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शनि अष्टोत्तर शतनामावळि

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  1. ॐ शनैश्चराय नमः
  2. ॐ शांताय नमः
  3. ॐ सर्वाभीष्टप्रदायिने नमः
  4. ॐ शरण्याय नमः
  5. ॐ वरेण्याय नमः
  6. ॐ सर्वेशाय नमः
  7. ॐ सौम्याय नमः
  8. ॐ सुरवंद्याय नमः
  9. ॐ सुरलोकविहारिणे नमः
  10. ॐ सुखासनोपविष्टाय नमः 
  11. ॐ सुंदराय  नमः
  12. ॐ घनरूपाय नमः
  13. ॐ घनाभरणधारिणे नमः
  14. ॐ घनसारविलेपनाय नमः
  15. ॐ खद्योताय नमः
  16. ॐ मंदाय नमः
  17. ॐ मंदचेष्टाय नमः
  18. ॐ वैराग्यदाय  नमः
  19. ॐ वीराय नमः
  20. ॐ वीतरोगभयाय नमः 
  21. ॐ विपत्परंपरेशाय नमः
  22. ॐ विश्ववंद्याय नमः
  23. ॐ गृध्रवाहाय नमः
  24. ॐ गूढाय नमः
  25. ॐ कूर्मांगाय नमः
  26. ॐ कुरूपिणे नमः
  27. ॐ कुत्सिताय नमः
  28. ॐ गुणाढ्याय नमः
  29. ॐ गोचराय नमः
  30. ॐ अविद्यामूलनाशाय नमः 
  31. ॐ विद्याविद्यास्वरूपिणे नमः
  32. ॐ आयुष्यकारणाय नमः
  33. ॐ आपदुद्धर्त्रे नमः
  34. ॐ विष्णुभक्ताय नमः
  35. ॐ वशिने नमः
  36. ॐ विविधागमवेदिने नमः
  37. ॐ विधिस्तुत्याय नमः
  38. ॐ महानीयगुणात्मने नमः
  39. ॐ मर्त्यपावनपादाय नमः
  40. ॐ महेशाय नमः 
  41. ॐ छायापुत्राय नमः
  42. ॐ शर्वाय नमः
  43. ॐ शरतूणीरधारिणे नमः
  44. ॐ चरस्थिरस्वभावाय नमः
  45. ॐ चंचलाय नमः
  46. ॐ नीलवर्णाय नमः
  47. ॐ नित्याय नमः
  48. ॐ नीलांजननिभाय नमः
  49. ॐ नीलांबरविभूषाय  नमः
  50. ॐ निश्चलाय नमः 
  51. ॐ वेद्याय नमः
  52. ॐ विधिरूपाय नमः
  53. ॐ विरोधाधारभूमये नमः
  54. ॐ वेदास्पदस्वभावाय नमः
  55. ॐ वज्रदेहाय नमः
  56. ॐ वंद्याय नमः
  57. ॐ विरूपाक्षाय नमः
  58. ॐ वरिष्ठाय नमः
  59. ॐ गरिष्ठाय नमः
  60. ॐ वज्रांकुशधराय नमः 
  61. ॐ वरदाय नमः
  62. ॐ अभयहस्ताय नमः
  63. ॐ वामनाय नमः
  64. ॐ ज्येष्ठपत्नी समेताय नमः
  65. ॐ श्रेष्ठाय नमः
  66. ॐ अमितभूषिणे नमः
  67. ॐ कष्टौघनाशकाय नमः
  68. ॐ आर्यपुष्टिदाय नमः
  69. ॐ स्तुत्याय नमः
  70. ॐ स्तोत्रगम्याय नमः 
  71. ॐ भक्तिवश्याय नमः
  72. ॐ भानवे नमः
  73. ॐ भानुपुत्राय नमः
  74. ॐ भव्याय नमः
  75. ॐ पावनाय नमः
  76. ॐ धनुर्मंडल संस्थाय नमः
  77. ॐ धनदाय नमः
  78. ॐ धनुष्मते नमः
  79. ॐ तनुप्रकाश देहाय नमः
  80. ॐ तामसाय नमः 
  81. ॐ अशेषजन वंद्याय नमः
  82. ॐ विशेषफलदायिने नमः
  83. ॐ वशीकृतजनेशाय नमः
  84. ॐ पसूनांपतये नमः
  85. ॐ खेचराय नमः
  86. ॐ खगेशाय नमः
  87. ॐ घननीलांबराय नमः
  88. ॐ काठिन्यमानसाय नमः
  89. ॐ आर्यगणस्तुत्याय नमः
  90. ॐ नीलच्छत्राय नमः 
  91. ॐ नित्याय नमः
  92. ॐ निर्गुणाय नमः
  93. ॐ गुणात्मने नमः
  94. ॐ निरामयाय नमः
  95. ॐ निंद्याय नमः
  96. ॐ वंदनीयाय नमः
  97. ॐ धीराय नमः
  98. ॐ दिव्यदेहाय नमः
  99. ॐ दीनार्ति हरणाय नमः
  100. ॐ दैन्यनाशकराय नमः 
  101. ॐ आर्यजनगण्याय नमः
  102. ॐ क्रूराय नमः
  103. ॐ क्रूर चेष्टाय नमः
  104. ॐ कामक्रोधकराय नमः
  105. ॐ कळत्रपुत्रशत्रुत्वकारणाय नमः
  106. ॐ परिपोषितभक्ताय नमः
  107. ॐ परभीतिहराय नमः
  108. ॐ भक्तसंघ मनोभीष्ट फलदाय नमः

