2026

वट सावित्री व्रत 2026

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मुख्य विवरण

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वट सावित्री व्रत

वट सावित्री व्रत क्या है

वट सावित्री व्रत सुहागिन स्त्रियाँ पति की लंबी आयु और परिवार की खुशहाली के लिए रखती हैं। इस दिन बरगद (वट) के पेड़ की पूजा होती है और सावित्री की कथा सुनी जाती है, जिसने अपनी बुद्धि और निष्ठा से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस पाए थे। स्कन्द पुराण और भविष्योत्तर पुराण में इस व्रत का वर्णन मिलता है।

किस तिथि को

उत्तर भारत में यह व्रत ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को रखा जाता है (पूर्णिमांत गणना)। अमांत पंचांग में यही तिथि वैशाख अमावस्या कहलाती है। महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक में यही व्रत पंद्रह दिन बाद ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा के नाम से होता है। इसी अमावस्या को शनि जयंती भी पड़ती है।

पूजा कैसे करते हैं

  • सुबह स्नान करके सोलह श्रृंगार किया जाता है; लाल या पीली साड़ी पहनना प्रचलित है।
  • बाँस की टोकरी में सात तरह का अनाज, भीगे चने, फल, पूड़ी-पुए, और सावित्री-सत्यवान की मूर्ति या चित्र रखा जाता है।
  • बरगद की जड़ में जल, रोली, अक्षत, फूल और भीगे चने चढ़ाकर कच्चा सूत या कलावा लपेटते हुए परिक्रमा की जाती है, आमतौर पर सात बार।
  • पेड़ के नीचे बैठकर कथा सुनी जाती है और बाँस के पंखे से बरगद और सावित्री को हवा की जाती है, जैसे सावित्री ने सत्यवान को की थी।
  • पूजा के बाद सास या घर की बड़ी महिला को भीगे चने, वस्त्र और कुछ दक्षिणा देकर आशीर्वाद लिया जाता है।

पूरी सामग्री सूची और क्रम वट सावित्री पूजा विधि और सामग्री में है, और कथा वट सावित्री व्रत कथा में।

क्षेत्रीय परंपराएँ

बिहार और पूर्वांचल में इसे बरसाइत कहा जाता है और नई दुल्हन की पहली बरसाइत बड़े उत्साह से मनती है। कई घरों में व्रत भीगे चने और पानी से खोला जाता है; कुछ महिलाएँ बरगद की कोंपल निगलकर व्रत पूरा करती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वट सावित्री व्रत कब रखा जाता है?
उत्तर भारत में ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को, जबकि महाराष्ट्र और गुजरात में ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा के रूप में।
बरगद के पेड़ की पूजा क्यों होती है?
मान्यता है कि सावित्री ने बरगद के नीचे ही सत्यवान का सिर गोद में रखकर यमराज से उनके प्राण वापस पाए थे, और वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है।
वट सावित्री व्रत कैसे खोलें?
पूजा और कथा के बाद बरगद पर चढ़ाए भीगे चने और जल ग्रहण करके व्रत खोला जाता है। कई घरों में उसके बाद सात्विक भोजन किया जाता है।
क्या बरगद न मिले तो पूजा हो सकती है?
हाँ, बरगद की टहनी घर लाकर गमले में लगाकर या उसके चित्र के सामने उसी विधि से पूजा की जा सकती है।
क्या कुंवारी लड़कियाँ यह व्रत रख सकती हैं?
परंपरा से यह सुहागिनों का व्रत है, पर कुछ परिवारों में अच्छे वर की कामना से कुंवारी लड़कियाँ भी पूजा में शामिल होती हैं।

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