पूर्णिमांत और अमांत महीनों में अंतर

पूर्णिमांत पद्धति में हिंदू महीना पूर्णिमा पर खत्म होता है और अमांत में अमावस्या पर। इसलिए शुक्ल पक्ष का नाम दोनों में एक होता है, पर कृष्ण पक्ष उत्तर भारत में एक महीना आगे गिना जाता है; त्योहार का दिन वही रहता है, केवल महीने का नाम बदलता है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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हिंदू चांद्र महीने को गिनने की दो पद्धतियाँ हैं। पूर्णिमांत में महीना पूर्णिमा के दिन खत्म होता है, और अमांत में अमावस्या के दिन। उत्तर भारत पूर्णिमांत मानता है, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण के कई राज्य अमांत। इस कारण एक ही दिन किसी पंचांग में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी लिखा होता है और दूसरे में श्रावण कृष्ण अष्टमी, जबकि त्योहार और तिथि बिल्कुल वही होते हैं।

दो पद्धतियाँ

हर चांद्र महीने में दो पक्ष होते हैं: कृष्ण पक्ष (पूर्णिमा के बाद से अमावस्या तक, चाँद घटता है) और शुक्ल पक्ष (अमावस्या के बाद से पूर्णिमा तक, चाँद बढ़ता है)। तिथि क्या होती है और कैसे घटती-बढ़ती है, यह तिथि क्या है लेख में समझें।

  • पूर्णिमांत (पूर्णिमा पर अंत): महीना कृष्ण प्रतिपदा से शुरू होता है, पहले कृष्ण पक्ष आता है, फिर शुक्ल पक्ष, और पूर्णिमा पर महीना पूरा होता है।
  • अमांत (अमावस्या पर अंत): महीना शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है, पहले शुक्ल पक्ष, फिर कृष्ण पक्ष, और अमावस्या पर महीना पूरा होता है। इसे मुख्यमान भी कहते हैं।

एक उदाहरण से देखें। होली की पूर्णिमा के अगले दिन से उत्तर भारत में चैत्र महीना शुरू हो जाता है, क्योंकि फाल्गुन पूर्णिमा पर पूरा हो गया। पर अमांत पंचांग में वह पखवाड़ा अभी फाल्गुन का ही कृष्ण पक्ष है; वहाँ चैत्र अमावस्या के बाद, यानी गुड़ी पड़वा से शुरू होगा।

कौन-सी पद्धति कहाँ चलती है

पद्धतिमुख्य क्षेत्र
पूर्णिमांतउत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल, उत्तराखंड, जम्मू; नेपाल में भी
अमांतमहाराष्ट्र, गुजरात, गोवा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना
सौर महीने (रोज़मर्रा के लिए)तमिलनाडु, केरल, बंगाल, ओडिशा, असम; यहाँ त्योहारों के लिए चांद्र तिथि भी देखी जाती है

दोनों पद्धतियाँ शास्त्रसम्मत हैं। ज्योतिष ग्रंथों में अमांत को गणना के लिए अधिक प्रयोग किया गया, जबकि उत्तर भारत में लोक परंपरा और व्रत-त्योहारों में पूर्णिमांत गहराई से जमा हुआ है। एक मज़ेदार बात: विक्रम संवत का नया वर्ष उत्तर भारत में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है, जबकि गुजरात में वही संवत दिवाली के अगले दिन, कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से बदलता है। संवत के बारे में अधिक हिंदू महीनों के नाम लेख में भी मिलेगा।

एक ही त्योहार, अलग महीने का नाम

अंतर केवल कृष्ण पक्ष में आता है। नीचे के त्योहार दोनों जगह एक ही दिन होते हैं, बस महीना अलग लिखा मिलता है:

त्योहारपूर्णिमांत (उत्तर भारत)अमांत
कृष्ण जन्माष्टमीभाद्रपद कृष्ण अष्टमीश्रावण कृष्ण अष्टमी
करवा चौथकार्तिक कृष्ण चतुर्थीआश्विन कृष्ण चतुर्थी
अहोई अष्टमीकार्तिक कृष्ण अष्टमीआश्विन कृष्ण अष्टमी
धनतेरसकार्तिक कृष्ण त्रयोदशीआश्विन कृष्ण त्रयोदशी
दिवालीकार्तिक अमावस्याआश्विन अमावस्या
महाशिवरात्रिफाल्गुन कृष्ण चतुर्दशीमाघ कृष्ण चतुर्दशी
पितृ पक्षआश्विन कृष्ण पक्षभाद्रपद कृष्ण पक्ष
मौनी अमावस्यामाघ अमावस्यापौष अमावस्या
शीतला अष्टमीचैत्र कृष्ण अष्टमीफाल्गुन कृष्ण अष्टमी