|| इति श्री शनि अष्टोत्तर शतनामावळि संपूर्णं ||

अर्थ

श्री शनि अष्टोत्तर शतनामावली भगवान शनिदेव को समर्पित 108 पवित्र नामों का एक स्तोत्र है। यह भगवान शनि ग्रह के विभिन्न गुणों, महिमाओं और स्वरूपों का वर्णन करता है। ज्योतिष में शनिदेव को कर्मफलदाता और न्याय का देवता माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस अष्टोत्तर का भक्तिपूर्वक पाठ करने से शनि ग्रह के दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है और उनकी कृपा प्राप्त की जा सकती है। प्रत्येक नाम शनिदेव के एक अद्वितीय गुण को प्रकट करता है, जो भक्तों को गहरा आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है।

इस शतनामावली का प्रत्येक नाम शनिदेव की दिव्य शक्ति और उनकी भूमिका को उजागर करता है। उदाहरण के लिए, 'ॐ शनैश्चराय नमः' शनि ग्रह की धीमी गति को इंगित करता है, जबकि 'ॐ शांत्याय नमः' उनके शांत स्वरूप को दर्शाता है। 'ॐ सर्वाभीष्टप्रदायिने नमः' का अर्थ है सभी इच्छाओं को पूरा करने वाला, जो शनिदेव की करुणा को दर्शाता है। 'ॐ वैराग्यदाय नमः' नाम मोक्ष मार्ग की ओर ले जाने वाली वैराग्य भावना को प्रदान करने वाला बताता है। 'ॐ आयुष्यकारणाय नमः' जीवनकाल को निर्धारित करने वाली शक्ति को इंगित करता है, जबकि 'ॐ विधिस्तुत्याय नमः' का अर्थ है ब्रह्मा द्वारा भी पूजित। ये नाम स्पष्ट करते हैं कि शनिदेव केवल भयभीत करने वाले ग्रह नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के पाठ सिखाने वाले और आध्यात्मिक प्रगति के मार्गदर्शक देवता भी हैं।

शनि अष्टोत्तर शतनामावली का पाठ केवल शब्दों की पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि शनिदेव की दिव्य शक्ति से जुड़ने का एक माध्यम है। यह हमारे कर्मों को शुद्ध करने, अहंकार को कम करने और जीवन की वास्तविकताओं का सामना करने का साहस प्रदान करता है। कठिन समय में, विशेष रूप से शनि की दशा, अष्टम शनि, या साढ़े साती के दौरान इस नामावली का पाठ करना अत्यंत प्रभावी माना जाता है। यह मानसिक शांति लाता है, नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करता है और सकारात्मक परिवर्तनों का मार्ग प्रशस्त करता है।

