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शनिवार व्रत कथा: शनि देव और राजा विक्रमादित्य की कहानी

संक्षेप में:शनिवार का व्रत शनि देव की प्रसन्नता और साढ़ेसाती-ढैया की पीड़ा शांत करने के लिए रखा जाता है। इसकी प्रसिद्ध कथा राजा विक्रमादित्य की है, जिन्होंने शनि को सबसे छोटा आसन देकर साढ़ेसाती के कष्ट झेले और आख़िरकार शनि देव की कृपा पाई।

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शनिवार का व्रत न्याय के देवता शनि देव के लिए रखा जाता है। किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले शनिवार से, खासकर श्रावण मास में, इसे शुरू करना अच्छा माना जाता है, और प्रायः 7, 19 या 51 शनिवार का संकल्प लिया जाता है। जिनकी कुंडली में साढ़ेसाती या ढैया चल रही हो, वे यह व्रत ज़्यादा रखते हैं। सरसों का तेल, काले तिल, उड़द और पीपल की पूजा इस दिन के मुख्य अंग हैं।

शनिवार व्रत कथा

एक बार नवों ग्रहों में बहस छिड़ गई कि हम में सबसे बड़ा कौन है। सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु, सब अपने-अपने को श्रेष्ठ बताने लगे। फ़ैसला न हुआ तो वे देवराज इंद्र के पास गए। इंद्र इस झगड़े में पड़ना नहीं चाहते थे। उन्होंने कहा, “पृथ्वी पर उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य बड़े न्यायप्रिय हैं, उन्हीं से निर्णय करवाइए।”

नवग्रह राजा विक्रमादित्य की सभा में पहुँचे। राजा ने सोच-समझकर नौ धातुओं के नौ आसन बनवाए: सोना, चाँदी, काँसा, पीतल, सीसा, राँगा, जस्ता, अभ्रक और सबसे आख़िर में लोहा। फिर कहा, “आप सब अपने-अपने आसन पर बैठ जाइए। जो जिस आसन पर बैठेगा, उसी क्रम से उसका स्थान माना जाएगा।” सबसे आख़िर में लोहे का आसन शनि देव के हिस्से आया।

शनि देव समझ गए कि राजा ने उन्हें सबसे छोटा माना है। वे क्रोध से बोले, “राजन, तुम मेरी शक्ति नहीं जानते। सूर्य एक राशि में एक महीना रहता है, चंद्रमा सवा दो दिन, पर मैं एक राशि में ढाई साल रहता हूँ और साढ़ेसाती में साढ़े सात साल तक मनुष्य की परीक्षा लेता हूँ। बड़े-बड़े देवता भी मेरी दृष्टि से नहीं बचे। अब तुम भी देखना।” इतना कहकर वे चले गए।

समय आया और राजा पर साढ़ेसाती शुरू हुई। शनि देव घोड़ों के सौदागर बनकर उज्जयिनी आए। उनके पास एक बहुत सुंदर घोड़ा था। राजा उसे परखने के लिए उस पर सवार हुए तो घोड़ा बिजली की तरह भागा और राजा को घने जंगल में ले जाकर गायब हो गया। राजा भटकते-भटकते भूखे-प्यासे एक अनजान नगर में पहुँचे।

वहाँ एक सेठ ने उन्हें थका-हारा परदेसी समझकर अपने घर बुला लिया। भोजन के समय सेठ किसी काम से बाहर गया। राजा ने देखा कि दीवार की एक खूँटी पर टँगा कीमती हार धीरे-धीरे खूँटी निगल रही है। देखते-देखते हार गायब हो गया। सेठ लौटा, हार न पाकर उसने राजा पर चोरी का आरोप लगाया। राजा ने सच बताया, पर किसी ने विश्वास नहीं किया।

मामला उस नगर के राजा के पास गया। उन्होंने चोर समझकर विक्रमादित्य के हाथ-पैर कटवा दिए और उन्हें सड़क पर छोड़ दिया गया। कुछ दिन बाद एक दयालु तेली उन्हें अपने घर ले गया और कोल्हू पर बैठा दिया, जहाँ वे आवाज़ लगाकर बैलों को हाँकते रहते। इसी तरह साढ़ेसाती के कठिन बरस बीतते गए।

