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श्री ऋणहर्तृ गणेश स्तोत्रं

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स्तोत्रगणेश
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श्री ऋणहर्तृ गणेश स्तोत्रं

||अथ स्तोत्रं||

सृष्ट्यादौ ब्रह्मणा सम्यक्पूजितः फलसिद्धये |
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ||1||

त्रिपुरस्य वधात्पूर्वं शंभुना सम्यगर्चितः |
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ||2||

हिरण्यकशिप्वादीनां वधार्थे विष्णुनार्चितः |
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ||3||

महिषस्य वधे देव्या गणनाथः प्रपूजितः |
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ||4||

तारकस्य वधात्पूर्वं कुमारेण प्रपूजितः |
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ||5||

भास्करेण गणेशो हि पूजितश्छविसिद्धये |
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ||6||

शशिना कांतिवृद्ध्यर्थं पूजितो गणनायकः |
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ||7||

पालनाय स्वतपसां विश्वामित्रेण पूजितः |
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ||8||

इदं ऋणहरस्तोत्रं तीव्रदारिद्र्यनाशनं |
एकवारं पठेन्नित्यं वर्षमेकं समाहितः ||9||

दारिद्र्याद्दारुणान्मुक्तः कुबेरसंपदं व्रजेत् |
फडंतोऽयं महामंत्रः सार्थपंचदशाक्षरः ||10||

ॐ गणेश ऋणं छिंदि वरेण्यं हुं नमः फट् |
इमं मंत्रं पठेदंते ततश्च शुचिभावनः ||11||

एकविंशतिसंख्याभिः पुरश्चरणमीरितं |
सहस्रावर्तनात्सम्यक् षण्मासं प्रियतां व्रजेत् ||12||

बृहस्पतिसमो ज्ञाने धने धनपतिर्भवेत् |
अस्यैवायुतसंख्याभिः पुरश्चरणमीरितं ||13||

लक्षमावर्तनात्सम्यग्वांछितं फलमाप्नुयात् |
भूतप्रेतपिशाचानां नाशनं स्मृतिमात्रतः ||14 ||अथ प्रयोगः||

अस्य श्री ऋणहर्तृगणपतिस्तोत्र महामंत्रस्य | सदाशिव ऋषिः | अनुष्टुप् छंदः | श्रीऋणहर्तृगणपतिर्देवता | ग्लौं बीजं | गः शक्तिः | गं कीलकं | मम सकल ऋणनाशने जपे विनियोगः |

करन्यासः |
ॐ गणेश अंगुष्ठाभ्यां नमः |
ॐ ऋणं छिंदि तर्जनीभ्यां नमः |
ॐ वरेण्यं मध्यमाभ्यां नमः |
ॐ हुं अनामिकाभ्यां नमः |
ॐ नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः |
ॐ फट् करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः |

षडंगन्यासः |
ॐ गणेश हृदयाय नमः |
ॐ ऋणं छिंदि शिरसे स्वाहा |
ॐ वरेण्यं शिखायै वषट् |
ॐ हुं कवचाय हुं |
ॐ नमः नेत्रत्रयाय वौषट् |
ॐ फट् अस्त्राय फट् |

ध्यानं –
सिंदूरवर्णं द्विभुजं गणेशं
लंबोदरं पद्मदळे निविष्टं |
ब्रह्मादिदेवैः परिसेव्यमानं
सिद्धैर्युतं तं प्रणमामि देवं||

लमित्यादि पंचपूजा ||मंत्रः||
ॐ गणेश ऋणं छिंदि वरेण्यं हुं नमः फट् |

इति श्रीकृष्णयामलतंत्रे उमामहेश्वरसंवादे श्री ऋणहर्तृ गणेश स्तोत्रं |

अर्थ

श्री ऋणहर्तृ गणेश स्तोत्रम् भगवान श्री गणेश को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र स्तोत्र है, जिसका पाठ भक्तों को सभी प्रकार के ऋणों, चाहे वे आर्थिक हों, कर्मिक हों या मानसिक हों, से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है। इस स्तोत्र में बताया गया है कि सृष्टि के आरंभ में भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि कार्य की सिद्धि के लिए गणेश जी की पूजा की थी। त्रिपुरासुर का वध करने से पहले भगवान शिव ने, हिरण्यकशिपु आदि राक्षसों का संहार करने के लिए भगवान विष्णु ने, महिषासुर का वध करने के लिए देवी ने, तारकासुर का वध करने से पहले कुमारस्वामी ने, सूर्य देव ने अपनी कांति बढ़ाने के लिए, चंद्र देव ने अपनी खोई हुई चमक वापस पाने के लिए, और विश्वामित्र ऋषि ने अपनी तपस्या की रक्षा के लिए गणेश जी की आराधना की थी और सफलता प्राप्त की थी। इस प्रकार, देवताओं और ऋषियों द्वारा पूजित पार्वती पुत्र गणेश हमारे सभी ऋणों को नष्ट करें, यही इस स्तोत्र की मूल प्रार्थना है।