यह स्तोत्र भक्तों में श्रद्धा और भक्ति बढ़ाता है। शनिदेव न्याय के देवता हैं, जो हमारे कर्मों के अनुसार फल देते हैं। इसलिए, इस नामावली का पाठ करते समय, हमें अपने कर्मों के प्रति जागरूक रहना चाहिए और सत्कर्म करने के लिए प्रेरित होना चाहिए। इस स्तोत्र का नियमित पाठ जीवन में संतुलन लाता है, बाधाओं को दूर करता है और अंततः आध्यात्मिक ज्ञानोदय में सहायता करता है। शनिदेव के आशीर्वाद से भक्त कठिनाइयों का साहसपूर्वक सामना करने और सफलता प्राप्त करने में सक्षम होते हैं।

लाभ (Benefits):

  • शनि दोष निवारण: शनि की दशा, साढ़े साती या अष्टम शनि के प्रभाव से होने वाली परेशानियों को कम करने में मदद करता है।
  • मानसिक शांति और साहस: जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए मानसिक स्थिरता और आंतरिक शांति प्रदान करता है।
  • स्वास्थ्य वृद्धि: पुरानी बीमारियों से मुक्ति पाने और अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहायता करता है।
  • धन और समृद्धि: कर्मफलों के अनुसार आर्थिक स्थिति में सुधार लाने और समृद्धि लाने के लिए शनिदेव का आशीर्वाद प्राप्त करने में सहायक है।
  • आध्यात्मिक प्रगति: वैराग्य, ज्ञान और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ाता है, जिससे जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने में मार्गदर्शन मिलता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री शनि अष्टोत्तर शतनामावली क्या है?
यह भगवान शनिदेव को समर्पित 108 पवित्र नामों का एक स्तोत्र है, जो शनि ग्रह के विभिन्न गुणों, महिमाओं और स्वरूपों का वर्णन करता है। इसका पाठ करने से शनिदेव का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
शनि अष्टोत्तर शतनामावली का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इसका पाठ शनिवार को, शनि की दशा के दौरान या शनि की साढ़े साती अवधि में करना उत्तम होता है। स्नान करके, शुद्ध मन से शनिदेव की मूर्ति या चित्र के सामने बैठकर भक्तिपूर्वक पाठ करना चाहिए।
इस नामावली का पाठ करने के प्रमुख लाभ क्या हैं?
शनि अष्टोत्तर के पाठ से शनि दोष दूर होते हैं, मानसिक शांति मिलती है, स्वास्थ्य में सुधार होता है, धन और समृद्धि प्राप्त होती है, तथा आध्यात्मिक प्रगति संभव होती है।
श्री शनि अष्टोत्तर शतनामावली का पाठ किसे करना चाहिए?
शनि दोष से पीड़ित व्यक्ति, जीवन में बाधाओं का सामना करने वाले, मानसिक शांति चाहने वाले और आध्यात्मिक रूप से आगे बढ़ने की इच्छा रखने वाले इस नामावली का पाठ कर सकते हैं।
शनि अष्टोत्तर शतनामावली का कितनी बार पाठ करना शुभ होता है?
आमतौर पर प्रतिदिन एक बार या शनिवार को 11, 21, या 108 बार पाठ करना शुभ माना जाता है। आप अपनी सुविधा के अनुसार नियमित रूप से पाठ कर सकते हैं।
शनि अष्टोत्तर शतनामावली का उद्गम क्या है?
यह पुराणों और ज्योतिष ग्रंथों में वर्णित शनिदेव को समर्पित एक प्राचीन स्तोत्र है। शनिदेव की महिमा का बखान करने वाली यह नामावली हिंदू धर्म का एक अभिन्न अंग है।

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