पंचांग कैसे पढ़ें: तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण

पंचांग के पाँच अंग हैं: तिथि (चंद्र-सूर्य की दूरी), वार (सूर्योदय से सूर्योदय), नक्षत्र (चंद्रमा की स्थिति), योग और करण। हर अंग के साथ लिखा समय बताता है कि वह कब तक है, और आम तौर पर सूर्योदय के समय की तिथि ही दिन की तिथि मानी जाती है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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पंचांग पढ़ने के लिए उसके पाँच अंग समझने होते हैं: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। हर अंग के साथ एक समय लिखा होता है, जिसका मतलब है "यह इतने बजे तक, उसके बाद अगला"। इन पाँचों के साथ सूर्योदय-सूर्यास्त, चंद्र राशि और राहुकाल जैसे मुहूर्त वाले हिस्से पढ़ लें, तो आप खुद तय कर सकते हैं कि आज कौन-सा व्रत है और कोई काम किस समय करना ठीक रहेगा।

पंचांग के पाँच अंग

"पंच" यानी पाँच और "अंग" यानी हिस्से। पुराने समय में गाँव के पुरोहित हाथ से लिखा पंचांग रखते थे और लोग उन्हीं से पूछते थे कि एकादशी कब है। आज वही हिसाब कंप्यूटर से होता है, पर पढ़ने का तरीका वही है।

अंगकिससे बनता हैकुल कितनेकिस काम आता है
तिथिचंद्रमा और सूर्य के बीच की दूरी30 (हर पक्ष में 15)व्रत-त्योहार, श्राद्ध
वारसूर्योदय से अगले सूर्योदय तक का दिन7वार व्रत, राहुकाल, चौघड़िया
नक्षत्रचंद्रमा आकाश के किस हिस्से में है27मुहूर्त, जन्म नक्षत्र, पंचक
योगसूर्य और चंद्रमा के अंशों का जोड़27दिन की शुभता
करणतिथि का आधा भाग11भद्रा, छोटे मुहूर्त

तिथि और पक्ष

अमावस्या पर चंद्रमा और सूर्य एक साथ होते हैं। उसके बाद चंद्रमा रोज़ सूर्य से आगे निकलता जाता है। जब यह दूरी 12 अंश बढ़ जाती है, एक तिथि पूरी होती है। प्रतिपदा से पूर्णिमा तक शुक्ल पक्ष (चाँद बढ़ता है) और प्रतिपदा से अमावस्या तक कृष्ण पक्ष (चाँद घटता है)। चंद्रमा की चाल एक जैसी नहीं रहती, इसलिए कोई तिथि लगभग 19 घंटे की होती है तो कोई 26 घंटे तक की।

पंचांग में आप पढ़ेंगे: "पंचमी — दोपहर 2:15 तक, फिर षष्ठी"। इसका मतलब सूर्योदय के समय पंचमी है और दोपहर बाद षष्ठी लग जाएगी। आम नियम है कि जो तिथि सूर्योदय के समय हो, यानी उदया तिथि, वही पूरे दिन की तिथि मानी जाती है। पर कुछ व्रत अलग समय पर देखे जाते हैं: करवा चौथ और सकट चौथ में चंद्रोदय के समय की चतुर्थी, जन्माष्टमी में आधी रात की अष्टमी, दिवाली में प्रदोष काल की अमावस्या। इसीलिए कभी-कभी त्योहार दो दिन लिखे मिलते हैं।

कभी कोई तिथि सूर्योदय को छूती ही नहीं (तिथि क्षय), और कभी एक तिथि दो सूर्योदय तक चलती है (तिथि वृद्धि)। इसका पूरा हिसाब तिथि क्षय और वृद्धि में है।

तिथियों के पाँच समूह

  • नंदा: प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी
  • भद्रा: द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी
  • जया: तृतीया, अष्टमी, त्रयोदशी
  • रिक्ता: चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी — शुभ कामों में टाली जाती हैं
  • पूर्णा: पंचमी, दशमी, पूर्णिमा/अमावस्या

वार और नक्षत्र

पंचांग का वार आधी रात से नहीं, सूर्योदय से बदलता है। अगर कोई बच्चा मंगलवार की सुबह तीन बजे पैदा हुआ, तो पंचांग के हिसाब से वह सोमवार की रात है, क्योंकि मंगलवार का सूर्योदय अभी हुआ ही नहीं। जन्मपत्री और व्रत दोनों में यही नियम चलता है।

नक्षत्र बताता है कि चंद्रमा इस समय आकाश के 27 हिस्सों में से किसमें है। पंचांग में "रोहिणी — रात 11:40 तक" का मतलब है कि उसके बाद मृगशिरा शुरू होगा। विवाह, गृह प्रवेश, खरीदारी के मुहूर्त ज़्यादातर नक्षत्र से ही तय होते हैं। सभी नक्षत्रों के स्वामी और स्वभाव 27 नक्षत्रों की सूची में देखें। जब चंद्रमा कुंभ और मीन राशि में होता है, तब पंचक रहता है।

