तिथि क्या है; तिथि क्षय और वृद्धि कैसे होती है

तिथि चंद्रमा और सूर्य के बीच की दूरी से बनती है: चंद्रमा जितनी देर में सूर्य से 12 अंश आगे निकलता है, उतनी देर एक तिथि रहती है। तिथि की लंबाई घटती-बढ़ती है, इसलिए कभी कोई तिथि किसी सूर्योदय को छू ही नहीं पाती (क्षय) और कभी दो सूर्योदयों तक चलती है (वृद्धि)।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 7 मिनट का पाठ
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तिथि हिंदू पंचांग का सबसे बुनियादी हिस्सा है। आसमान में चंद्रमा, सूर्य के मुकाबले तेज़ चलता है, और जितने समय में वह सूर्य से 12 अंश (डिग्री) और आगे निकल जाता है, उतने समय को एक तिथि कहते हैं। इसीलिए तिथि घड़ी के दिन की तरह आधी रात को नहीं बदलती, बल्कि दिन या रात के किसी भी समय शुरू और खत्म हो सकती है।

घर में जब दादी पूछती हैं कि "आज कौन सी तिथि है", तो उसका जवाब इसी गणना से निकलता है। आज की तिथि, उसका समाप्ति समय और अगली तिथि आप आज का पंचांग पृष्ठ पर देख सकते हैं।

तिथि की गणना: सूर्य-चंद्र की दूरी

अमावस्या के समय सूर्य और चंद्रमा आकाश में लगभग एक ही जगह होते हैं, यानी दोनों के बीच की दूरी शून्य होती है। इसके बाद चंद्रमा आगे बढ़ने लगता है। जब यह दूरी 0 से 12 अंश के बीच रहती है, तब शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा होती है; 12 से 24 अंश तक द्वितीया; इसी तरह आगे। 180 अंश पर चंद्रमा सूर्य के ठीक सामने होता है और यहीं पूर्णिमा पूरी होती है। 180 से 360 अंश का सफ़र कृष्ण पक्ष है, जो अमावस्या पर खत्म होता है।

पूरा चक्कर 360 अंश का है, तो 360 ÷ 12 = 30 तिथियाँ बनती हैं। एक चांद्र मास करीब साढ़े उनतीस दिन का होता है, इसलिए औसतन एक तिथि लगभग 23-24 घंटे की बैठती है। पर चंद्रमा की चाल हर दिन एक-सी नहीं रहती; कभी वह तेज़ चलता है, कभी धीमा। इसी वजह से कोई तिथि करीब 20 घंटे में निपट जाती है और कोई 26 घंटे से भी ज़्यादा खिंच जाती है। तिथि क्षय और वृद्धि की पूरी कहानी इसी घटती-बढ़ती लंबाई से निकलती है।

एक बात और समझ लें: तिथि का शुरू या खत्म होना एक खगोलीय क्षण है, जो पूरी पृथ्वी पर एक साथ होता है। दिल्ली और मुंबई में घड़ी का समय वही रहेगा। फ़र्क़ सूर्योदय के समय से आता है, क्योंकि हर शहर में सूरज अलग समय पर उगता है।

30 तिथियाँ और नंदा-भद्रा-जया-रिक्ता-पूर्णा

हर पक्ष में 15 तिथियाँ होती हैं। शुक्ल पक्ष की 15वीं तिथि पूर्णिमा और कृष्ण पक्ष की 15वीं तिथि अमावस्या कहलाती है। ज्योतिष में इन तिथियों को पाँच समूहों में बाँटा गया है, जिनका उपयोग मुहूर्त देखने में होता है:

समूहतिथियाँपारंपरिक मान्यता
नंदाप्रतिपदा, षष्ठी, एकादशीआनंद देने वाली; उत्सव और नए काम के लिए अच्छी मानी जाती हैं
भद्राद्वितीया, सप्तमी, द्वादशीकल्याणकारी; स्थायी काम, यात्रा, गृह कार्य
जयातृतीया, अष्टमी, त्रयोदशीविजय देने वाली; मुकदमे, प्रतियोगिता, साहस के काम
रिक्ताचतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी"खाली"; शुभ आरंभ के लिए प्रायः टाली जाती हैं, पर व्रत-उपासना (जैसे चतुर्थी, शिवरात्रि) के लिए श्रेष्ठ
पूर्णापंचमी, दशमी, पूर्णिमा/अमावस्यापूर्ण करने वाली; अधिकांश कामों के लिए अच्छी, अमावस्या को छोड़कर

