गणेश चतुर्थी: स्थापना और विसर्जन विधि

गणेश चतुर्थी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को होती है; इस दिन मध्याह्न में मिट्टी की गणेश मूर्ति स्थापित कर रोज़ दूर्वा, मोदक और आरती से पूजा की जाती है और डेढ़, तीन, पाँच, सात या दस दिन बाद विसर्जन होता है। इस रात चंद्रमा देखना वर्जित माना जाता है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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गणेश चतुर्थी पर घर में गणपति बिठाने का मतलब है कुछ दिनों के लिए उन्हें मेहमान की तरह बुलाना: स्वागत, रोज़ की सेवा और फिर सम्मान से विदाई। यह त्योहार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को आता है। स्थापना दोपहर के मध्याह्न मुहूर्त में की जाती है और विसर्जन डेढ़ दिन से लेकर अनंत चतुर्दशी तक, अपनी सुविधा और परंपरा के हिसाब से होता है। इस साल का मुहूर्त गणेश चतुर्थी पृष्ठ पर देखें।

गणेश मूर्ति कैसी हो

पहले उत्तर भारत में यह पर्व महाराष्ट्र जितना बड़ा नहीं था, पर अब दिल्ली, इंदौर, लखनऊ, जयपुर से लेकर पटना तक घर-घर गणपति आते हैं। मूर्ति लेते समय कुछ बातों का ध्यान रखें:

  • मिट्टी की मूर्ति लें। शास्त्रों में पार्थिव (मिट्टी की) गणेश पूजा का ही विधान है, और यह पानी में घुल भी जाती है। प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की मूर्ति नदी-तालाब को नुकसान पहुँचाती है।
  • बैठी हुई मुद्रा घर के लिए अच्छी मानी जाती है।
  • घर के लिए आम तौर पर बाईं ओर मुड़ी सूंड वाली मूर्ति चुनी जाती है; दाईं सूंड वाले गणपति के नियम कड़े माने जाते हैं।
  • मूर्ति के साथ मूषक, हाथ में मोदक या लड्डू हो तो अच्छा।
  • आकार उतना ही रखें जितने का विसर्जन घर पर बाल्टी या टब में आराम से हो सके।

स्थापना मुहूर्त

मान्यता है कि गणेश जी का जन्म मध्याह्न में हुआ था, इसलिए चतुर्थी तिथि के भीतर दोपहर का समय स्थापना के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। अगर उस समय संभव न हो तो चतुर्थी तिथि रहते हुए किसी भी शुभ चौघड़िया में स्थापना कर सकते हैं। दिन का समय और राहुकाल आज के पंचांग में देख लें।

गणेश स्थापना विधि

पूजा की जगह एक दिन पहले साफ़ कर लें। सामग्री: चौकी, लाल या पीला कपड़ा, थोड़े चावल, कलश, आम के पत्ते, नारियल, रोली, हल्दी, चंदन, अक्षत, जनेऊ, लाल फूल (गुड़हल), दूर्वा (कम से कम 21), मोदक या बेसन के लड्डू, केले, सुपारी, पान, दीपक, धूप और कपूर।

  1. स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें। मूर्ति को घर लाते समय उसका मुँह ढककर रखें और घर के दरवाज़े पर स्वागत के लिए जल छिड़कें।
  2. उत्तर-पूर्व या पूर्व दिशा में चौकी रखें, उस पर लाल कपड़ा बिछाएँ और मुट्ठी भर चावल रखकर उस पर मूर्ति विराजमान करें।
  3. मूर्ति के दाहिनी ओर जल भरा कलश रखें, उस पर आम के पत्ते और नारियल।
  4. हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें कि आप कितने दिन के लिए गणपति बिठा रहे हैं।
  5. आह्वान करें: "हे गणपति, आप इस मूर्ति में पधारें और हमारी पूजा स्वीकार करें।" जानकार हों तो प्राण-प्रतिष्ठा के मंत्र पढ़ें या पंडित जी से कराएँ।
  6. मूर्ति पर जल के छींटे दें (मिट्टी की मूर्ति को पूरा स्नान न कराएँ), फिर रोली, चंदन, अक्षत, जनेऊ, लाल फूल और 21 दूर्वा चढ़ाएँ।
  7. मोदक, लड्डू और फल का भोग लगाएँ, पान-सुपारी रखें।
  8. "ॐ गं गणपतये नमः" का कम से कम 108 बार जाप करें।
  9. घी का दीपक जलाकर जय गणेश जय गणेश देवा आरती करें और प्रसाद बाँटें।

तुलसी गणेश जी को नहीं चढ़ाई जाती, यह बात बहुत से लोग भूल जाते हैं। उसकी जगह दूर्वा और शमी पत्र चढ़ाएँ।

रोज़ की पूजा और मोदक

जितने दिन गणपति घर में रहें, सुबह और शाम दोनों समय दीपक-आरती करें। सुबह जल के छींटे, ताज़ी दूर्वा और फूल, शाम को भोग और आरती। घर का कोई सदस्य हर समय उनके पास रहे, ऐसा ज़रूरी नहीं, पर घर को ताला लगाकर कई दिन बाहर न जाएँ। रोज़ श्री गणेश चालीसा का पाठ भी किया जा सकता है।

