भाई दूज तिलक विधि, थाली और नियम

भाई दूज कार्तिक शुक्ल द्वितीया को, दिवाली के दो दिन बाद मनाया जाता है, जब बहन भाई को रोली-अक्षत का तिलक लगाकर उसकी लंबी आयु की कामना करती है और उसे भोजन कराती है। तिलक दोपहर बाद (अपराह्न काल) में करना सबसे शुभ माना जाता है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 6 मिनट का पाठ
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भाई दूज पर बहन अपने भाई को रोली-अक्षत का तिलक लगाती है, कलावा बाँधती है, आरती उतारती है और अपने हाथ से भोजन कराती है, और भाई बहन को उपहार देकर उसकी रक्षा का वचन देता है। यह पर्व कार्तिक शुक्ल द्वितीया को, गोवर्धन पूजा के अगले दिन मनाया जाता है और इसे यम द्वितीया भी कहते हैं। 2026 में भाई दूज 11 नवंबर को है; तिलक का शुभ समय भाई दूज पृष्ठ पर देखें।

यम-यमुना से जुड़ा महत्व

सूर्य देव की दो संतानें थीं, यमराज और यमुना। यमुना अपने भाई से बहुत स्नेह करती थीं और बार-बार उन्हें अपने घर आने का निमंत्रण देती थीं, पर यमराज अपने काम में व्यस्त रहते थे। कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन वे अचानक बहन के घर पहुँचे। यमुना ने उनका तिलक किया, आरती उतारी और प्रेम से भोजन कराया। प्रसन्न होकर यमराज ने वर माँगने को कहा, तो यमुना ने माँगा कि इस दिन जो भाई अपनी बहन के घर जाकर तिलक कराए और भोजन करे, उसे यम का भय न रहे। यमराज ने यह वर दे दिया।

इसीलिए भाई दूज पर भाई का बहन के घर जाना सबसे अच्छा माना जाता है। पूरी कथा भाई दूज की कथा पृष्ठ पर पढ़ें। कई घरों में तिलक से पहले यही कथा सुनी जाती है।

तिलक की थाली में क्या रखें

  • रोली (या कुमकुम) और अक्षत
  • कलावा (मौली)
  • घी का दीपक
  • मिठाई, ख़ासकर भाई की पसंद की
  • सूखा नारियल (गोला), जो तिलक के बाद भाई को दिया जाता है
  • पान का पत्ता, सुपारी, बताशे
  • कुछ फूल और एक लोटा जल
  • चंदन (कई घरों में रोली की जगह या साथ में)
  • भाई के बैठने के लिए आसन या पटरा, और नीचे चावल के आटे से बना चौक

गोला न मिले तो पानी वाला नारियल या कोई फल दे सकते हैं। बहुत से घरों में भाई के हाथ में पान, सुपारी और एक सिक्का भी रखा जाता है।

तिलक विधि और शुभ समय

शास्त्रों में यम द्वितीया का तिलक अपराह्न काल में, यानी दोपहर बाद लगभग एक से साढ़े तीन बजे के बीच करना सबसे शुभ बताया गया है। अगर उस समय संभव न हो, तो शुभ या लाभ चौघड़िया देख लें; चौघड़िया पढ़ने का तरीका चौघड़िया कैसे देखें लेख में है, और आज का समय पंचांग में मिल जाएगा। राहुकाल में तिलक न करें।

  1. तिलक तक बहन व्रत या कम से कम उपवास जैसा रखे, यह कई घरों की परंपरा है। भाई भी तिलक से पहले कुछ नहीं खाता।
  2. चावल के आटे से ज़मीन पर चौक बनाएँ और उस पर पटरा या आसन रखें।
  3. भाई को पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बिठाएँ, सिर पर रूमाल या टोपी रखें।
  4. पहले गणेश जी को प्रणाम करें और दीपक जलाएँ।
  5. भाई के माथे पर रोली या चंदन का तिलक लगाएँ और उस पर अक्षत चिपकाएँ।
  6. दाहिने हाथ की कलाई पर कलावा बाँधें।
  7. भाई की हथेली में पान, सुपारी, फूल और गोला रखकर ऊपर से थोड़ा जल डालें। इस समय कई बहनें यह लोक-वाक्य बोलती हैं: "गंगा पूजे यमुना को, यमी पूजे यमराज को, सुभद्रा पूजे कृष्ण को; जैसे गंगा-यमुना की धारा बहे, वैसे मेरे भाई की आयु बढ़े।"
  8. दीपक से आरती उतारें और मिठाई खिलाएँ।
  9. भाई बहन के पैर छूता है (अगर बहन बड़ी है) या बहन भाई के, और भाई उपहार देता है।
  10. तिलक के बाद भाई बहन के घर भोजन करता है। चावल इस दिन की थाली में ज़रूर रहते हैं, क्योंकि यमुना ने यमराज को चावल खिलाए थे, ऐसी मान्यता है।

