तुलसी विवाह में घर की तुलसी को दुल्हन मानकर भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप से उसका विवाह कराया जाता है। यह कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी) की शाम या द्वादशी को होता है, और कई परिवार इसे कार्तिक पूर्णिमा तक किसी भी दिन कर लेते हैं। उत्तर भारत में इसके बाद ही शादियों का मौसम शुरू माना जाता है। 2026 में तुलसी विवाह 21 नवंबर को है; हर साल की तिथि तुलसी विवाह पृष्ठ पर देखें।
तुलसी विवाह कब: एकादशी या द्वादशी
पद्म पुराण के कार्तिक माहात्म्य की परंपरा में तुलसी विवाह का मुख्य दिन कार्तिक शुक्ल द्वादशी है। उत्तर प्रदेश और राजस्थान के बहुत से घरों में देव जगाने के तुरंत बाद, उसी एकादशी की शाम विवाह करा देते हैं, ताकि एक ही मंडप में दोनों काम हो जाएँ। महाराष्ट्र और गुजरात में द्वादशी से पूर्णिमा तक तुलसी विवाह चलते हैं। जो आपके घर में होता आया है, वही दिन रखें। विवाह शाम को, गोधूलि बेला या प्रदोष काल में करना सबसे अच्छा माना जाता है।
वृंदा और जालंधर की कथा, जिसके कारण तुलसी को विष्णु की पत्नी का स्थान मिला, तुलसी विवाह कथा में पढ़ें। संक्षेप में: पतिव्रता वृंदा के श्राप से विष्णु शालिग्राम बने और वृंदा तुलसी के रूप में पूजी गईं, इसलिए हर साल दोनों का विवाह कराया जाता है।
सामग्री लिस्ट
- तुलसी का गमला: साफ़ करके गेरू या चूने से रंगा हुआ।
- शालिग्राम: न हो तो भगवान विष्णु या श्री कृष्ण की छोटी मूर्ति या तस्वीर।
- गन्ना: 4 डंठल, मंडप के लिए।
- तुलसी का श्रृंगार: लाल चुनरी, चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर, मेहँदी, बिछिया, काजल, छोटा शीशा-कंघी; यानी सुहाग की पूरी पिटारी।
- दूल्हे के लिए: पीला वस्त्र, जनेऊ, मौली, छोटा मुकुट या पगड़ी।
- कलश, आम के पत्ते, नारियल, गंगाजल।
- हल्दी, रोली, चंदन, अक्षत, फूल, फूलमाला (दो, वरमाला के लिए)।
- घी के दीये, धूप, कपूर।
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)।
- मौसमी फल: सिंघाड़ा, बेर, शकरकंद, आँवला, केला।
- भोग: खीर, हलवा या मिठाई; पान-सुपारी, लौंग-इलायची।
- कन्यादान के लिए वस्त्र, दक्षिणा और कुछ बर्तन या सुहाग का सामान।
सब कुछ जुटा न सकें तो चिंता न करें। एक लाल चुनरी, सिंदूर, हल्दी, दीया और शालिग्राम या भगवान की तस्वीर से भी तुलसी विवाह पूरे भाव से हो जाता है।
मंडप और तुलसी का श्रृंगार
आँगन या छत पर तुलसी का गमला रखें और उसके चारों कोनों पर गन्ने के डंठल खड़े करके ऊपर से बाँध दें। मंडप पर आम के पत्ते, गेंदे की माला और लाल चुनरी डाल दें। नीचे रंगोली या चौक बनाएँ।
तुलसी को जल चढ़ाकर लाल चुनरी ओढ़ाएँ, चूड़ियाँ पहनाएँ, सिंदूर और बिंदी लगाएँ। कुछ घरों में तुलसी के गमले पर साड़ी की तरह कपड़ा लपेटते हैं और ऊपर छोटा घूँघट बनाते हैं। शालिग्राम को पंचामृत से स्नान कराकर पीले वस्त्र पर एक चौकी में रखें और चंदन-फूल से सजाएँ।
विवाह की विधि: कन्यादान से फेरे तक
