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सूर्य ग्रहस्य बीज मंत्र जपं

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सूर्य ग्रहस्य बीज मंत्र जपं

आचम्य | प्राणानायम्य | देशकालौ संकीर्त्य | गणपति स्मरणं कृत्वा |

पुनः संकल्पं –
अद्य पूर्वोक्त एवं गुणविशेषण विशिष्टायां शुभतिथौ मम सूर्य ग्रहपीडापरिहारार्थं सूर्य ग्रहदेवता प्रसाद द्वारा आयुरारोग्य ऐश्वर्यादि उत्तमफलावाप्त्यर्थं मम संकल्पित मनोवांछाफलसिद्ध्यर्थं यथा संख्याकं सूर्य ग्रहस्य बीजमंत्र जपं करिष्ये ||

– सूर्यः –

ध्यानं –
पद्मासनः पद्मकरो द्विबाहुः
पद्मद्युतिः सप्ततुरंगवाहः |
दिवाकरो लोकगुरुः किरीटी
मयि प्रसादं विदधातु देवः ||

जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिं |
तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरं ||

लमित्यादि पंचपूजा –
लं पृथिव्यात्मने गंधं परिकल्पयामि |
हं आकाशात्मने पुष्पं परिकल्पयामि |
यं वाय्वात्मने धूपं परिकल्पयामि |
रं अग्न्यात्मने दीपं परिकल्पयामि |
वं अमृतात्मने नैवेद्यं परिकल्पयामि |
सं सर्वात्मने सर्वोपचारान् परिकल्पयामि |

बीजमंत्रः –
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः | (7000)

समर्पणं –
गुह्याति गुह्य गोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपं |
सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादान्मयि स्थिर ||

अनेन मया कृत सूर्य ग्रहस्य मंत्रजपेन सूर्य ग्रहदेवता सुप्रीतो सुप्रसन्नो वरदो भवंतु |

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः |

अर्थ

“सूर्य ग्रहस्य बीज मंत्र जपं” भगवान सूर्य को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और पारंपरिक उपासना विधि है, जो समस्त सृष्टि को जीवन, प्रकाश, ऊर्जा और स्वास्थ्य प्रदान करते हैं। यह जप केवल मंत्रों का पाठ नहीं, बल्कि सूर्य देव की दिव्य शक्ति के साथ गहरा संबंध स्थापित करने की एक पूर्ण प्रक्रिया है। यह अनुष्ठान आचमन, प्राणायाम और देशकाल स्मरण के साथ शुरू होता है, जिसके बाद साधक एक स्पष्ट संकल्प के साथ जप प्रारंभ करता है। इस संकल्प का मुख्य उद्देश्य सूर्य ग्रह से उत्पन्न होने वाली पीड़ाओं और दोषों को दूर करना, उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, ऐश्वर्य, मानसिक शांति और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करना होता है।

इस उपासना के प्रमुख भागों में से एक ध्यान श्लोक भगवान सूर्य के भव्य स्वरूप का वर्णन करते हैं। 'पद्मासनः पद्मकरो द्विबाहुः' श्लोक में, सूर्य देव को पद्मासन में विराजमान, हाथों में कमल धारण किए हुए, सात घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले रथ पर सवार, लोकों के गुरु और मुकुटधारी देवता के रूप में दर्शाया गया है। 'जपाकुसुमसंकाशं' नामक एक अन्य प्रसिद्ध श्लोक सूर्य के चमकीले स्वरूप, लाल गुड़हल के फूल के समान उनकी आभा, पापों का नाश करने वाली और अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाली उनकी अपार शक्ति को व्यक्त करता है। यह ध्यान साधक के मन को सूर्य की तेजस्विता और सकारात्मक ऊर्जा के साथ जोड़ता है।

पंचपूजा अनुभाग में पृथ्वी, आकाश, वायु, अग्नि और जल तत्वों को प्रतीकात्मक रूप से गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। यह आंतरिक शुद्धि की प्रक्रिया साधक के शरीर और मन को जप के लिए तैयार करती है। 'ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः' नामक बीज मंत्र इस उपासना का मुख्य केंद्र बिंदु है। 'ह्रां, ह्रीं, ह्रौं' नामक बीज अक्षर सूर्य ग्रह के तत्व को शांत करते हैं और शरीर में प्राण शक्ति को मजबूत करते हैं। 'ह्रां' इच्छाशक्ति, 'ह्रीं' आंतरिक प्रकाश और 'ह्रौं' परिवर्तनकारी शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो सामूहिक रूप से अज्ञानता को दूर करते हैं और जीवन शक्ति को सुदृढ़ करते हैं।