बिहार-पूर्वांचल में गोधन कूटना

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में भाई दूज की सुबह "गोधन" या "गोधन कूटने" की अनोखी रस्म होती है, जो पश्चिमी उत्तर भारत में नहीं दिखती।

  • आँगन या गली में महिलाएँ गोबर से एक चौकोर घेरा बनाती हैं और उसमें यम-यमी, साँप, बिच्छू जैसी आकृतियाँ बनाती हैं।
  • सब बहनें इकट्ठा होकर पारंपरिक गीत गाती हैं और मज़ाक में अपने भाइयों को "श्राप" देती हैं।
  • फिर पश्चाताप के तौर पर रेंगनी (भटकटैया) के काँटे से अपनी जीभ हल्के से छूती हैं और वह श्राप वापस लेकर भाई को लंबी उम्र का आशीर्वाद देती हैं।
  • गोबर की आकृति को मूसल से "कूटा" जाता है, जो भाई के सारे संकटों को कूट देने का प्रतीक है।
  • इसके बाद बहनें भाइयों को "बजरी" (भीगे चने या अनाज के दाने) निगलने को देती हैं और फिर तिलक होता है।

यह रस्म जितनी अनोखी है, उतनी ही प्यारी भी: पहले नाराज़गी, फिर मनुहार और आशीर्वाद। पश्चिमी यूपी और हरियाणा में गोबर से जुड़ी रस्म एक दिन पहले गोवर्धन पूजा पर होती है, जिसके बारे में गोवर्धन पूजा और अन्नकूट विधि में पढ़ें।

यमुना स्नान की परंपरा

मान्यता है कि भाई दूज पर भाई-बहन साथ में यमुना में स्नान करें तो यम का भय दूर होता है। मथुरा के विश्राम घाट पर इस दिन बड़ी संख्या में भाई-बहन साथ स्नान करते हैं और वहाँ के यमुना-धर्मराज मंदिर में दर्शन करते हैं। दिल्ली और आगरा में भी लोग यमुना घाटों पर जाते हैं। जो यमुना तक नहीं जा सकते, वे घर पर नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल या यमुना जल मिलाकर स्नान करते हैं। मथुरा जाने से पहले घाटों की भीड़ और व्यवस्था की जानकारी स्थानीय प्रशासन से ले लें, क्योंकि यह हर साल बदलती है।

बहन या भाई दूर हों तो क्या करें

स्थितिक्या करें
भाई दूसरे शहर में हैबहन भाई की तस्वीर पर तिलक करके दीपक दिखाए, और वीडियो कॉल पर भाई खुद तिलक लगाए। मिठाई और गोला पहले से भेज दें।
बहन नहीं हैचचेरी-ममेरी बहन, मुँहबोली बहन या घर की किसी बड़ी महिला से तिलक करवाएँ। कई लोग इस दिन यमुना जी को बहन मानकर नदी या गंगाजल को प्रणाम करते हैं।
भाई नहीं हैबहन चचेरे भाई, मुँहबोले भाई को तिलक कर सकती है, या चंद्रमा को भाई मानकर अर्घ्य देने की परंपरा भी कई जगह है।
तिलक का समय निकल गयाद्वितीया तिथि जब तक है, तब तक तिलक किया जा सकता है।

भाई दूज रिश्ते का पर्व है, इसलिए दूरी में भी भाव बना रहे, यही सबसे ज़रूरी है। राखी के बाद यह भाई-बहन का दूसरा बड़ा पर्व है; राखी के बारे में रक्षाबंधन पृष्ठ देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भाई दूज पर तिलक किस समय करना चाहिए?

शास्त्रों में भाई दूज का तिलक अपराह्न काल यानी दोपहर बाद करना सबसे शुभ बताया गया है। राहुकाल से बचें और द्वितीया तिथि रहते तिलक कर लें।

भाई दूज की थाली में क्या रखें?

थाली में रोली, अक्षत, कलावा, घी का दीपक, मिठाई, सूखा नारियल (गोला), पान, सुपारी, बताशे और फूल रखें।

गोधन कूटना क्या है?

बिहार और पूर्वांचल में भाई दूज की सुबह बहनें गोबर से गोधन की आकृति बनाकर उसे मूसल से कूटती हैं, भाइयों को मज़ाक में श्राप देकर फिर आशीर्वाद देती हैं। यह भाई के संकट दूर करने का प्रतीक है।

भाई दूर हो तो भाई दूज कैसे मनाएं?

बहन भाई की तस्वीर पर तिलक कर सकती है और वीडियो कॉल पर भाई खुद तिलक लगा सकता है। मिठाई और गोला पहले से भेज दें।

भाई दूज को यम द्वितीया क्यों कहते हैं?

मान्यता है कि इसी दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर गए थे और उन्होंने वर दिया कि इस दिन बहन से तिलक कराने वाले भाई को यम का भय नहीं होगा।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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