गोवर्धन पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को, आमतौर पर दिवाली के अगले दिन होती है। इसमें घर के आँगन में गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाकर उसकी पूजा और परिक्रमा की जाती है, गायों का पूजन होता है, और श्रीकृष्ण को अन्नकूट का भोग लगता है, यानी अनाज और सब्ज़ियों से बने ढेर सारे व्यंजन। कभी-कभी अमावस्या लंबी चलने से दिवाली और गोवर्धन के बीच एक दिन का अंतर आ जाता है; 2026 में दिवाली 8 नवंबर और गोवर्धन पूजा 10 नवंबर को है। मुहूर्त गोवर्धन पूजा पृष्ठ पर देखें।
गोवर्धन पूजा क्यों: इंद्र का मान-भंग
भागवत पुराण के दशम स्कंध में यह कथा है। ब्रज के लोग हर साल वर्षा के देवता इंद्र की बड़ी पूजा करते थे। बालक कृष्ण ने नंद बाबा से पूछा कि हमारी गायें गोवर्धन पर्वत पर चरती हैं, वहीं से घास और पानी मिलता है, तो पूजा उसी की क्यों न हो? ब्रजवासियों ने उस साल इंद्र की जगह गोवर्धन की पूजा की और पकवानों का पहाड़ भोग में चढ़ाया।
इंद्र को यह अपमान लगा और उसने ब्रज पर सात दिन तक मूसलाधार बारिश करवाई। तब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उँगली पर उठा लिया और पूरा ब्रज, गायों समेत, उसके नीचे सुरक्षित रहा। सातवें दिन इंद्र को अपनी भूल समझ आई और उसने कृष्ण से क्षमा माँगी। तभी से कृष्ण "गिरिधारी" कहलाए और यह दिन गोवर्धन पूजा के रूप में मनाया जाने लगा। कृष्ण के जन्म और बाल-लीलाओं के उत्सव जन्माष्टमी से जुड़ी यह सबसे प्रिय लीलाओं में है।
गोबर से गोवर्धन बनाना
सुबह गाय का ताज़ा गोबर लाकर आँगन या घर के बाहर साफ़ लीपी हुई जगह पर गोवर्धन बनाया जाता है।
- ज़मीन पर गोबर से लेटे हुए पुरुष की आकृति बनाएँ। यही "गोवर्धन महाराज" हैं। कई घरों में इसे पर्वत के आकार का ढेर या घेरा भी बनाते हैं।
- आकृति की नाभि की जगह एक छोटा गड्ढा छोड़ें। यहाँ बाद में दीपक या दूध-दही रखा जाता है।
- आसपास गोबर से छोटी गायें, बछड़े, ग्वाले और पेड़ बनाएँ।
- आकृति को फूलों, खील, रुई के फाहों, सींकों और रंगोली से सजाएँ। कुछ घर गन्ने के टुकड़े भी लगाते हैं।
शहरों में जहाँ गोबर मिलना मुश्किल है, वहाँ लोग मंदिर की गौशाला से थोड़ा गोबर ले आते हैं, या गोवर्धन का चित्र रखकर, या अन्नकूट के भोग का छोटा पहाड़ बनाकर उसी को गोवर्धन मानकर पूजा करते हैं।
पूजा विधि और परिक्रमा
- गोवर्धन के पास एक चौकी पर श्रीकृष्ण (गिरिधारी रूप) का चित्र रखें।
- गोवर्धन पर रोली, अक्षत, फूल, खील-बताशे चढ़ाएँ।
- नाभि वाले गड्ढे में दूध, दही, शहद या गंगाजल डालें, या वहाँ घी का दीपक रखें।
- धूप-दीप दिखाकर अन्नकूट और मिठाइयों का भोग लगाएँ।
- परिवार के सब लोग गोवर्धन की सात परिक्रमा करें। परिक्रमा करते समय एक व्यक्ति लोटे से पानी या दूध की पतली धार गिराता चलता है और दूसरा जौ या अनाज के दाने बिखेरता है।
- आरती कुंजबिहारी की गाएँ और परिवार के लिए सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
