विवाह मुहूर्त कैसे निकाला जाता है

विवाह मुहूर्त शुभ महीने, तिथि, विवाह नक्षत्र (रोहिणी, हस्त, अनुराधा, रेवती आदि), फेरों के लग्न और वर-कन्या के त्रिबल को मिलाकर निकाला जाता है। चातुर्मास, खरमास, होलाष्टक और गुरु-शुक्र अस्त के समय विवाह नहीं होते।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 6 मिनट का पाठ
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विवाह मुहूर्त पंचांग के कई हिस्सों को एक साथ मिलाकर निकाला जाता है: शुभ महीना, शुभ तिथि, विवाह के लिए अच्छे नक्षत्र, उस दिन का लग्न और वर-कन्या दोनों की कुंडली में गुरु, सूर्य और चंद्रमा का बल। इनमें से एक भी बात कमज़ोर हो तो पंडित जी तारीख आगे-पीछे करते हैं। इसीलिए एक ही मौसम में किसी परिवार को पाँच तारीखें मिल जाती हैं और किसी को बस दो।

शादियों का मौसम: देवउठनी से खरमास तक

उत्तर भारत में शादियों की असली शुरुआत कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी से मानी जाती है। आषाढ़ की देवशयनी एकादशी से चार महीने भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, इस चातुर्मास में विवाह नहीं होते। देव जागते ही देवउठनी एकादशी की पूजा होती है, अगले दिन तुलसी विवाह होता है और फिर बैंड-बाजे का मौसम खुल जाता है।

यह पहला दौर अगहन (मार्गशीर्ष) तक चलता है और दिसंबर के बीच में सूर्य के धनु राशि में जाते ही रुक जाता है, क्योंकि तब खरमास लग जाता है। मकर संक्रांति के बाद माघ, फाल्गुन, वैशाख और ज्येष्ठ में दूसरा बड़ा दौर आता है। बीच में होलाष्टक और मीन का खरमास फिर रोक लगाते हैं। मोटे तौर पर साल को ऐसे समझिए:

  • सबसे ज़्यादा मुहूर्त: मार्गशीर्ष (अगहन), माघ, फाल्गुन, वैशाख, ज्येष्ठ।
  • कुछ मुहूर्त: कार्तिक में देवउठनी के बाद, आषाढ़ में देवशयनी से पहले।
  • आम तौर पर नहीं: चातुर्मास (सावन, भादों, आश्विन, कार्तिक का पहला भाग), पौष का खरमास, चैत्र का खरमास।

मुहूर्त में क्या देखा जाता है: तिथि, नक्षत्र, लग्न

तिथि

चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी को रिक्ता तिथि कहा जाता है, इन्हें विवाह में छोड़ा जाता है। अमावस्या भी नहीं ली जाती। द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी और त्रयोदशी अच्छी मानी जाती हैं, और शुक्ल पक्ष को कृष्ण पक्ष से बेहतर समझा जाता है। तिथि पंचांग में कैसे पढ़ी जाती है, यह पंचांग कैसे पढ़ें वाले लेख में आसान भाषा में समझाया गया है।

नक्षत्र और वार

विवाह के लिए कुछ खास नक्षत्र ही चुने जाते हैं, जिनकी सूची नीचे तालिका में है। वार में सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार को सबसे अच्छा माना जाता है। मंगलवार को ज़्यादातर पंडित टाल देते हैं, हालांकि अगर बाकी सब बहुत अच्छा हो तो कुछ परंपराएँ वार को उतना महत्व नहीं देतीं।

लग्न

फेरों का असली समय लग्न से तय होता है। लग्न हर दो घंटे के आसपास बदलता है, इसलिए एक ही दिन में सुबह का लग्न अच्छा और रात का लग्न खराब हो सकता है। पंडित जी देखते हैं कि उस लग्न से सातवाँ भाव साफ हो और शुभ ग्रह केंद्र में हों। उत्तर भारत में गोधूलि वेला (सूर्यास्त के आसपास का समय) को भी विवाह के लिए शुभ माना जाता है, इसीलिए कई गाँवों में बारात शाम ढलते ही पहुँचती है। दक्षिण बिहार और पूर्वांचल में देर रात के लग्न भी खूब होते हैं।

गुरु और शुक्र अस्त न हों

जब गुरु या शुक्र ग्रह सूर्य के बहुत पास आकर अस्त हो जाते हैं, तब कुछ हफ्तों तक विवाह मुहूर्त नहीं निकलते। कई बार लोग पूछते हैं कि "माघ में भी इस बार शादी क्यों नहीं" — जवाब अक्सर यही होता है कि उस साल शुक्र अस्त है।

विवाह के शुभ नक्षत्र

मुहूर्त चिंतामणि जैसे ग्रंथों और उत्तर भारत की आम परंपरा में ये ग्यारह नक्षत्र विवाह के लिए गिने जाते हैं। सभी नक्षत्रों के स्वामी और स्वभाव 27 नक्षत्रों की सूची में देख सकते हैं।

नक्षत्रराशिस्वभाव
रोहिणीवृषभस्थिर (ध्रुव)
मृगशिरावृषभ-मिथुनकोमल (मृदु)
मघासिंहउग्र, पर विवाह में स्वीकार
उत्तरा फाल्गुनीसिंह-कन्यास्थिर (ध्रुव)
हस्तकन्याक्षिप्र
स्वातीतुलाचर
अनुराधावृश्चिककोमल (मृदु)
मूलधनुतीक्ष्ण, पर विवाह में स्वीकार
उत्तराषाढ़ाधनु-मकरस्थिर (ध्रुव)
उत्तरा भाद्रपदमीनस्थिर (ध्रुव)
रेवतीमीनकोमल (मृदु)

