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श्री एकाक्षर गणपति कवचं

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स्तोत्रगणेश
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एकाक्षर गणपति कवचं

नमस्तस्मै गणेशाय सर्वविघ्नविनाशिने |
कार्यारंभेषु सर्वेषु पूजितो यः सुरैरपि ||1||

पार्वत्युवाच |
भगवन् देवदेवेश लोकानुग्रहकारकः |
इदानीं श्रोतृमिच्छामि कवचं यत्प्रकाशितं ||2||

एकाक्षरस्य मंत्रस्य त्वया प्रीतेन चेतसा |
वदैतद्विधिवद्देव यदि ते वल्लभास्म्यहं ||3||

ईश्वर उवाच |
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि नाख्येयमपि ते ध्रुवं |
एकाक्षरस्य मंत्रस्य कवचं सर्वकामदं ||4||

यस्य स्मरणमात्रेण न विघ्नाः प्रभवंति हि |
त्रिकालमेककालं वा ये पठंति सदा नराः ||5||

तेषां क्वापि भयं नास्ति संग्रामे संकटे गिरौ |
भूतवेतालरक्षोभिर्ग्रहैश्चापि न बाध्यते ||6||

इदं कवचमज्ञात्वा यो जपेद्गणनायकं |
न च सिद्धिमाप्नोति मूढो वर्षशतैरपि ||7||

अघोरो मे यथा मंत्रो मंत्राणामुत्तमोत्तमः |
तथेदं कवचं देवि दुर्लभं भुवि मानवैः ||8||

गोपनीयं प्रयत्नेन नाज्येयं यस्य कस्यचित् |
तव प्रीत्या महेशानि कवचं कथ्यतेऽद्भुतं ||9||

एकाक्षरस्य मंत्रस्य गणकश्चर्षिरीरितः |
त्रिष्टुप् छंदस्तु विघ्नेशो देवता परिकीर्तिता ||10||

गं बीजं शक्तिरोंकारः सर्वकामार्थसिद्धये |
सर्वविघ्नविनाशाय विनियोगस्तु कीर्तितः ||11||

ध्यानं |
रक्तांभोजस्वरूपं लसदरुणसरोजाधिरूढं त्रिनेत्रं
पाशं चैवांकुशं वा वरदमभयदं बाहुभिर्धारयंतं |
शक्त्या युक्तं गजास्यं पृथुतरजठरं नागयज्ञोपवीतं
देवं चंद्रार्धचूडं सकलभयहरं विघ्नराजं नमामि ||12||

कवचं |
गणेशो मे शिरः पातु फालं पातु गजाननः |
नेत्रे गणपतिः पातु गजकर्णः श्रुती मम ||13||

कपोलौ गणनाथस्तु घ्राणं गंधर्वपूजितः |
मुखं मे सुमुखः पातु चिबुकं गिरिजासुतः ||14||

जिह्वां पातु गणक्रीडो दंतान् रक्षतु दुर्मुखः |
वाचं विनायकः पातु कंठं पातु मदोत्कटः ||15||

स्कंधौ पातु गजस्कंधो बाहू मे विघ्ननाशनः |
हस्तौ रक्षतु हेरंबो वक्षः पातु महाबलः ||16||

हृदयं मे गणपतिरुदरं मे महोदरः |
नाभिं गंभीरहृदयो पृष्ठं पातु सुरप्रियः ||17||

कटिं मे विकटः पातु गुह्यं मे गुहपूजितः |
ऊरु मे पातु कौमारं जानुनी च गणाधिपः ||18||

जंघे जयप्रदः पातु गुल्फौ मे धूर्जटिप्रियः |
चरणौ दुर्जयः पातुर्सांगं गणनायकः ||19||

आमोदो मेऽग्रतः पातु प्रमोदः पातु पृष्ठतः |
दक्षिणे पातु सिद्धीशो वामे विद्याधरार्चितः ||20||

प्राच्यां रक्षतु मां नित्यं चिंतामणिविनायकः |
आग्नेय्यां वक्रतुंडो मे दक्षिणस्यामुमासुतः ||21||

नैरृत्यां सर्वविघ्नेशो पातु नित्यं गणेश्वरः |
प्रतीच्यां सिद्धिदः पातु वायव्यां गजकर्णकः ||22||

कौबेर्यां सर्वसिद्धीशो ईशान्यामीशनंदनः |
ऊर्ध्वं विनायकः पातु अधो मूषकवाहनः ||23||