योग और करण

योग सूर्य और चंद्रमा के अंशों को जोड़कर बनता है; यह जोड़ हर 13 अंश 20 कला पर अगला योग बनाता है। विष्कुंभ से वैधृति तक 27 योग हैं। इनमें विष्कुंभ, अतिगंड, शूल, गंड, व्याघात, वज्र, व्यतीपात, परिघ और वैधृति को शुभ कामों के लिए ठीक नहीं माना जाता; सिद्धि, शुभ, ब्रह्म, इंद्र जैसे योग अच्छे माने जाते हैं।

ध्यान रहे, "सर्वार्थ सिद्धि योग", "अमृत सिद्धि योग" या "रवि पुष्य योग" इन 27 योगों में नहीं आते। ये वार और नक्षत्र के खास मेल से बनते हैं और पंचांग में अलग से लिखे होते हैं।

करण तिथि का आधा हिस्सा है, यानी हर तिथि में दो करण। कुल 11 करण हैं: सात चर करण (बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि) जो बार-बार घूमते हैं, और चार स्थिर करण (शकुनि, चतुष्पद, नाग, किंस्तुघ्न) जो महीने में एक-एक बार अमावस्या के आसपास आते हैं। इनमें सबसे ज़रूरी है विष्टि करण, जिसे भद्रा कहते हैं। राखी बाँधने या होलिका दहन से पहले लोग सबसे पहले यही देखते हैं कि भद्रा कब तक है।

सूर्योदय, चंद्रोदय और मुहूर्त वाले हिस्से

पाँच अंगों के बाद पंचांग में कुछ और ज़रूरी जानकारी होती है:

  • सूर्योदय-सूर्यास्त: हर गणना की नींव। शहर बदलते ही ये बदल जाते हैं, इसलिए अपने शहर का पंचांग देखें।
  • चंद्रोदय-चंद्रास्त: करवा चौथ, संकष्टी जैसे व्रतों के लिए।
  • चंद्र राशि और सूर्य राशि: राशिफल और पंचक के लिए।
  • मास, पक्ष, संवत: जैसे "कार्तिक कृष्ण पक्ष, विक्रम संवत"।
  • शुभ समय: ब्रह्म मुहूर्त, अभिजित मुहूर्त, अमृत काल, चौघड़िया।
  • अशुभ समय: राहुकाल, यमगंड, गुलिक काल, दुर्मुहूर्त, वर्ज्य।

Bhaktise पर आज का पंचांग कैसे पढ़ें

हमारे आज के पंचांग में समय नई दिल्ली के सूर्योदय के अनुसार दिए जाते हैं और महीने उत्तर भारत की पूर्णिमांत परंपरा से लिखे जाते हैं। इसे पढ़ने का आसान क्रम यह है:

  1. सबसे पहले तारीख के साथ हिंदू मास, पक्ष और तिथि देखें। तिथि के आगे लिखा समय बताता है कि अगली तिथि कब लगेगी।
  2. फिर नक्षत्र और योग, उनके खत्म होने के समय के साथ।
  3. उसके बाद सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्रोदय।
  4. कोई काम शुरू करना हो तो राहुकाल और अभिजित मुहूर्त देखें; दिन के छोटे हिस्सों के लिए चौघड़िया।
  5. उस दिन का कोई व्रत या त्योहार हो तो वह अलग से लिखा मिलता है।

पूरे महीने के व्रत-त्योहार एक नज़र में देखने हों तो मासिक कैलेंडर खोलें, और किसी भी तारीख का पूरा ब्योरा दिन के पंचांग में मिलता है। एक बात याद रखें: पंचांग रोज़ की जानकारी देता है, पर विवाह या गृह प्रवेश जैसे बड़े मुहूर्त में वर-वधू या गृहस्वामी की कुंडली भी देखी जाती है, इसलिए वहाँ पुरोहित की सलाह ज़रूर लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पंचांग के पाँच अंग कौन-से हैं?

तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। इन्हीं पाँच से पंचांग का नाम बना है।

उदया तिथि क्या होती है?

जो तिथि सूर्योदय के समय चल रही हो, उसे उदया तिथि कहते हैं। ज़्यादातर व्रत-त्योहार इसी से तय होते हैं, पर करवा चौथ, जन्माष्टमी और दिवाली जैसे कुछ पर्व दूसरे समय की तिथि से देखे जाते हैं।

पंचांग में दिन कब बदलता है?

पंचांग में वार और दिन सूर्योदय से बदलते हैं, आधी रात से नहीं।

भद्रा पंचांग में कहाँ देखें?

भद्रा विष्टि करण का दूसरा नाम है। पंचांग में करण वाले हिस्से में विष्टि का समय देखें, या भद्रा का अलग से दिया समय।

क्या हर शहर का पंचांग अलग होता है?

हाँ, क्योंकि सूर्योदय-सूर्यास्त शहर के साथ बदलते हैं। तिथि-नक्षत्र का अंत समय वही रहता है, पर राहुकाल, मुहूर्त और कभी-कभी उदया तिथि बदल सकती है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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