शनि जयंती
शनि जयंती सूर्य पुत्र शनि देव के जन्म का दिन है। उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार यह ज्येष्ठ अमावस्या को मनाई जाती है; अमांत पंचांग में यही दिन वैशाख अमावस्या कहलाता है। इस दिन शनि मंदिरों में सरसों का तेल चढ़ाने, दान करने और शनि चालीसा पढ़ने का विशेष महत्व है।
शनि देव कौन हैं
पुराणों के अनुसार शनि देव सूर्य देव और छाया के पुत्र हैं, और यमराज व यमुना उनके भाई-बहन माने जाते हैं। उन्हें न्याय और कर्मफल का देवता कहा जाता है, जो हर व्यक्ति को उसके कर्म के अनुसार फल देते हैं। उनका रंग श्याम, वाहन कौआ और प्रिय धातु लोहा मानी जाती है। ज्योतिष में साढ़ेसाती और ढैया की वजह से लोग शनि से डरते हैं, पर परंपरा यही सिखाती है कि शनि सच्चे और मेहनती लोगों को कभी दुख नहीं देते।
किस तिथि को
ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या (पूर्णिमांत), जिस दिन सूर्योदय पर अमावस्या हो। उत्तर भारत में इसी दिन सुहागिनें वट सावित्री व्रत भी रखती हैं, इसलिए सुबह बरगद की पूजा और शाम को शनि पूजा, दोनों एक ही दिन होते हैं।
कैसे मनाते हैं
- शनि मंदिर में सरसों का तेल, काले तिल, नीले फूल और उड़द चढ़ाना; कई लोग तेल में अपना चेहरा देखकर छाया दान करते हैं।
- पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना और परिक्रमा।
- शनि चालीसा और शनि देव की आरती; हनुमान जी की पूजा भी इस दिन शुभ मानी जाती है।
- काले कपड़े, कंबल, जूते-चप्पल, लोहे का बर्तन और अन्न का ज़रूरतमंदों को दान।
क्षेत्रीय परंपराएँ
मथुरा के पास कोसी कलाँ में कोकिलावन शनि धाम और महाराष्ट्र का शनि शिंगणापुर इस दिन भारी भीड़ वाले स्थान हैं। हर शनिवार के व्रत के लिए शनिवार व्रत कथा पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शनि जयंती कब होती है?
शनि जयंती पर क्या चढ़ाएँ?
शनि जयंती पर क्या दान करें?
शनि देव के माता-पिता कौन हैं?
क्या शनि जयंती और वट सावित्री एक ही दिन होते हैं?
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