दिवा गोक्षीरधवळः पातु नित्यं गजाननः |
रात्रौ पातु गणक्रीडो संध्ययो सुरवंदितः ||24||

पाशांकुशाभयकरः सर्वतः पातु मां सदा |
ग्रहभूतपिशाचेभ्यो पातु नित्यं गणेश्वरः ||25||

सत्त्वं रजस्तमो वाचं बुद्धिं ज्ञानं स्मृतिं दयां |
धर्मं चतुर्विधं लक्ष्मीं लज्जां कीर्तिं कुलं वपुः ||26||

धनधान्यगृहांदारान् पुत्रान्पौत्रान् सखींस्तथा |
एकदंतोऽवतु श्रीमान् सर्वतः शंकरात्मजः ||27||

सिद्धिदं कीर्तिदं देवि प्रपठेन्नियतः शुचिः |
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं वापि भक्तितः ||28||

न तस्य दुर्लभं किंचित् त्रिषु लोकेषु विद्यते |
सर्वपापविनिर्मुक्तो जायते भुवि मानवः ||29||

यं यं कामयते मर्त्यः सुदुर्लभमनोरथं |
तं तं प्राप्नोति सकलं षण्मासान्नात्र संशयः ||30||

मोहनस्तंभनाकर्षमारणोच्चाटनं वशं |
स्मरणादेव जायंते नात्र कार्या विचारणा ||31||

सर्वविघ्नहरेद्देवीं ग्रहपीडानिवारणं |
सर्वशत्रुक्षयकरं सर्वापत्तिनिवारणं ||32||

धृत्वेदं कवचं देवि यो जपेन्मंत्रमुत्तमं |
न वाच्यते स विघ्नौघैः कदाचिदपि कुत्रचित् ||33||

भूर्जे लिखित्वा विधिवद्धारयेद्यो नरः शुचिः |
एकबाहो शिरः कंठे पूजयित्वा गणाधिपं ||34||

एकाक्षरस्य मंत्रस्य कवचं देवि दुर्लभं |
यो धारयेन्महेशानि न विघ्नैरभिभूयते ||35||

गणेशहृदयं नाम कवचं सर्वसिद्धिदं |
पठेद्वा पाठयेद्वापि तस्य सिद्धिः करे स्थिता ||36||

न प्रकाश्यं महेशानि कवचं यत्र कुत्रचित् |
दातव्यं भक्तियुक्ताय गुरुदेवपराय च ||37||

इति श्रीरुद्रयामले पार्वतीपरमेश्वर संवादे एकाक्षरगणपतिकवचं संपूर्णं |

अर्थ

श्री एकाक्षर गणपति कवचम्, भगवान गणेश की शक्ति और सुरक्षा का एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है। किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में देवताओं द्वारा भी पूजित होने वाले गणेश जी, समस्त विघ्नों का नाश करने वाले हैं। इस कवच के महत्व के बारे में जब पार्वती देवी ने परमेश्वर से पूछा, तब लोक कल्याण के लिए इस गुप्त कवच का उपदेश भगवान शिव ने दिया। यह कवच भक्तों के समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाला और सभी विघ्नों को दूर करने की शक्ति रखता है।

भगवान शिव ने पार्वती से कहा कि यह कवच अत्यंत रहस्यमय है और इसे किसी को भी सहजता से नहीं बताना चाहिए। इसे अघोर मंत्रों से भी उत्तम और दुर्लभ बताया गया है। जो व्यक्ति इस कवच को जाने बिना गणपति का जप करता है, वह सैकड़ों वर्षों तक जप करने पर भी सिद्धि प्राप्त नहीं कर पाता। इस कवच के ऋषि गणक, छंद त्रिष्टुप्, देवता विघ्नेश, बीज मंत्र 'गं', शक्ति ओंकार, और सर्वकामार्थसिद्धि तथा सर्वविघ्नविनाश ही इसका विनियोग है। इस कवच का नियमित रूप से पाठ करने वालों को किसी भी प्रकार का भय, विघ्न, शत्रु बाधा, भूत-प्रेत-पिशाचों का कष्ट या ग्रह पीड़ा नहीं सताती।