यह स्तोत्र भगवान गणेश की सर्वोच्च शक्ति और करुणा को उजागर करता है। गणेश जी को विघ्नहर्ता, सिद्धिदाता और ऋणहर्ता के रूप में जाना जाता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्त अपने जीवन में आने वाली सभी बाधाओं से मुक्ति पाता है। ऐसी मान्यता है कि यह कर्म ऋणों, पूर्व जन्म के पापों, वर्तमान जीवन की आर्थिक कठिनाइयों, मानसिक दुखों और संबंधों के ऋणों सहित सभी प्रकार के बंधनों से मुक्ति दिलाता है। गणेश जी की कृपा से, जीवन में समृद्धि, ज्ञान और शांति का वास होता है।

शास्त्रों के अनुसार, यह ऋणहर स्तोत्र तीव्र दरिद्रता का नाश करने की शक्ति रखता है। यदि इसका प्रतिदिन भक्तिपूर्वक एक वर्ष तक पाठ किया जाए, तो व्यक्ति सभी आर्थिक संकटों से मुक्त हो जाता है। इस स्तोत्र में 'ॐ गणेश ऋणं छिन्दि वरेण्यं हुं नमः फट्' नामक महामंत्र भी निहित है, जो ऋण मुक्ति के लिए अत्यंत शक्तिशाली है। इस मंत्र का जप शुद्धता और एकाग्रता के साथ करना चाहिए। मात्र 21 बार पुरश्चरण और उसके बाद 1000 बार जप करने से छह महीने के भीतर गणेश जी प्रसन्न हो जाते हैं। 10,000 बार जप करने से ज्ञान, धन और कुबेर के समान ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। एक लाख बार जप करने से सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं और भूत-प्रेत-पिशाच आदि नकारात्मक शक्तियाँ दूर हो जाती हैं।

संक्षेप में, यह स्तोत्र केवल आर्थिक ऋणों से ही नहीं, बल्कि हमारे आध्यात्मिक और मानसिक ऋणों से भी मुक्ति दिलाता है। यह गणेश जी की पूजा के महत्व पर जोर देता है और भक्तों को जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए साहस और शक्ति प्रदान करता है। इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से, गणेश जी के आशीर्वाद से जीवन में पूर्ण शांति और समृद्धि प्राप्त की जा सकती है।

लाभ (Benefits):

  • आर्थिक ऋणों से मुक्ति: इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से सभी प्रकार के आर्थिक संकटों और कर्जों से छुटकारा मिलता है।
  • दरिद्रता का नाश: यह अत्यधिक गरीबी और वित्तीय समस्याओं को दूर कर धन और समृद्धि लाता है।
  • बाधाओं का निवारण: चूंकि गणेश जी विघ्नहर्ता हैं, वे जीवन के सभी क्षेत्रों में आने वाली बाधाओं को दूर कर सफलता प्रदान करते हैं।
  • ज्ञान और धन की प्राप्ति: 'ॐ गणेश ऋणं छिन्दि वरेण्यं हुं नमः फट्' मंत्र का जप ज्ञान, बुद्धि और कुबेर के समान धन प्रदान करता है।
  • सर्वाभीष्ट सिद्धि: एक लाख बार मंत्र जप करने से सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं और भूत, प्रेत, पिशाच आदि बुरी शक्तियों से रक्षा मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री ऋणहर्तृ गणेश स्तोत्रं क्या है?
यह भगवान गणेश को समर्पित एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भक्तों को सभी प्रकार के ऋणों, जैसे आर्थिक, कर्मिक और मानसिक ऋणों से मुक्ति दिलाने में सहायता करता है। यह गणेश जी के विघ्नहर्ता और ऋणहर्ता स्वरूप का गुणगान करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन शुद्धता और एकाग्रता के साथ करना चाहिए। विशेष रूप से आर्थिक संकटों के दौरान या किसी नए कार्य को शुरू करने से पहले इसका पाठ करना शुभ माना जाता है। एक वर्ष तक नियमित पाठ से उत्तम फल प्राप्त होते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ करने के प्रमुख लाभ क्या हैं?
इस स्तोत्र का पाठ करने से आर्थिक ऋणों से मुक्ति, दरिद्रता का नाश, जीवन की बाधाओं का निवारण, ज्ञान और धन की प्राप्ति तथा सभी इच्छाओं की पूर्ति संभव होती है। यह नकारात्मक शक्तियों से भी रक्षा प्रदान करता है।
यह स्तोत्र किसे पढ़ना चाहिए?
जो लोग आर्थिक समस्याओं, कर्ज, दरिद्रता या किसी भी प्रकार की बाधाओं से पीड़ित हैं, वे इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। गणेश जी के भक्त और जीवन में समृद्धि व शांति चाहने वाले भी इसका पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र में निहित मंत्र का कितनी बार जप करना चाहिए?
'ॐ गणेश ऋणं छिन्दि वरेण्यं हुं नमः फट्' मंत्र का 21 बार पुरश्चरण और फिर 1000 बार जप करने से 6 महीने में गणेश जी प्रसन्न होते हैं। 10,000 बार जप से ज्ञान और धन, और एक लाख बार जप से सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं।
श्री ऋणहर्तृ गणेश स्तोत्र का उद्भव या पृष्ठभूमि क्या है?
यह स्तोत्र पुराणों पर आधारित है, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव, देवी, कुमारस्वामी, सूर्य, चंद्र और विश्वामित्र जैसे महान हस्तियों द्वारा अपनी-अपनी सिद्धियों के लिए गणेश जी की पूजा का वर्णन है। यह गणेश जी की सर्वशक्तिमत्ता को दर्शाता है।

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