पुष्य नक्षत्र खरीदारी के लिए सबसे अच्छा माना जाता है, फिर भी विवाह में इसे नहीं लिया जाता। यह बात कई लोगों को चौंकाती है, पर परंपरा यही है।

कब विवाह नहीं होते: चातुर्मास, खरमास, होलाष्टक

  • चातुर्मास: देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक।
  • खरमास: सूर्य जब धनु राशि में (लगभग मध्य दिसंबर से मकर संक्रांति तक) और मीन राशि में (लगभग मध्य मार्च से मध्य अप्रैल तक) रहता है।
  • होलाष्टक: फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से होलिका दहन तक के आठ दिन। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी में इसे खास तौर पर माना जाता है।
  • अधिक मास: जिस साल पुरुषोत्तम मास पड़ता है, उस महीने में विवाह नहीं होते।
  • पितृ पक्ष: श्राद्ध के पंद्रह दिनों में मांगलिक काम नहीं किए जाते।
  • गुरु-शुक्र अस्त और ग्रहण वाले दिन।

गुण मिलान संक्षेप में

मुहूर्त से पहले कुंडली मिलाई जाती है। उत्तर भारत में अष्टकूट मिलान चलता है जिसमें कुल 36 गुण होते हैं। आठ कूट हैं: वर्ण (1), वश्य (2), तारा (3), योनि (4), ग्रह मैत्री (5), गण (6), भकूट (7) और नाड़ी (8)। आम तौर पर 18 से कम गुण मिलने पर रिश्ता आगे नहीं बढ़ाया जाता, 18 से 24 को ठीक और उससे ऊपर को अच्छा माना जाता है।

पर सिर्फ अंक देखकर फैसला करना ठीक नहीं। नाड़ी दोष और भकूट दोष पर पंडित अलग से विचार करते हैं, और कई बार दोनों की राशि के स्वामी मित्र हों तो दोष का परिहार भी मान लिया जाता है। मांगलिक दोष भी अलग से देखा जाता है। इसलिए किसी ऐप का "32 गुण मिले" वाला नतीजा अंतिम बात नहीं है।

गुरु बल, सूर्य बल, चंद्र बल

तारीख तय करते समय कन्या के लिए गुरु का गोचर (गुरु बल), वर के लिए सूर्य का गोचर (सूर्य बल) और दोनों के लिए चंद्रमा का गोचर (चंद्र बल) देखा जाता है। इसी को त्रिबल शुद्धि कहते हैं। इसी वजह से कैलेंडर में छपी "विवाह की तारीखें" हर जोड़े के लिए बराबर लागू नहीं होतीं।

पंडित जी से क्या पूछें

जब आप तारीख निकलवाने जाएँ तो वर-कन्या दोनों की जन्म तिथि, जन्म का सही समय और जन्म स्थान साथ ले जाएँ। फिर ये बातें साफ पूछ लें:

  1. इस तारीख में कौन-सा नक्षत्र और कौन-सी तिथि है, और फेरों का लग्न कितने बजे से कितने बजे तक है?
  2. क्या दोनों के लिए त्रिबल शुद्धि ठीक है, या किसी के लिए उपाय करना होगा?
  3. अगर यह तारीख न मिले तो इसी महीने के अगले दो विकल्प कौन-से हैं?
  4. हल्दी, मेहंदी, तिलक और विदाई के लिए अलग मुहूर्त चाहिए या नहीं?
  5. वेन्यू दूसरे शहर में है तो क्या लग्न का समय उस शहर के सूर्योदय के हिसाब से बदलेगा?

आखिरी सवाल अक्सर भूल जाते हैं। मुहूर्त स्थान के सूर्योदय पर निर्भर करता है, इसलिए दिल्ली के लिए निकाला गया समय जयपुर या पटना में कुछ मिनट खिसक सकता है। रोज़ की तिथि और नक्षत्र आप आज के पंचांग में देख सकते हैं, पर विवाह का अंतिम मुहूर्त अपने कुल पुरोहित से ही पक्का करवाएँ। आगे की रस्मों का मतलब समझना हो तो सात फेरे और सात वचन वाला लेख पढ़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विवाह के लिए सबसे शुभ महीने कौन-से हैं?

उत्तर भारत में मार्गशीर्ष, माघ, फाल्गुन, वैशाख और ज्येष्ठ में सबसे ज़्यादा विवाह मुहूर्त निकलते हैं। कार्तिक में देवउठनी एकादशी के बाद भी कुछ मुहूर्त होते हैं।

खरमास में शादी क्यों नहीं होती?

खरमास में सूर्य धनु या मीन राशि में रहता है और इस समय को मांगलिक कामों के लिए कमज़ोर माना जाता है। इसलिए विवाह, गृह प्रवेश और मुंडन जैसे संस्कार टाल दिए जाते हैं।

विवाह के लिए कितने गुण मिलने चाहिए?

अष्टकूट मिलान में 36 में से कम से कम 18 गुण आम तौर पर ज़रूरी माने जाते हैं। फिर भी नाड़ी, भकूट और मांगलिक दोष पंडित अलग से देखते हैं।

क्या पुष्य नक्षत्र में विवाह कर सकते हैं?

परंपरा में पुष्य नक्षत्र को खरीदारी और नए काम के लिए अच्छा माना गया है, पर विवाह के लिए इसे नहीं लिया जाता।

गोधूलि वेला में विवाह का क्या मतलब है?

सूर्यास्त के आसपास जब गायें चरकर लौटती हैं, उस समय को गोधूलि कहते हैं। उत्तर भारत में इस वेला को विवाह के लिए शुभ माना जाता है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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