तिथियों के नाम क्रम से याद रखें: प्रतिपदा (परवा), द्वितीया (दूज), तृतीया (तीज), चतुर्थी (चौथ), पंचमी, षष्ठी (छठ), सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी (ग्यारस), द्वादशी (बारस), त्रयोदशी (तेरस), चतुर्दशी (चौदस) और फिर पूर्णिमा या अमावस्या। हमारे त्योहारों के नाम भी इन्हीं से बने हैं: करवा चौथ, अहोई आठें, धनतेरस, भाई दूज, छठ।

उदया तिथि का नियम

रोज़मर्रा के पंचांग में किसी दिन की तिथि वही मानी जाती है जो सूर्योदय के समय चल रही हो। इसे उदया तिथि कहते हैं। मान लीजिए सुबह 6:30 पर सूर्योदय है और उस समय सप्तमी चल रही है, जो दोपहर 2 बजे खत्म होकर अष्टमी लगा देती है। तब भी कैलेंडर में पूरा दिन "सप्तमी" ही लिखा जाएगा, भले ही दिन का बड़ा हिस्सा अष्टमी का हो।

ज़्यादातर व्रत, जैसे एकादशी, उदया तिथि के हिसाब से रखे जाते हैं। लेकिन हर त्योहार पर यही नियम नहीं चलता, यह आगे समझेंगे।

तिथि क्षय

जब कोई तिथि छोटी हो, यानी सूर्योदय के बाद शुरू हो और अगले सूर्योदय से पहले ही खत्म हो जाए, तो वह किसी भी सूर्योदय को "छू" नहीं पाती। ऐसी तिथि उदया तिथि के रूप में किसी दिन के नाम नहीं लिखी जाती। इसे तिथि क्षय कहते हैं।

उदाहरण: सोमवार सुबह सूर्योदय पर तृतीया है। तृतीया सुबह 8 बजे खत्म होती है और चतुर्थी लगती है। चतुर्थी मंगलवार सुबह 5 बजे, यानी सूर्योदय से पहले ही खत्म होकर पंचमी लगा देती है। अब सोमवार को उदया तिथि तृतीया थी और मंगलवार को पंचमी। चतुर्थी पूरी तरह मौजूद रही, पर कैलेंडर के किसी खाने में उसका नाम नहीं आया। यही क्षय तिथि है।

ध्यान दें, क्षय का मतलब यह नहीं कि तिथि "गायब" हो गई। उसका व्रत या पूजा उसी समय में होगी जब वह तिथि चल रही थी। इसीलिए पंचांग में अक्सर "तृतीया 08:02 तक, फिर चतुर्थी" जैसी पंक्ति दिखती है।

तिथि वृद्धि

इसका उल्टा भी होता है। जब कोई तिथि लंबी हो और एक सूर्योदय से पहले शुरू होकर अगले सूर्योदय के बाद तक चले, तो वह दो लगातार दिनों की उदया तिथि बन जाती है। इसे तिथि वृद्धि कहते हैं। ऐसे में कैलेंडर में एक ही तिथि दो दिन लिखी दिखती है, जैसे "दशमी" बुधवार को भी और गुरुवार को भी।

एक पक्ष में आमतौर पर 15 तिथियाँ होती हैं, पर क्षय और वृद्धि के कारण किसी पक्ष में 14 दिन और किसी में 16 दिन भी हो जाते हैं। पुराने लोग इसीलिए कहते थे कि "इस बार पखवाड़ा छोटा है"।

त्योहार दो दिन क्यों दिखते हैं

लोग सबसे ज़्यादा उलझन में तब आते हैं जब एक ही त्योहार अलग-अलग कैलेंडरों में अलग दिन दिखता है। इसके तीन मुख्य कारण हैं:

