नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली): अभ्यंग स्नान, यम दीपक और रूप चौदस

नरक चतुर्दशी कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को, दिवाली से ठीक पहले मनाई जाती है और इसे छोटी दिवाली, नरक चौदस और रूप चौदस भी कहते हैं। इस दिन सूर्योदय से पहले तेल-उबटन लगाकर अभ्यंग स्नान होता है और रात को घर के बाहर दक्षिण दिशा में यम का दीपक जलाया जाता है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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नरक चतुर्दशी कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को, दिवाली की अमावस्या से ठीक पहले मनाई जाती है। इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले तेल-उबटन लगाकर अभ्यंग स्नान किया जाता है, शाम को घर में दीये जलते हैं और रात को यमराज के नाम का दीपक घर के बाहर दक्षिण दिशा में रखा जाता है। यह दिन श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की याद में मनाया जाता है।

कभी-कभी तिथियों के घटने-बढ़ने से छोटी और बड़ी दिवाली एक ही दिन पड़ जाती हैं। 2026 में ऐसा ही है: नरक चतुर्दशी और दिवाली दोनों 8 नवंबर को हैं, यानी उस दिन सुबह अभ्यंग स्नान और शाम को लक्ष्मी पूजन होगा। अभ्यंग स्नान का सही समय नरक चतुर्दशी पृष्ठ पर देखें।

एक दिन के कई नाम: छोटी दिवाली, नरक चौदस, रूप चौदस

  • छोटी दिवाली: उत्तर प्रदेश, बिहार और दिल्ली में यही नाम सबसे ज़्यादा चलता है, क्योंकि शाम को दिवाली जैसे ही, पर कम दीये जलाए जाते हैं।
  • नरक चतुर्दशी या नरक चौदस: नरकासुर वध की याद में, और इस मान्यता के कारण कि इस दिन के स्नान और दीपदान से नरक का भय दूर होता है।
  • रूप चौदस: राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में, जहाँ इस दिन उबटन और श्रृंगार पर ज़ोर रहता है।
  • काली चौदस: गुजरात और कुछ इलाकों में इस रात देवी काली और हनुमान जी की पूजा होती है।

नरकासुर वध की कथा संक्षेप में

भागवत पुराण के अनुसार प्रागज्योतिषपुर का राजा नरकासुर बहुत शक्तिशाली और अहंकारी हो गया था। उसने देवताओं को परेशान किया, देवमाता अदिति के कुंडल छीन लिए और हज़ारों राजकुमारियों को बंदी बना लिया। श्रीकृष्ण सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर गए और युद्ध में नरकासुर का वध किया। कई परंपराओं में कहा जाता है कि नरकासुर को वरदान था कि उसकी मृत्यु माता के हाथों होगी, और सत्यभामा भूदेवी का अंश थीं।

मृत्यु से पहले नरकासुर ने प्रार्थना की कि उसकी मृत्यु का दिन लोग दीपक जलाकर और स्नान करके मनाएँ। बंदी राजकुमारियों को श्रीकृष्ण ने मुक्त किया और सम्मान दिया। इसी विजय की खुशी में चौदस की सुबह स्नान और रात को दीपोत्सव होता है।

सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान: उबटन और अपामार्ग

अभ्यंग स्नान इस दिन का सबसे ख़ास नियम है। यह चतुर्दशी तिथि में, चंद्रोदय के बाद और सूर्योदय से पहले किया जाता है।

  1. सुबह जल्दी, लगभग चार-साढ़े चार बजे उठें।
  2. पूरे शरीर पर तिल का तेल लगाएँ और थोड़ी देर मालिश करें।
  3. फिर उबटन लगाएँ: बेसन, हल्दी, चंदन पाउडर और थोड़ा दूध या दही मिलाकर। कई घरों में सरसों पीसकर भी उबटन बनता है।
  4. स्नान के बीच अपामार्ग (चिचड़ा या लटजीरा) की टहनी को सिर के ऊपर से तीन बार घुमाया जाता है। यह न मिले तो इस चरण को छोड़ सकते हैं।
  5. गुनगुने पानी से स्नान करें, साफ़ या नए कपड़े पहनें।
  6. स्नान के बाद दक्षिण की ओर मुँह करके यमराज को जल अर्पित करें और प्रणाम करें। कुछ लोग इस समय विधि से यम तर्पण भी करते हैं।

महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में यह स्नान दिवाली की सबसे बड़ी रस्म है। उत्तर भारत में भी कई परिवार इसे निभाते हैं, ख़ासकर बच्चों को उबटन लगाकर नहलाने की परंपरा।