एक अपवाद ध्यान रखने लायक है: वट सावित्री। उत्तर भारत में यह ज्येष्ठ अमावस्या (अमांत में वैशाख अमावस्या) को होता है, पर महाराष्ट्र-गुजरात में स्त्रियाँ यही व्रत ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा के नाम से रखती हैं। यहाँ दिन ही अलग है, केवल नाम नहीं। विस्तार से वट सावित्री पूजा विधि में पढ़ें।

शुक्ल पक्ष दोनों में समान

शुक्ल पक्ष में दोनों पद्धतियों का महीना एक ही होता है, इसलिए शुक्ल पक्ष के त्योहारों में कोई भ्रम नहीं होता:

  • राम नवमी: चैत्र शुक्ल नवमी, दोनों में
  • अक्षय तृतीया: वैशाख शुक्ल तृतीया, दोनों में
  • गणेश चतुर्थी: भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी, दोनों में
  • शारदीय नवरात्रि और दशहरा: आश्विन शुक्ल पक्ष, दोनों में
  • देवउठनी एकादशी: कार्तिक शुक्ल एकादशी, दोनों में

पूर्णिमा भी दोनों में एक ही महीने की होती है, क्योंकि पूर्णिमा शुक्ल पक्ष का आख़िरी दिन है। इसलिए गुरु पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा सब जगह एक ही नाम से जानी जाती हैं। एकादशी के नाम भी तय हैं, केवल कृष्ण पक्ष की एकादशी का महीना अलग लिखा जाता है।

अधिक मास में क्या होता है

जब कोई चांद्र महीना अधिक (पुरुषोत्तम) मास बनता है, तो गणना अमांत आधार पर ही होती है: एक पूरे अमावस्या से अमावस्या के महीने को अधिक माना जाता है। पूर्णिमांत में इसे लिखते समय वह अधिक महीना निज महीने के कृष्ण और शुक्ल पक्ष के बीच में आ जाता है, इसलिए उत्तर भारत के पंचांग में कुछ दिन बड़ा उलझा हुआ दिखता है।

रोज़मर्रा में भ्रम से कैसे बचें

  • किसी व्रत की तिथि बतानी हो तो केवल महीना न कहें, पक्ष और तिथि भी बताएँ, जैसे कार्तिक कृष्ण चतुर्थी।
  • मायका और ससुराल अलग पद्धति वाले राज्यों में हों तो व्रत का दिन तिथि से मिलाएँ, महीने के नाम से नहीं।
  • मोबाइल ऐप या छपा हुआ कैलेंडर किस पद्धति पर है, यह उसकी सेटिंग या पहले पन्ने पर ज़रूर देखें।
  • श्राद्ध की तिथि निकालते समय भी यही ध्यान रखें; पितृ पक्ष का दिन दोनों में एक ही रहता है, बस महीना अलग लिखा मिलता है।

Bhaktise किस गणना पर चलता है

Bhaktise उत्तर भारत के परिवारों के लिए बना है, इसलिए यहाँ हर तिथि, व्रत और त्योहार:

  1. पूर्णिमांत महीनों के नाम से लिखा जाता है,
  2. विक्रम संवत के अनुसार वर्ष दिखाया जाता है,
  3. और समय नई दिल्ली के सूर्योदय-सूर्यास्त के आधार पर दिया जाता है।

अगर आपके पास किसी दक्षिण या पश्चिम भारत के पंचांग का कैलेंडर है और उसमें महीने का नाम अलग दिख रहा है, तो घबराएँ नहीं; तिथि और पक्ष मिलाएँ, दिन वही निकलेगा। आज की तिथि और पक्ष आज के पंचांग में, और पूरे महीने के व्रत-त्योहार मासिक कैलेंडर में देखें। पंचांग के बाकी अंग, जैसे नक्षत्र, योग और करण, समझने के लिए पंचांग कैसे पढ़ें लेख उपयोगी रहेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पूर्णिमांत और अमांत में क्या अंतर है?

पूर्णिमांत में हिंदू महीना पूर्णिमा पर खत्म होता है और अमांत में अमावस्या पर। इससे कृष्ण पक्ष का महीना दोनों में अलग नाम से लिखा जाता है।

उत्तर भारत में कौन-सा पंचांग चलता है?

उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और उत्तराखंड में पूर्णिमांत पंचांग चलता है।

जन्माष्टमी भाद्रपद में है या श्रावण में?

दिन एक ही है। पूर्णिमांत में इसे भाद्रपद कृष्ण अष्टमी और अमांत में श्रावण कृष्ण अष्टमी लिखा जाता है।

क्या दोनों पद्धतियों में त्योहार अलग दिन होते हैं?

आमतौर पर नहीं, केवल महीने का नाम बदलता है। वट सावित्री जैसे कुछ व्रत अपवाद हैं, जिन्हें अलग क्षेत्रों में अलग तिथि पर मनाते हैं।

Bhaktise कौन-सी गणना इस्तेमाल करता है?

Bhaktise पूर्णिमांत महीने, विक्रम संवत और नई दिल्ली का समय इस्तेमाल करता है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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