  1. त्योहार का अपना "कर्म काल" होता है। हर पर्व के लिए शास्त्र बताते हैं कि तिथि किस समय होनी चाहिए। जन्माष्टमी में आधी रात (निशीथ काल) की अष्टमी, दिवाली में प्रदोष काल की अमावस्या, करवा चौथ में चंद्रोदय के समय की चतुर्थी, महाशिवरात्रि में निशीथ की चतुर्दशी और राम नवमी में दोपहर (मध्याह्न) की नवमी देखी जाती है। अगर तिथि सुबह से शुरू होकर अगले दिन दोपहर तक जाए, तो दोनों दिनों में से सही दिन वही होगा जिसमें कर्म काल मिल रहा हो।
  2. शहर बदलने से सूर्योदय बदलता है। अगर कोई तिथि दिल्ली के सूर्योदय से कुछ मिनट पहले खत्म होती है पर पटना या गुवाहाटी में सूरज पहले उगता है, तो दोनों शहरों की उदया तिथि अलग हो सकती है। इसलिए अपने शहर का पंचांग देखना ज़रूरी है।
  3. संप्रदाय के नियम। एकादशी इसका सबसे आम उदाहरण है। स्मार्त परंपरा उदया तिथि को मानती है, जबकि वैष्णव परंपरा में अगर दशमी सूर्योदय से पहले के अरुणोदय काल को छू रही हो तो एकादशी अगले दिन रखी जाती है। इसीलिए कई बार कैलेंडर में "स्मार्त एकादशी" और "वैष्णव एकादशी" दो दिन लिखी आती है।

तो जब मोहल्ले में बहस हो कि त्योहार आज है या कल, तो अक्सर दोनों पक्ष किसी न किसी नियम से सही होते हैं। घर में अपने कुल पुरोहित या जिस पंचांग को परिवार पीढ़ियों से मानता आया है, उसी का पालन करना सबसे सरल रास्ता है।

पंचांग में तिथि कैसे पढ़ें

  • तिथि के साथ लिखा समय उसका समाप्ति समय होता है, शुरुआत का नहीं।
  • "क्षय" या "वृद्धि" शब्द कई छपे पंचांगों में तिथि के आगे अलग से लिखा मिलता है।
  • महीने का नाम और पक्ष भी साथ देखें, क्योंकि उत्तर भारत में पूर्णिमांत महीने चलते हैं। इसका अंतर पूर्णिमांत और अमांत मास वाले लेख में विस्तार से समझाया गया है, और महीनों की पूरी सूची हिंदू महीनों के नाम में है।
  • पूरे साल की किसी खास तिथि (जैसे हर अष्टमी या हर त्रयोदशी) की तारीखें तिथि के अनुसार तारीखें पृष्ठ पर एक साथ मिल जाती हैं।

तिथि के बाद पंचांग के बाकी चार अंग, यानी वार, नक्षत्र, योग और करण, कैसे पढ़ें, यह पंचांग कैसे पढ़ें में आसान भाषा में दिया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एक तिथि कितने घंटे की होती है?

औसतन लगभग 23-24 घंटे, पर चंद्रमा की चाल बदलने से कोई तिथि करीब 20 घंटे की और कोई 26 घंटे से अधिक की भी हो सकती है।

उदया तिथि क्या होती है?

सूर्योदय के समय जो तिथि चल रही हो, वही उस पूरे दिन की तिथि मानी जाती है। इसे उदया तिथि कहते हैं और अधिकतर व्रत इसी से तय होते हैं।

तिथि क्षय होने पर उस तिथि का व्रत कब रखें?

क्षय तिथि भी कुछ घंटों तक मौजूद रहती है। उसका व्रत या पूजा उसी दिन होती है जिसमें वह तिथि चल रही हो और जिसमें उस पर्व का कर्म काल मिले; पंचांग में यह स्पष्ट लिखा रहता है।

एक ही तिथि दो दिन क्यों लिखी होती है?

जब तिथि इतनी लंबी हो कि दो लगातार सूर्योदयों को छू ले, तो दोनों दिन उसकी उदया तिथि बनती है। इसे तिथि वृद्धि कहते हैं।

अलग शहरों में तिथि अलग क्यों दिखती है?

तिथि बदलने का क्षण सब जगह एक है, पर सूर्योदय का समय हर शहर में अलग होता है। इसलिए उदया तिथि और कभी-कभी त्योहार का दिन भी बदल सकता है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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