवरदाय नमः
  77. ॐ मंगळप्रदाय नमः
  78. ॐ अव्यक्त रूपाय नमः
  79. ॐ पुराणपुरुषाय नमः
  80. ॐ पूष्णे नमः
  81. ॐ पुष्करोत्षिप्त वारणाय नमः
  82. ॐ अग्रगण्याय नमः
  83. ॐ अग्रपूज्याय नमः
  84. ॐ अपाकृतपराक्रमाय नमः
  85. ॐ सत्यधर्मिणे नमः
  86. ॐ सख्यै नमः
  87. ॐ साराय नमः
  88. ॐ सरसांबुनिधये नमः
  89. ॐ महेशाय नमः
  90. ॐ विशदांगाय नमः
  91. ॐ मणिकिंकिणीमेखलाय नमः
  92. ॐ समस्तदेवतामूर्तये नमः
  93. ॐ सहिष्णवे नमः
  94. ॐ ब्रह्मविद्यादि दानभुवे नमः
  95. ॐ जिष्णुवे नमः
  96. ॐ विष्णुप्रियाय नमः
  97. ॐ भक्तजीविताय नमः
  98. ॐ जीवतमन्मधाय नमः
  99. ॐ ऐश्वर्यकारणाय नमः
  100. ॐ सततोत्थिताय नमः
  101. ॐ विष्वग्धृशे नमः
  102. ॐ विश्वरक्षाविधानकृते नमः
  103. ॐ कळ्याण गुरवे नमः
  104. ॐ उन्मत्तवेषाय नमः
  105. ॐ परजयिने नमः
  106. ॐ समस्तजगदाधाराय नमः
  107. ॐ सर्वैश्वर्यप्रदाय नमः
  108. ॐ श्री विनायकाय नमः

|| इति श्री विनायक अष्टोत्तर शतनामावळि संपूर्णं ||

अर्थ

श्री विनायक अष्टोत्तर शतनामावलि भगवान गणेश के 108 पवित्र नामों का संग्रह है। यह नामावलि गणेश जी के विभिन्न रूपों, गुणों, कार्यों और महिमा का स्तुतिगान करती है। अष्टोत्तर शतनामावलि का अर्थ है 108 नामों की सूची, जो हिंदू धर्म में देवताओं की पूजा और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण साधन है। इन नामों का भक्तिपूर्वक जाप करने से भक्त गणेश जी की शक्ति से जुड़ते हैं और अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन देखते हैं।

गणेश जी हिंदू धर्म में प्रथम पूज्य देवता हैं। किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने से पहले उनकी पूजा की जाती है क्योंकि वे विघ्नहर्ता हैं, यानी बाधाओं को दूर करने वाले। यह अष्टोत्तर नामावलि गणेश जी के 'गजानन' (हाथी के मुख वाले), 'गणाध्यक्ष' (गणों के स्वामी), 'विघ्नराज' (विघ्नों के राजा), 'द्वैमातुर' (दो माताओं से उत्पन्न), 'प्रथम' (सबसे पहले पूजे जाने वाले) और 'मोदकप्रिय' (मोदक पसंद करने वाले) जैसे अनेक नामों को शामिल करती है। प्रत्येक नाम गणेश जी के एक विशिष्ट गुण या पौराणिक कथा को दर्शाता है, जो उनके दिव्य व्यक्तित्व की गहरी समझ प्रदान करता है।

इस नामावलि का पाठ केवल शब्दों की पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि भगवान के साथ गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने का एक माध्यम है। 'ॐ गजाननाय नमः' का उच्चारण करते समय, हम गजमुख गणेश को प्रणाम करते हैं, उनकी चेतना और शक्ति का स्मरण करते हैं। 'ॐ विघ्नहन्त्रे नमः' का जाप करते समय, हम अपने जीवन की सभी बाधाओं को दूर करने की शक्ति का आह्वान करते हैं। इन नामों के माध्यम से गणेश जी के विभिन्न स्वरूपों का ध्यान करने से मन शांत होता है, एकाग्रता बढ़ती है और सकारात्मक ऊर्जा हमारे चारों ओर फैलती है।