मोदक और भोग

गणपति का प्रिय भोग मोदक है। महाराष्ट्र के उकडीचे मोदक (चावल के आटे में नारियल-गुड़ भरकर भाप में पकाए) बनाना मुश्किल लगे तो उत्तर भारत में मावे के मोदक, बेसन या बूंदी के लड्डू, गुड़-नारियल के लड्डू भी उतने ही प्रेम से चढ़ाए जाते हैं। 21 मोदक का भोग विशेष माना जाता है। हर दिन अलग भोग रखने का रिवाज़ कई घरों में है: एक दिन खीर, एक दिन पूरनपोली, एक दिन केले।

विसर्जन: डेढ़, तीन, पाँच, सात या दस दिन

गणपति कितने दिन रखें, इसका कोई एक नियम नहीं है। डेढ़ दिन यानी अगले दिन दोपहर बाद, या तीसरे, पाँचवें, सातवें दिन, या फिर अनंत चतुर्दशी को, जब ज़्यादातर सार्वजनिक पंडालों का विसर्जन होता है। जितने दिन का संकल्प लिया, उतने दिन निभाएँ। अनंत चतुर्दशी की तिथि वहाँ देखें।

विसर्जन विधि

  1. विसर्जन के दिन सुबह सामान्य पूजा और आरती करें। यह "उत्तर पूजा" कहलाती है।
  2. दही-चावल या मोदक का अंतिम भोग लगाएँ और भूल-चूक के लिए क्षमा माँगें।
  3. हाथ में अक्षत लेकर मूर्ति पर छोड़ें और कहें कि अगले बरस फिर पधारें।
  4. "गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ" के जयकारे के साथ मूर्ति उठाएँ।
  5. घर पर साफ़ पानी की बाल्टी या टब में धीरे से विसर्जित करें। मिट्टी घुल जाए तो वह पानी पौधों या गमलों में डाल दें।
  6. कलश का जल घर में छिड़कें, नारियल प्रसाद के रूप में बाँट दें।

नदी या तालाब में विसर्जन करना हो तो नगर निगम के बनाए कृत्रिम कुंड का इस्तेमाल करें। फूल-माला और प्लास्टिक अलग कर दें।

चतुर्थी की रात चंद्र दर्शन न करें

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की रात चाँद देखना वर्जित माना जाता है, इसलिए उत्तर भारत में इसे कलंक चौथ या पत्थर चौथ भी कहते हैं। कथा के अनुसार, गणेश जी ने चंद्रमा को उनके घमंड के कारण शाप दिया था कि इस दिन जो उन्हें देखेगा, उस पर झूठा कलंक लगेगा। श्रीकृष्ण ने भी इसी दिन चाँद देखा था और उन पर स्यमंतक मणि की चोरी का आरोप लगा। पूरी कथा गणेश चतुर्थी व्रत कथा में पढ़ें।

अनजाने में चाँद दिख जाए तो घबराएँ नहीं। परंपरा में स्यमंतक मणि की कथा सुनने और यह श्लोक पढ़ने की बात कही गई है:

सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥

इसके बाद गणेश जी को प्रणाम करके मन से क्षमा माँग लें। डर की कोई बात नहीं है; यह नियम मन को संयम सिखाने के लिए है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

घर में गणेश जी कितने दिन रखने चाहिए?

डेढ़, तीन, पाँच, सात या दस दिन, जितने का संकल्प लिया हो। दस दिन वाले लोग अनंत चतुर्दशी को विसर्जन करते हैं।

गणेश स्थापना किस समय करें?

चतुर्थी तिथि के भीतर दोपहर का मध्याह्न समय सबसे अच्छा माना जाता है, क्योंकि मान्यता है कि गणेश जी का जन्म इसी समय हुआ। यह संभव न हो तो चतुर्थी रहते किसी शुभ समय में कर लें।

गणेश चतुर्थी पर चाँद देखने से क्या होता है?

परंपरा के अनुसार इस रात चंद्र दर्शन से झूठा कलंक लगने की मान्यता है। अनजाने में दिख जाए तो स्यमंतक मणि की कथा सुनें और 'सिंहः प्रसेनमवधीत्' श्लोक पढ़कर गणेश जी से क्षमा माँगें।

क्या गणेश जी को तुलसी चढ़ा सकते हैं?

नहीं, परंपरा में गणेश जी को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती। उनकी पूजा में दूर्वा, शमी पत्र और लाल फूल चढ़ाए जाते हैं।

घर पर गणेश विसर्जन कैसे करें?

उत्तर पूजा और आरती के बाद मिट्टी की मूर्ति को साफ़ पानी की बाल्टी या टब में धीरे से विसर्जित करें। मिट्टी घुलने पर वह पानी पौधों में डाल दें।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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