देवउठनी एकादशी, जिसे प्रबोधिनी एकादशी या देव उठनी ग्यारस भी कहते हैं, कार्तिक शुक्ल एकादशी को आती है। मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी) को भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में जाते हैं और चार महीने बाद इसी दिन जागते हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार के घरों में इस शाम आँगन में चौक पूरकर, थाली बजाकर और लोकगीत गाकर देव जगाए जाते हैं। 2026 में देवउठनी एकादशी 20 नवंबर को है; हर साल की तिथि और पारण का समय देवउठनी एकादशी पृष्ठ पर देखें।
चातुर्मास का अंत और शुभ कार्यों की शुरुआत
देवशयनी से देवउठनी तक के चार महीने चातुर्मास कहलाते हैं। इस समय विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और जनेऊ जैसे संस्कार टाले जाते हैं, साधु-संत एक जगह रुककर कथा-प्रवचन करते हैं और बहुत से घरों में खान-पान के नियम चलते हैं। देवउठनी पर यह अवधि पूरी होती है, इसलिए गाँव में इसे "देव दिवाली" या "छोटी दिवाली" जैसा उत्सव माना जाता है। इस दिन की कथा, जिसमें भगवान की निद्रा और जागरण का प्रसंग है, देवउठनी एकादशी व्रत कथा में पढ़ें।
पूजा सामग्री: गन्ना, सिंघाड़ा, बेर, शकरकंद
देवउठनी की पूजा में वे चीज़ें चढ़ती हैं जो इसी मौसम में खेत से नई आती हैं। यह असल में नई फ़सल का स्वागत भी है।
- गन्ना (ईख): 4 या 5 डंठल, मंडप बनाने के लिए। न मिले तो एक डंठल भी काफ़ी है।
- सिंघाड़ा, बेर, शकरकंद, मूली, नई गाजर, आँवला, अमरूद।
- गेरू और खड़िया (या चावल का घोल) चौक और चरण बनाने के लिए।
- पीतल की थाली या सूप और बजाने के लिए चम्मच या बेलन।
- भगवान विष्णु या शालिग्राम, तुलसी का गमला।
- घी के दीये (11 या 21), रुई की बाती, धूप।
- रोली, चावल, हल्दी, फूल, तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़कर रखें), पीला वस्त्र।
- भोग के लिए गुड़, मखाना, मेवा, फल; जहाँ एकादशी का व्रत हो वहाँ फलाहारी भोग।
आँगन में चौक और भगवान के चरण
शाम होने से पहले आँगन या पूजा की जगह को लीपकर (या धोकर) सुखा लें। फिर गेरू से ज़मीन रंगकर ऊपर खड़िया या चावल के घोल से चौक बनाएँ। चौक के बीच से घर के अंदर की ओर जाते हुए भगवान के छोटे-छोटे चरण बनाए जाते हैं, मानो भगवान जागकर घर में आ रहे हों। कई घरों में चौक के साथ सूरज, चाँद, गाय और घर के सदस्यों के प्रतीक भी बनाए जाते हैं।
चौक पर एक डलिया या परात उल्टी करके रखी जाती है और उसके नीचे सिंघाड़ा, बेर, शकरकंद, गुड़ और कुछ पैसे रखे जाते हैं। कहीं-कहीं गन्ने के चार डंठल खड़े करके छोटा मंडप बनाते हैं और उसी के नीचे भगवान को बिठाते हैं।
देव जगाने की विधि और लोकगीत
- सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें और दिन में भगवान विष्णु की सामान्य पूजा करें।
- शाम को सूर्यास्त के बाद चौक के पास दीये जलाएँ और घर के हर कोने, देहरी और तुलसी के पास भी दीया रखें।
- भगवान विष्णु या शालिग्राम को चौक पर बिठाकर पंचामृत और जल से स्नान कराएँ, पीला वस्त्र, चंदन, फूल और तुलसी दल चढ़ाएँ।
- घर की महिलाएँ थाली या सूप को बेलन या चम्मच से बजाते हुए डलिया के चारों ओर घूमती हैं और गाती हैं: "उठो देव, बैठो देव, अँगुरिया चटकाओ देव..." इस गीत के बोल हर इलाक़े में थोड़े अलग हैं, पर भाव एक है: भगवान से जागने और घर में सुख-समृद्धि लाने की विनती।
- पंडित जी या घर के बड़े यह श्लोक बोलते हैं: "उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते। त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्॥" अर्थ है: हे गोविन्द, उठिए, नींद छोड़िए; आप सोते हैं तो सारा संसार सोया रहता है।
- फिर डलिया उठाई जाती है, भगवान को भोग लगाकर आरती होती है और नीचे रखे फल प्रसाद के रूप में बाँटे जाते हैं।
- पूर्वांचल और राजस्थान में पुराने सूप को बजाते हुए घर के कोनों से बाहर ले जाकर "ईश्वर आए, दलिद्दर जाए" कहने की रीत भी है।
जहाँ उसी शाम तुलसी विवाह होता है, वहाँ गन्ने के मंडप को ही विवाह मंडप बना लिया जाता है। बहुत से घरों में तुलसी विवाह अगले दिन, द्वादशी को होता है।
व्रत के नियम और पारण
देवउठनी एकादशी का व्रत बाकी एकादशियों जैसा ही है। चावल, गेहूँ, दाल और प्याज़-लहसुन नहीं खाते; फल, दूध, कुट्टू, सिंघाड़े का आटा, साबूदाना और सेंधा नमक चल सकता है। पूरी सूची एकादशी में क्या खाएं, क्या नहीं में है।
- दशमी की शाम से हल्का और सात्विक भोजन करें।
- एकादशी की रात जागरण और भजन-कीर्तन की परंपरा है।
- इस दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें; पूजा के लिए एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें।
- पारण द्वादशी को सूर्योदय के बाद, पारण के तय समय के अंदर करें। द्वादशी का पहला चौथाई भाग (हरि वासर) बीत जाने के बाद ही व्रत खोलें।
अपने शहर का पारण समय एकादशी कैलेंडर में तिथि के साथ दिया रहता है।
इसी दिन से विवाह के मुहूर्त
चातुर्मास ख़त्म होते ही शादियों का मौसम शुरू होता है, इसलिए उत्तर भारत में देवउठनी को "अबूझ मुहूर्त" भी माना जाता है, यानी इस दिन बिना पंचांग देखे भी विवाह हो सकता है। फिर भी ज़्यादातर पंडित इस दिन के बाद के मुहूर्त गुरु और शुक्र के उदय, नक्षत्र और लग्न देखकर ही निकालते हैं। अगर उस साल शुक्र या गुरु अस्त हों, तो देवउठनी के बाद भी कुछ हफ़्ते मुहूर्त नहीं मिलते। मुहूर्त कैसे तय होता है, यह विवाह मुहूर्त कैसे निकाला जाता है में समझाया गया है।
घर में जो भी शुभ काम चार महीने से रुका था, जैसे नए घर में प्रवेश, नामकरण या सगाई, उसकी तैयारी भी देवउठनी के बाद ही शुरू होती है। इसलिए यह दिन सिर्फ़ एक व्रत नहीं, पूरे परिवार के अगले कुछ महीनों की योजना का भी दिन होता है।

