वट सावित्री व्रत में सुहागिन स्त्रियाँ बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं, उसके तने पर कच्चा सूत लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। उत्तर भारत में यह व्रत ज्येष्ठ महीने की अमावस्या को होता है। पूजा सुबह से दोपहर तक कभी भी की जा सकती है, पर ज़्यादातर घरों में स्त्रियाँ नहा-धोकर, सोलह श्रृंगार करके दिन चढ़ने से पहले बरगद के नीचे पहुँच जाती हैं।
नीचे पूरी सामग्री, क्रम से पूजा विधि, परिक्रमा का तरीका, बायना और व्रत खोलने का तरीका दिया गया है, ताकि पहली बार व्रत रखने वाली बहू भी बिना उलझन के पूजा कर सके।
अमावस्या या पूर्णिमा: उत्तर और दक्षिण का अंतर
यह व्रत दो अलग तिथियों पर मनाया जाता है, और यही सबसे ज़्यादा भ्रम पैदा करता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और उत्तराखंड में ज्येष्ठ अमावस्या को वट सावित्री होता है। बिहार और मिथिला में इसी दिन को बरसाइत कहते हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा और कर्नाटक के कई हिस्सों में यही व्रत लगभग पंद्रह दिन बाद ज्येष्ठ पूर्णिमा को रखा जाता है, जिसे वट पूर्णिमा कहते हैं।
एक और बात ध्यान रखें। उत्तर भारत पूर्णिमांत महीने मानता है, इसलिए जिसे हम ज्येष्ठ अमावस्या कहते हैं, वही अमांत पंचांग में वैशाख अमावस्या लिखी होती है। दिन एक ही है, बस नाम अलग है। यह अंतर विस्तार से पूर्णिमांत और अमांत महीनों का अंतर लेख में समझाया गया है। वर्ष 2026 में वट सावित्री व्रत 16 मई को और वट पूर्णिमा 29 जून को है; वर्ष 2027 में वट सावित्री 4 जून और वट पूर्णिमा 18 जून को पड़ेगी। अमावस्या कब शुरू और कब खत्म हो रही है, यह वट सावित्री व्रत पृष्ठ और आज के पंचांग में देख लें।
वट सावित्री पूजा सामग्री
सामग्री एक दिन पहले जुटा लें और एक टोकरी या बड़ी थाली में सजा लें। बिहार-पूर्वांचल में इसके लिए बाँस की डलिया का चलन है।
- कच्चा सूत (सफ़ेद या पीला), कलावा या मौली
- सावित्री-सत्यवान और यमराज की छोटी मूर्ति या चित्र (न हो तो मिट्टी की तीन छोटी पिंडियाँ)
- जल से भरा लोटा, गंगाजल की कुछ बूँदें
- रोली, हल्दी, सिंदूर, अक्षत (साबुत चावल), चंदन
- फूल, फूलमाला, दूब
- भीगे हुए काले चने (रात में भिगो दें) और गुड़
- मौसमी फल: आम, खरबूज़ा, लीची, केला
- पूड़ी, गुलगुले या पुए; कई घरों में बरगद को आटे के बने छोटे पकवान चढ़ते हैं
- बाँस का हाथ-पंखा (बिहार और यूपी में यमराज और सत्यवान को पंखा झलने की रस्म होती है)
- सुहाग का सामान: चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, आलता, काजल
- धूप, घी का दीपक, माचिस, कपूर
- दक्षिणा के सिक्के और बायने के लिए एक कपड़ा या साड़ी
कुछ न मिले तो: मूर्ति न हो तो सुपारी पर कलावा लपेटकर सावित्री मान लें। कच्चा सूत न मिले तो कलावा चलेगा। पास में बरगद न हो तो बरगद की एक टहनी गमले में या घर के आँगन में रखकर पूजा करना बहुत पुराना चलन है। फल जो मौसम में मिलें वही काफ़ी हैं, गिनती पूरी करने की चिंता न करें।
वट सावित्री पूजा विधि
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, साफ़ या नए कपड़े पहनें और पूरा श्रृंगार करें। ज़्यादातर स्त्रियाँ लाल, पीली या हरी साड़ी पहनती हैं। श्रृंगार की पूरी सूची सोलह श्रृंगार लेख में है।
- घर के मंदिर में दीपक जलाकर हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प करें: अपना नाम, गोत्र और यह कि पति की लंबी आयु और घर की सुख-शांति के लिए वट सावित्री व्रत रख रही हैं।