- घर के बड़े दंपती तुलसी के माता-पिता बनते हैं और विवाह का संकल्प लेते हैं: "मैं इस तुलसी का कन्यादान भगवान श्री विष्णु को करता/करती हूँ।"
- सबसे पहले गणेश और कलश पूजा करें।
- दूल्हे की ओर से बारात का स्वागत: शालिग्राम को चौकी समेत मंडप के पास लाया जाता है, घर की महिलाएँ मंगल गीत गाती हैं।
- तुलसी और शालिग्राम दोनों को हल्दी लगाएँ (हल्दी की रस्म)।
- वरमाला: तुलसी की ओर से शालिग्राम को और शालिग्राम की ओर से तुलसी को माला पहनाएँ।
- कन्यादान: माता-पिता बने दंपती हाथ में जल, अक्षत, फूल और दक्षिणा लेकर तुलसी को भगवान विष्णु को सौंपते हैं।
- गठबंधन: तुलसी की चुनरी और शालिग्राम के पीले वस्त्र का एक छोर बाँधा जाता है।
- सात फेरे: घर का कोई पुरुष (अक्सर मामा या पिता की भूमिका वाला) शालिग्राम की चौकी हाथ में लेकर तुलसी के गमले की सात परिक्रमा करता है। हर फेरे पर फूल और अक्षत चढ़ाए जाते हैं और मंगलाष्टक या विवाह गीत गाए जाते हैं।
- सिंदूरदान: शालिग्राम से छुआकर तुलसी की माँग में सिंदूर भरा जाता है।
- भोग लगाकर तुलसी माता की आरती और विष्णु आरती की जाती है।
जिनके बेटी नहीं, उनके लिए मान्यता
लोक मान्यता है कि तुलसी का कन्यादान करने से कन्यादान का पुण्य मिलता है। इसीलिए जिन दंपतियों के बेटी नहीं है, वे अक्सर बड़े उत्साह से तुलसी विवाह का आयोजन करते हैं, रिश्तेदारों को बुलाते हैं और बाकायदा भोज रखते हैं। जिनकी बेटी की शादी में अड़चन आ रही हो, वे भी यह विवाह कराने का संकल्प लेते हैं। यह आस्था की बात है; इसे किसी डर या मजबूरी से नहीं, श्रद्धा से करें।
फ़्लैट या छोटी बालकनी में तुलसी विवाह
शहर के फ़्लैट में आँगन न हो तो बालकनी या पूजा घर के सामने ही यह विवाह हो सकता है। गमले को एक चौकी पर रखें, गन्ने के चार डंठल गमले से बाँधकर छोटा मंडप बना लें, या गन्ना न मिले तो केले के पत्तों और फूलों से मंडप सजा लें। फेरे के लिए जगह कम हो तो शालिग्राम को हाथ में लेकर गमले के चारों ओर सात बार घुमाना भी पूरी परिक्रमा मानी जाती है। सोसायटी में कई परिवार मिलकर एक सामूहिक तुलसी विवाह भी करते हैं, जिसमें हर घर कोई एक रस्म संभाल लेता है।
विदाई और प्रसाद
विवाह के बाद तुलसी की "विदाई" की रस्म होती है। कुछ घरों में तुलसी के गमले को मंडप से उठाकर घर के मंदिर या आँगन में नई जगह रखा जाता है, कहीं शालिग्राम को तुलसी के गमले के पास ही रख दिया जाता है। महिलाएँ विदाई के गीत गाती हैं।
- प्रसाद में फल, सिंघाड़ा, खीर या हलवा बाँटा जाता है।
- कन्यादान का सामान और सुहाग की पिटारी किसी सुहागिन या ब्राह्मण परिवार को दी जाती है।
- तुलसी पर चढ़ी चुनरी कुछ दिन रहने दें, फिर किसी सुहागिन को दे दें।
- गन्ने के डंठल बाद में प्रसाद के रूप में खाए जाते हैं।
तुलसी विवाह कार्तिक मास का शिखर है। महीने भर के स्नान, दीपदान और तुलसी पूजा के नियम कार्तिक मास के नियम में और उससे एक दिन पहले देव जगाने की विधि देवउठनी एकादशी पूजा विधि में पढ़ें।