ब्रज में असली गिरिराज पर्वत की लगभग 21 किलोमीटर की परिक्रमा इस दिन बहुत बड़ी संख्या में भक्त करते हैं। जतीपुरा के मुखारविंद मंदिर में गिरिराज जी का दुग्धाभिषेक होता है। अगर आप वहाँ जाने की योजना बना रहे हैं, तो भीड़ और यातायात व्यवस्था की जानकारी स्थानीय प्रशासन से पहले ले लें, क्योंकि यह हर साल बदलती है।
अन्नकूट: छप्पन भोग और कढ़ी-बाजरा
"अन्नकूट" का मतलब है अन्न का पहाड़। ब्रजवासियों ने जैसे गोवर्धन को पकवानों का पहाड़ चढ़ाया था, वैसे ही इस दिन घरों और मंदिरों में कई तरह के व्यंजन बनाकर भोग लगाया जाता है।
- अन्नकूट की सब्ज़ी: मौसम की सारी सब्ज़ियाँ (आलू, गोभी, मूली, बैंगन, पालक, मेथी, गाजर, सेम, शकरकंद, कद्दू) एक साथ मिलाकर बनाई गई सब्ज़ी। यह इस दिन की पहचान है।
- कढ़ी और बाजरा: हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी यूपी में बाजरे की खिचड़ी या बाजरे की रोटी के साथ कढ़ी ज़रूर बनती है, क्योंकि यह नई बाजरे की फ़सल का समय है।
- चावल और पूरी: कई घरों में चावल का ढेर बनाकर उसे पर्वत का आकार देते हैं।
- मिठाई: खीर, हलवा, लड्डू, पेड़ा और दिवाली की बची मिठाइयाँ।
मंदिरों में "छप्पन भोग" लगता है, यानी 56 तरह के व्यंजन। मान्यता है कि सात दिन पर्वत उठाए रखने में कृष्ण ने भोजन नहीं किया था, और दिन में आठ बार भोजन करने वाले कान्हा के लिए सात दिनों के 56 भोग बाद में एक साथ बनाए गए। घर में 56 व्यंजन बनाना ज़रूरी नहीं; जितना बन सके, उतना प्रेम से बनाएँ। भोग के बाद अन्नकूट का प्रसाद पड़ोसियों और ज़रूरतमंदों में बाँटा जाता है।
ब्रज, राजस्थान और पूर्वांचल की परंपराएँ
| क्षेत्र | परंपरा |
|---|---|
| ब्रज (मथुरा-वृंदावन-गोवर्धन) | गिरिराज परिक्रमा, मंदिरों में अन्नकूट दर्शन, घर-घर गोबर का गोवर्धन |
| राजस्थान (नाथद्वारा) | श्रीनाथजी मंदिर का अन्नकूट उत्सव; भोग के बाद आसपास के आदिवासी समुदाय के लोग पारंपरिक रूप से अन्नकूट "लूटते" हैं |
| हरियाणा और दिल्ली | कढ़ी-बाजरा, आँगन में गोवर्धन, शाम को परिक्रमा |
| पंजाब-हरियाणा के कारखाने | कई जगह इसी दिन विश्वकर्मा पूजा और औज़ारों की पूजा |
| पूर्वांचल और बिहार | गोवर्धन पूजा का चलन कम; गोबर की आकृति बनाकर "गोधन कूटने" की रस्म अगले दिन भाई दूज पर होती है |
| गुजरात | यह दिन नए साल (बेसतू वरस) के रूप में मनाया जाता है |
पूर्वांचल की गोधन रस्म के बारे में भाई दूज तिलक विधि वाले लेख में विस्तार से लिखा है।
गौ पूजा
गोवर्धन पूजा गायों का भी पर्व है, क्योंकि कृष्ण ने पर्वत गायों और ग्वालों की रक्षा के लिए उठाया था।
- सुबह गायों और बछड़ों को नहलाएँ।
- सींगों पर रंग या मेहंदी लगाएँ, गले में माला और घंटी बाँधें।
- रोली-अक्षत से तिलक करें और गुड़, रोटी, हरा चारा खिलाएँ।
- गाय की परिक्रमा करके प्रणाम करें।
जिनके घर में गाय नहीं है, वे पास की गौशाला में जाकर चारा और गुड़ दान कर सकते हैं। यह इस दिन की सबसे सीधी और सुंदर सेवा है। पंचांग की तिथि और मुहूर्त दिवाली पर्व पृष्ठ पर पाँचों दिनों के साथ दिए गए हैं।