- सामग्री लेकर बरगद के पास जाएँ। पेड़ की जड़ में जल चढ़ाएँ, फिर रोली, हल्दी, अक्षत और फूल चढ़ाएँ।
- पेड़ के नीचे सावित्री-सत्यवान की मूर्ति या पिंडियाँ रखें। उन्हें तिलक लगाएँ, सिंदूर और सुहाग का सामान चढ़ाएँ।
- भीगे चने, गुड़, फल और पूड़ी का भोग लगाएँ। धूप-दीप दिखाएँ।
- बाँस के पंखे से बरगद, सत्यवान और यमराज को हवा करें। यह उस प्रसंग की याद है जब सावित्री ने पेड़ के नीचे पति का सिर अपनी गोद में रखा था।
- अब कच्चे सूत से परिक्रमा करें (तरीका नीचे है)।
- परिक्रमा के बाद पेड़ के नीचे बैठकर कथा सुनें या पढ़ें। कथा पूरी होने तक हाथ में थोड़े अक्षत और चने रखने का चलन है, जो बाद में पेड़ पर चढ़ा दिए जाते हैं।
- कपूर से आरती करें, पेड़ को प्रणाम करें और बड़ी स्त्रियों के पैर छूकर आशीर्वाद लें।
कथा का सार इतना है कि राजकुमारी सावित्री ने अल्पायु सत्यवान से विवाह किया, और जब यमराज उसके प्राण ले जाने लगे तो सावित्री अपनी बुद्धि और निष्ठा से यमराज से वर माँगते-माँगते पति के प्राण लौटा लाईं। पूरी कथा वट सावित्री व्रत कथा पृष्ठ पर पढ़ें।
कच्चे सूत से परिक्रमा कैसे करें
सूत का एक सिरा पेड़ के तने पर बाँध दें या किसी को पकड़ा दें, फिर पेड़ के चारों ओर घड़ी की दिशा में घूमते हुए सूत तने पर लपेटती जाएँ। हर फेरे में मन में पति की मंगलकामना करें। फेरों की संख्या घर की परंपरा पर है:
- सात फेरे सबसे आम हैं, जो विवाह के सात फेरों की याद दिलाते हैं।
- कई परिवारों में 11, 21 या 108 फेरे भी होते हैं।
- कुछ स्त्रियाँ हर फेरे पर एक चना, बताशा या सिक्का पेड़ की जड़ में रखती जाती हैं ताकि गिनती न भूलें।
भीड़ हो तो धक्का-मुक्की से बचें और आराम से फेरे लें। बुज़ुर्ग या गर्भवती स्त्रियाँ बैठे-बैठे सूत चढ़ाकर भी परिक्रमा का भाव पूरा कर सकती हैं; ज़्यादातर पंडित इसे ठीक मानते हैं।
बायना और भीगे चने
पूजा के बाद एक थाली या डलिया में भीगे चने, फल, पूड़ी या पकवान, थोड़े पैसे और एक कपड़ा रखकर सास को देते हैं। इसे बायना कहते हैं। सास के पैर छूकर बायना देने के बाद ही बहू का व्रत पूरा माना जाता है। सास न हों तो जेठानी, ननद या घर की किसी बड़ी सुहागिन को बायना दें, या किसी ब्राह्मणी को दे दें।
भीगे चने इस व्रत की पहचान हैं। लोक मान्यता है कि यमराज ने सत्यवान के प्राण चने के रूप में लौटाए थे, इसलिए चने का भोग लगता है और उसी से व्रत खुलता है। यह कथा क्षेत्रीय है, पुराण में नहीं मिलती, पर उत्तर भारत के लगभग हर घर में निभाई जाती है।
व्रत कैसे खोलें
अधिकांश स्त्रियाँ दिनभर फलाहार या निर्जल रहती हैं और पूजा-बायने के बाद व्रत खोलती हैं। यूपी और बिहार में बरगद की एक कोंपल (नई पत्ती) और ग्यारह भीगे चने पानी के साथ निगलकर व्रत खोला जाता है। इसके बाद घर का बना सात्विक खाना, जैसे पूड़ी, आम का पना, चने की सब्ज़ी, खीर, खाया जाता है। कुछ परिवारों में व्रत अगले दिन सूर्योदय के बाद खोलते हैं; जो आपके घर में चलता हो वही करें।
तबीयत ठीक न हो, गर्भावस्था हो या दवा चल रही हो तो निर्जल रहने की ज़िद न करें। फल और पानी लेकर भी पूजा उतनी ही सच्ची रहती है।
नई बहुओं के लिए छोटी बातें
- पहले साल का वट सावित्री कई घरों में मायके से आए सामान से होता है, इसे पहले से पूछ लें।
- पेड़ की टहनियाँ न तोड़ें; कोंपल ज़मीन पर गिरी हुई या पहले से तोड़ी हुई लें।
- पूजा का बचा सूत पेड़ पर ही रहने दें, उसे खोलकर वापस न लाएँ।
- प्रसाद के चने और फल पड़ोस की स्त्रियों में बाँटें; यह भी इस दिन का सुंदर हिस्सा है।