इस कवच का पाठ करने से पहले भगवान गणपति का ध्यान किया जाता है। रक्त कमल पर आसीन, तीन नेत्रों वाले, पाश, अंकुश, वर और अभय मुद्रा धारण किए हुए, शक्ति से युक्त, बड़े उदर वाले, नाग यज्ञोपवीत धारण किए हुए, मस्तक पर अर्धचंद्र वाले, समस्त भयों को हरने वाले विघ्नराज का ध्यान करना चाहिए। कवच के भाग में, गणेश जी शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा करते हैं। गणेश सिर की, गजानन ललाट की, गणपति नेत्रों की, गजकर्ण कानों की, गणनाथ गालों की रक्षा करते हैं। इसी प्रकार हृदय, हाथ, पैर, आठों दिशाएँ, दिन-रात, ऊपर-नीचे – सभी की रक्षा गणपति के विभिन्न रूप करते हैं।

गणेश जी सत्व, रज, तम गुणों से युक्त होकर बुद्धि, ज्ञान, धर्म, लक्ष्मी, लज्जा, कीर्ति, परिवार, रूप, धन और संतान जैसी समस्त संपदाएँ प्रदान करते हैं। दिन में गोक्षीर वर्ण के रूप में और रात में गणक्रीड़ा रूप में, वे भूत-प्रेत-पिशाच और ग्रह बाधाओं से रक्षा करते हैं। इस कवच का भक्तिपूर्वक पाठ करने वालों को तीनों लोकों में भी दुर्लभ फल सहज ही प्राप्त हो जाते हैं। छह महीने के भीतर मनोरथ पूर्ण होते हैं। यह कवच मोहन, स्तंभन, वशीकरण शक्तियाँ भी प्रदान करता है और समस्त विघ्नों, ग्रह पीड़ाओं तथा शत्रुओं का नाश करता है। इसे धारण करने वाले या पाठ करने वाले गणेश जी की कृपा से सदैव सुरक्षित रहते हैं और विघ्न रहित जीवन जीते हैं।

लाभ (Benefits):

  • समस्त विघ्न निवारण: इस कवच के पाठ से जीवन की सभी बाधाएँ और विघ्न दूर हो जाते हैं।
  • सर्वकामसिद्धि: भक्तों के सभी मनोरथ और इच्छाएँ गणपति की कृपा से पूर्ण होती हैं।
  • पूर्ण सुरक्षा: भूत, प्रेत, पिशाच, ग्रह बाधाओं, शत्रुओं और सभी प्रकार के खतरों से पूर्ण सुरक्षा मिलती है।
  • ज्ञान और धन की प्राप्ति: बुद्धि, ज्ञान, धर्म, लक्ष्मी, कीर्ति, धन और उत्तम संतान जैसी समस्त संपदाएँ प्राप्त होती हैं।
  • मोहन, स्तंभन, वशीकरण शक्तियाँ: इस कवच के प्रभाव से मोहन, स्तंभन, वशीकरण जैसी शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, जिससे आंतरिक शक्ति बढ़ती है।
  • दुर्लभ फल प्राप्ति: तीनों लोकों में दुर्लभ माने जाने वाले फल केवल छह महीने के निरंतर पाठ से प्राप्त होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एकाक्षर गणपति कवचम् क्या है?
एकाक्षर गणपति कवचम् भगवान गणेश के एकाक्षर मंत्र 'गं' से संबंधित एक शक्तिशाली सुरक्षा स्तोत्र है। यह भक्तों को सभी बाधाओं, भय और नकारात्मक शक्तियों से बचाने के लिए बनाया गया है।
इस कवच का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस कवच का पाठ प्रतिदिन, विशेषकर सुबह स्नान के बाद शुद्ध मन से करना चाहिए। ध्यान के उपरांत भक्तिपूर्वक इसका पाठ करना अधिक फलदायी होता है।
एकाक्षर गणपति कवचम् के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इसके पाठ से समस्त विघ्न दूर होते हैं, मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं, शत्रु और ग्रह बाधाओं से रक्षा मिलती है तथा ज्ञान और धन की प्राप्ति होती है।
इस कवच का पाठ कौन कर सकता है?
कोई भी व्यक्ति जो भगवान गणपति में श्रद्धा और भक्ति रखता है, इस कवच का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से वे लोग जो बाधाओं का सामना कर रहे हैं या सुरक्षा चाहते हैं।
इस कवच का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
कम से कम दिन में एक बार या तीन बार (त्रिकाल) पाठ करना उत्तम माना जाता है। छह महीने के निरंतर पाठ से विशेष फल प्राप्त होते हैं।
इस कवच का उद्गम क्या है?
यह कवच भगवान शिव और पार्वती के संवाद के रूप में है। पार्वती देवी के अनुरोध पर, भगवान शिव ने लोक कल्याण के लिए इस गुप्त कवच का उपदेश दिया था।

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