श्री सूर्य नामवर्णन स्तोत्रं (भविष्यपुराणे)
ब्रह्मोवाच |
नामभिः संस्तुतो देवो यैरर्कः परितुष्यति |
तानि ते कीर्तयाम्येष यथावदनुपूर्वशः || 1 ||
नमः सूर्याय नित्याय रवये कार्यभानवे |
भास्कराय मतंगाय मार्तंडाय विवस्वते || 2 ||
आदित्यायादिदेवाय नमस्ते रश्मिमालिने |
दिवाकराय दीप्ताय अग्नये मिहिराय च || 3 ||
प्रभाकराय मित्राय नमस्तेऽदितिसंभव |
नमो गोपतये नित्यं दिशां च पतये नमः || 4 ||
नमो धात्रे विधात्रे च अर्यम्णे वरुणाय च |
पूष्णे भगाय मित्राय पर्जन्यायांशवे नमः || 5 ||
नमो हितकृते नित्यं धर्माय तपनाय च |
हरये हरिताश्वाय विश्वस्य पतये नमः || 6 ||
विष्णवे ब्रह्मणे नित्यं त्र्यंबकाय तथात्मने |
नमस्ते सप्तलोकेश नमस्ते सप्तसप्तये || 7 ||
एकस्मै हि नमस्तुभ्यमेकचक्ररथाय च |
ज्योतिषां पतये नित्यं सर्वप्राणभृते नमः || 8 ||
हिताय सर्वभूतानां शिवायार्तिहराय च |
नमः पद्मप्रबोधाय नमो द्वादशमूर्तये || 9 || [वेदादिमूर्तये]
कविजाय नमस्तुभ्यं नमस्तारासुताय च |
भीमजाय नमस्तुभ्यं पावकाय च वै नमः || 10 ||
धिषणाय नमो नित्यं नमः कृष्णाय नित्यदा |
नमोऽस्त्वदितिपुत्राय नमो लक्ष्याय नित्यशः || 11 ||
एतान्यादित्यनामानि मया प्रोक्तानि वै पुरा |
आराधनाय देवस्य सर्वकामेन सुव्रत || 12 ||
सायं प्रातः शुचिर्भूत्वा यः पठेत्सुसमाहितः |
स प्राप्नोत्यखिलान् कामान् यथाहं प्राप्तवान् पुरा || 13 ||
प्रसादात्तस्य देवस्य भास्करस्य महात्मनः |
श्रीकामः श्रियमाप्नोति धर्मार्थी धर्ममाप्नुयात् || 14 ||
आतुरो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बंधनात् |
राज्यार्थी राज्यमाप्नोति कामार्थी काममाप्नुयात् || 15 ||
एतज्जप्यं रहस्यं च संध्योपासनमेव च |
एतेन जपमात्रेण नरः पापात् प्रमुच्यते || 16 ||
इति श्रीभविष्यमहापुराणे ब्राह्मे पर्वणि सप्तमीकल्पे ब्रह्मप्रोक्त सूर्य नाम वर्णनं नामैकसप्ततितमोऽध्यायः ||
अर्थ
यह “श्री सूर्य नामवर्णन स्तोत्रम्” भविष्यपुराण में ब्रह्माजी द्वारा स्वयं कथित एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है। इसमें सूर्यनारायण के अनेक नामों का क्रमबद्ध कीर्तन करते हुए, उनके विश्वरूप, शक्ति, करुणा और लोकपालन में उनकी भूमिका का वर्णन किया गया है। ब्रह्माजी ने सर्वप्रथम यह बताया है कि सूर्यदेव को नामों का पाठ किस प्रकार प्रसन्न करता है, और फिर उन नामों को श्रद्धापूर्वक समझाना प्रारंभ किया है।
इस स्तोत्र में 'सूर्य', 'रवि', 'भानुः', 'भास्कर', 'मार्तण्ड', 'विवस्वान' जैसे प्रसिद्ध नामों के साथ 'आदित्य', 'आदिदेव', 'रश्मिमाली', 'दिवाकर', 'मिहिर', 'अग्नये' जैसे तेजस्वी सूर्य के विभिन्न शक्तिरूपों का वर्णन किया गया है। सूर्य केवल एक ग्रह नहीं, बल्कि समस्त ब्रह्मांड को प्रकाश, ऊर्जा और जीवन प्रदान करने वाले परब्रह्म स्वरूप हैं। उनका प्रत्येक नाम उनके दिव्य गुणों, कार्यों और अनंत महिमा को प्रकट करता है।
सूर्यदेव को आकाश के ग्रहों का स्वामी, दिशाओं का अधिपति, धर्म का स्वरूप, तपन (शक्ति प्रदान करने वाला), विश्वपति, त्र्यंबक रूपी और जीवों में प्राणभाव को बनाए रखने वाला कहा गया है। सप्तलोकेश्वर, सप्तसप्ति (सात घोड़ों वाले रथ के देवता), ज्योतिषाम्पति (ग्रह-नक्षत्रों के अधिपति), हितकारी, शिवस्वरूप और समस्त लोकों के प्राणाधार के रूप में उनकी महिमा को यह स्तोत्र दृढ़ता से प्रस्तुत करता है।
यह स्तोत्र बालसूर्य से लेकर द्वादशादित्य के रूप तक, सूर्यदेव के द्वादशमूर्ति रूप और उनके अनेक शक्ति स्वरूपों को उजागर करता है। परमार्थ में सूर्य जीवों के बंधनों को दूर करने वाले, रोगों का निवारण करने वाले, पापों का क्षय करने वाले और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। फलश्रुति में ब्रह्माजी के वचन हैं कि जो व्यक्ति प्रतिदिन सुबह-शाम शुद्ध होकर इसका पाठ करता है, उसे सभी अभीष्ट सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
लाभ (Benefits):
- शारीरिक स्वास्थ्य और रोग निवारण: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है, रोगों का निवारण होता है और शारीरिक शक्ति में वृद्धि होती है।
- पाप क्षय और ग्रह पीड़ाओं से मुक्ति: सूर्यदेव के नामों का स्मरण करने से पूर्व जन्मों के पाप नष्ट होते हैं और नकारात्मक प्रभावों तथा ग्रह पीड़ाओं से मुक्ति मिलती है।
- समस्त पुरुषार्थों की प्राप्ति: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे जीवन के चार पुरुषार्थों को प्राप्त करने में यह स्तोत्र सहायता करता है।
- सफलता और नेतृत्व क्षमता: पाठ करने वाले को राज्य, विजय, सम्मान और नेतृत्व के गुण प्राप्त होते हैं, जिससे समाज में उच्च स्थान प्राप्त होता है।
- बंधनों और समस्याओं का निवारण: जीवन में आने वाले बंधनों, समस्याओं और शत्रुओं से उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों से सूर्यदेव की कृपा से मुक्ति मिलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री सूर्य नामवर्णन स्तोत्रम् क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री सूर्य नामवर्णन स्तोत्रम् के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
कौन इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल स्रोत क्या है?
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