इस बीज मंत्र को निर्धारित संख्या में (उदाहरण के लिए, 7000 बार) जपने से सूर्य ग्रह की शांति पूर्ण होती है और सूर्य देव प्रसन्न होते हैं, ऐसी अटूट मान्यता है। जप के बाद, भक्त अपने समस्त पापों और दोषों को सूर्य देव के चरणों में समर्पित करता है और उनकी दया तथा कृपा का आह्वान करता है। अंत में, शांति पाठ के साथ यह उपासना पूर्ण होती है, जो विश्व के लिए शांति की कामना करता है। यह जप न केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बल्कि मानसिक स्पष्टता, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक उत्थान के लिए भी अत्यंत सहायक है।

लाभ (Benefits):

  • सूर्य ग्रह पीड़ा और दोषों से मुक्ति: कुंडली में सूर्य ग्रह के अशुभ प्रभावों और दोषों को कम करता है, जिससे शुभ फल प्राप्त होते हैं।
  • नेत्र ज्योति, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्राप्ति: बेहतर शारीरिक स्वास्थ्य, आँखों की समस्याओं से मुक्ति और लंबी आयु प्रदान करता है।
  • नेतृत्व क्षमता, आत्मविश्वास और निर्णय शक्ति में वृद्धि: व्यक्ति में नेतृत्व के गुण, आत्मविश्वास, साहस और सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
  • नौकरी, पद, सम्मान और धन-धान्य की प्राप्ति: करियर में सफलता, उच्च पद, समाज में सम्मान और आर्थिक समृद्धि लाता है।
  • अज्ञानता, निराशा और नकारात्मकता का नाश: मन से अज्ञानता, निरुत्साह, निराशा और नकारात्मक विचारों को दूर कर सकारात्मकता भरता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सूर्य ग्रहस्य बीज मंत्र जपं क्या है?
यह भगवान सूर्य को समर्पित एक शक्तिशाली उपासना विधि है, जिसका उद्देश्य सूर्य ग्रह के अशुभ प्रभावों को शांत करना और स्वास्थ्य, धन, आत्मविश्वास तथा आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करना है। इसमें आचमन, संकल्प, ध्यान, पंचपूजा और बीज मंत्र जप शामिल है।
इस मंत्र जप को कब और कैसे करना चाहिए?
इस जप को आमतौर पर रविवार को या सूर्योदय के समय शुरू करना शुभ माना जाता है। स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनकर, पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। संकल्प लें, ध्यान श्लोकों का पाठ करें, पंचपूजा करें और फिर बीज मंत्र का निर्धारित संख्या में (सामान्यतः 7000 या उसके गुणकों में) जप करें।
सूर्य ग्रहस्य बीज मंत्र जप के मुख्य लाभ क्या हैं?
यह जप सूर्य ग्रह पीड़ाओं को दूर करता है, उत्तम स्वास्थ्य, नेत्र ज्योति में सुधार और दीर्घायु प्रदान करता है। यह नेतृत्व क्षमता, आत्मविश्वास, साहस और निर्णय शक्ति को बढ़ाता है, तथा नौकरी, पद, सम्मान और धन-धान्य की प्राप्ति में सहायक है।
इस मंत्र जप को कौन कर सकता है?
सूर्य ग्रह दोषों से पीड़ित व्यक्ति, स्वास्थ्य समस्याओं (विशेषकर आँखों की) वाले, आत्मविश्वास की कमी महसूस करने वाले, करियर में उन्नति चाहने वाले और आध्यात्मिक विकास की इच्छा रखने वाले कोई भी इस जप को कर सकते हैं। गुरु के मार्गदर्शन में करना अधिक फलदायी होता है।
सूर्य बीज मंत्र का कितनी बार जप करना चाहिए?
सूर्य ग्रह के बीज मंत्र का पारंपरिक रूप से 7000 बार जप करने का सुझाव दिया जाता है, जिसे एक 'पुनश्चरण' माना जाता है। इसे एक साथ या चरणों में पूरा किया जा सकता है। अपनी संकल्प शक्ति और समय के अनुसार जप की संख्या निर्धारित कर सकते हैं।
इस मंत्र जप का मूल या पृष्ठभूमि क्या है?
सूर्य ग्रहस्य बीज मंत्र जप वैदिक और पौराणिक परंपराओं में वर्णित एक प्राचीन उपासना पद्धति है। यह नवग्रह शांति और सूर्य देव की कृपा प्राप्ति के लिए सदियों से प्रचलित है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा का कारक और राजत्व का अधिपति माना जाता है।

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