विनायक अष्टोत्तर शतनामावलि का नियमित पाठ भक्तों को आंतरिक शांति, ज्ञान और समृद्धि प्रदान करता है। यह भक्ति को मजबूत करता है और आध्यात्मिक विकास में सहायता करता है। यह नामावलि गणेश जी के अनंत गुणों की स्तुति करके, भक्तों को अपनी इच्छाओं को पूरा करने और जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए दिव्य कृपा दिलाती है। विशेष रूप से विनायक चतुर्थी या अन्य गणेश उत्सवों के दौरान इसका पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।

लाभ (Benefits):

  • बाधा निवारण: गणेश जी विघ्नहर्ता हैं, इसलिए इस नामावलि का पाठ करने से जीवन की सभी बाधाएँ, समस्याएँ और चुनौतियाँ दूर होती हैं।
  • बुद्धि और ज्ञान में वृद्धि: गणेश जी बुद्धि के देवता हैं। इस नामावलि के पाठ से ज्ञान, विवेक और सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
  • धन और समृद्धि: इस नामावलि का भक्तिपूर्वक पाठ करने से आर्थिक स्थिति सुधरती है, धन में वृद्धि होती है और जीवन में समृद्धि आती है।
  • मानसिक शांति और संतोष: गणेश जी के नामों का स्मरण करने से मन को शांति मिलती है, नकारात्मक विचार दूर होते हैं और मानसिक संतोष बढ़ता है।
  • मनोकामना पूर्ति: भक्ति से इस नामावलि का पाठ करने वाले भक्तों की सभी धर्मसम्मत इच्छाएँ और मनोकामनाएँ गणेश जी की कृपा से पूरी होती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री विनायक अष्टोत्तर शतनामावलि क्या है?
यह भगवान गणेश के 108 पवित्र नामों का संग्रह है, जिसमें प्रत्येक नाम गणेश जी के एक विशिष्ट गुण, रूप या कार्य का वर्णन करता है। इसे गणेश पूजा में प्रमुख रूप से उपयोग किया जाता है।
इस नामावलि का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस नामावलि का पाठ प्रतिदिन, विशेषकर विनायक चतुर्थी पर या किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने से पहले किया जा सकता है। स्नान करके शुद्ध होकर, दीपक जलाकर, भक्तिपूर्वक प्रत्येक नाम के साथ 'ॐ ... नमः' कहकर पाठ करना चाहिए।
श्री विनायक अष्टोत्तर शतनामावलि के पाठ के क्या लाभ हैं?
इसके पाठ से बाधाएँ दूर होती हैं, बुद्धि और ज्ञान में वृद्धि होती है, धन और समृद्धि प्राप्त होती है, मानसिक शांति मिलती है और सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।
इस नामावलि का पाठ कौन कर सकता है?
गणेश जी में श्रद्धा रखने वाला कोई भी व्यक्ति, लिंग, आयु या जाति के भेद के बिना इस नामावलि का पाठ कर सकता है। विशेषकर विद्यार्थी, व्यवसायी और नए कार्य शुरू करने वाले इसका पाठ करें तो शुभ होता है।
इस नामावलि का पाठ कितनी बार करना उत्तम है?
कम से कम एक माला (108 बार) पाठ करना उत्तम है। यदि संभव हो तो, प्रतिदिन या सप्ताह में एक बार पाठ कर सकते हैं। गणेश उत्सवों पर अधिक बार पाठ करना विशेष फलदायी होता है।
इस नामावलि का उद्गम क्या है?
यह नामावलि पुराणों और आगम ग्रंथों से संकलित की गई है। यह गणेश जी की स्तुति करने वाले प्राचीन और पवित्र स्तोत्रों में से एक है।

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