यम का दीपक: दिशा, समय, बत्ती

नरक चतुर्दशी की रात यम के नाम का दीपक जलाने की परंपरा उत्तर भारत में बहुत पुरानी है। कुछ परिवार यह दीपक धनतेरस की शाम जलाते हैं, कुछ चौदस की रात, और कई दोनों दिन। धनतेरस के यम दीपक के बारे में धनतेरस की कथा में राजा हिम के पुत्र की कहानी आती है।

बातपरंपरा
दीपकमिट्टी या आटे का, अक्सर पुराना दीपक; कई घरों में चौमुखा
तेलसरसों का तेल
बत्तीचार बत्तियाँ, या एक मोटी बत्ती
दिशाघर के बाहर, दक्षिण की ओर मुँह करके
समयरात को, जब घर के सब लोग खाना खा लें
जगहमुख्य द्वार के बाहर, या नाली/कूड़ेदान के पास

पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कई घरों में इसे "जम का दीया" कहते हैं। घर की सबसे बड़ी महिला रात को दीया जलाकर पूरे घर में घुमाती है और फिर बाहर दक्षिण की ओर रख आती है। इसके बाद उस दीये को कोई पलटकर नहीं देखता और घर के लोग उस रात बाहर नहीं निकलते। यह परंपरा परिवार को अकाल मृत्यु के भय से बचाने की प्रार्थना है।

रूप चौदस पर श्रृंगार

राजस्थान और गुजरात में इस दिन को रूप चौदस कहा जाता है, और महिलाएँ अभ्यंग स्नान के बाद ख़ास श्रृंगार करती हैं। मान्यता है कि इस दिन श्रीकृष्ण की आराधना करके उबटन लगाने से रूप और सौभाग्य बढ़ता है।

  • नहाने के बाद नए कपड़े पहनें।
  • मेहंदी, काजल, बिंदी और सिंदूर लगाएँ।
  • श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री का भोग लगाएँ और दीपक जलाएँ।

दिवाली की पूरी तैयारी के बीच यह दिन ख़ुद को सँवारने का दिन भी है, और घर की लड़कियाँ इसे उत्साह से मनाती हैं।

शाम के दीपक और हनुमान पूजा की मान्यता

छोटी दिवाली की शाम घर में दीये जलाए जाते हैं, पर दिवाली से कम। कई घरों में 14 दीये जलाने का चलन है, चतुर्दशी तिथि के कारण। इन्हें मुख्य द्वार, रसोई, पानी के स्थान, आँगन, तुलसी और छत पर रखा जाता है। किस जगह कितने दीये रखें, इसकी पूरी जानकारी दिवाली पर कितने दीपक जलाएं और कहाँ रखें लेख में है।

उत्तर भारत की एक परंपरा में कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हनुमान जयंती भी मनाई जाती है। अयोध्या में यह दिन ख़ास तौर पर हनुमान जी का जन्मोत्सव माना जाता है। इस शाम हनुमान जी को सिंदूर, चमेली का तेल और लड्डू चढ़ाकर हनुमान जी की आरती की जाती है। चैत्र पूर्णिमा वाली हनुमान जयंती ज़्यादा प्रचलित है; दोनों परंपराएँ मानी जाती हैं।

अगले दिन की बड़ी पूजा के लिए दिवाली का मुहूर्त पहले से देख लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नरक चतुर्दशी पर अभ्यंग स्नान कब करें?

अभ्यंग स्नान चतुर्दशी तिथि में, चंद्रोदय के बाद और सूर्योदय से पहले किया जाता है। हर साल का सही समय नरक चतुर्दशी के पृष्ठ पर देखें।

यम का दीपक किस दिशा में रखते हैं?

यम का दीपक घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके रखा जाता है, आमतौर पर सरसों के तेल वाला चौमुखा या पुराना मिट्टी का दीया।

छोटी दिवाली और रूप चौदस में क्या अंतर है?

दोनों एक ही दिन के नाम हैं। उत्तर प्रदेश-बिहार में इसे छोटी दिवाली कहते हैं, जबकि राजस्थान-गुजरात में रूप चौदस, जहाँ उबटन और श्रृंगार पर ज़ोर रहता है।

छोटी दिवाली पर कितने दीये जलाने चाहिए?

कई घरों में चतुर्दशी तिथि के कारण 14 दीये जलाने का चलन है। संख्या से ज़्यादा ज़रूरी है कि द्वार, रसोई, पानी के स्थान और तुलसी पर दीया ज़रूर हो।

अपामार्ग न मिले तो क्या करें?

अपामार्ग न मिले तो उसे छोड़कर तेल-उबटन के साथ अभ्यंग स्नान कर लें। स्नान और यम को प्रणाम ही मुख्य नियम हैं।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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