जब साढ़ेसाती का अंत आया, एक रात वर्षा ऋतु में विक्रमादित्य मल्हार राग गाने लगे। उस नगर की राजकुमारी ने वह मधुर स्वर सुना और दासी को पता लगाने भेजा। पता चला कि गाने वाला एक अपंग व्यक्ति है। फिर भी राजकुमारी ने प्रण कर लिया कि वह उसी से विवाह करेगी। माता-पिता ने बहुत समझाया, पर वह नहीं मानी, और आख़िरकार दोनों का विवाह हो गया।

उसी रात शनि देव ने विक्रमादित्य को सपने में दर्शन दिए और पूछा, “राजन, अब मेरी शक्ति समझ आई?” राजा ने हाथ जोड़कर कहा, “महाराज, मैं आपकी महिमा मान गया। बस एक विनती है, जैसा कष्ट आपने मुझे दिया, वैसा किसी और को न दें।” शनि देव बोले, “जो मनुष्य शनिवार का व्रत रखेगा, मेरी कथा सुनेगा, पीपल को जल देगा और चींटियों को आटा डालेगा, उसे मैं कष्ट नहीं दूँगा।” सुबह उठे तो राजा के हाथ-पैर पहले जैसे हो चुके थे।

यह समाचार सेठ तक पहुँचा तो वह क्षमा माँगने आया और राजा को फिर भोजन पर बुलाया। सबके सामने उसी खूँटी ने निगला हुआ हार वापस उगल दिया। लज्जित सेठ ने अपनी बेटी का विवाह भी विक्रमादित्य से कर दिया। राजा दोनों रानियों के साथ उज्जयिनी लौटे, जहाँ प्रजा ने दीपों से स्वागत किया। राजा ने पूरे राज्य में घोषणा करवाई कि शनि देव सब ग्रहों में बड़े न्यायकारी हैं और हर कोई शनिवार का व्रत रखे और कथा सुने।

शनिवार व्रत की पूजा विधि

  1. शनिवार को सुबह नहाकर काले या गहरे नीले कपड़े पहनें और शनि देव के व्रत का संकल्प लें।
  2. पीपल के पेड़ की जड़ में जल चढ़ाएँ, सूत लपेटते हुए सात परिक्रमा करें।
  3. शनि मंदिर में या घर पर लोहे की शनि प्रतिमा पर सरसों का तेल चढ़ाएँ, काले तिल, नीले फूल, उड़द और लोहे की कील अर्पित करें।
  4. शाम को पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएँ और शनिवार व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  5. इसके बाद शनि चालीसा का पाठ करें और शनि देव की आरती गाएँ।
  6. सूर्यास्त के बाद एक बार भोजन करें, जिसमें उड़द की दाल या काले तिल की चीज़ें हों।

नियम और सावधानियाँ

  • शनिवार को लोहा, तेल, नमक और काले तिल खरीदना टाला जाता है, पर इनका दान अच्छा माना जाता है।
  • शनि देव की मूर्ति के ठीक सामने खड़े होकर आँखों में नहीं देखा जाता; थोड़ा बगल से दर्शन करें।
  • चींटियों को आटा, काले कुत्ते और कौवे को रोटी देना और किसी मज़दूर या ज़रूरतमंद की मदद करना शनि सेवा मानी जाती है।
  • उद्यापन में काले कपड़े, छाता, जूते, सरसों का तेल, उड़द और लोहे का बर्तन दान करें।

शनि देव का जन्मोत्सव शनि जयंती पर मनाया जाता है, और शनिवार को पड़ने वाली त्रयोदशी की तिथियाँ शनि त्रयोदशी पृष्ठ पर हैं। मान्यता है कि हनुमान जी के भक्तों को शनि नहीं सताते, इसलिए शनिवार को हनुमान चालीसा भी पढ़ी जाती है; मंगलवार व्रत कथा भी देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शनिवार का व्रत कितने शनिवार करना चाहिए?

प्रायः 7, 19 या 51 शनिवार का संकल्प लिया जाता है। साढ़ेसाती के दौरान कई लोग पूरी अवधि हर शनिवार व्रत रखते हैं।

शनिवार व्रत कथा में राजा कौन है?

कथा उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य की है, जिन्होंने नवग्रहों के विवाद में शनि देव को लोहे का अंतिम आसन दिया और फिर साढ़ेसाती के कष्ट झेले।

शनिवार को पीपल की पूजा क्यों होती है?

मान्यता है कि शनिवार को पीपल में जल चढ़ाने और उसके नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने से शनि देव प्रसन्न होते हैं।

शनिवार व्रत में क्या खाएँ?

सूर्यास्त के बाद एक बार भोजन किया जाता है, जिसमें उड़द की दाल, काले तिल या तिल के लड्डू शामिल किए जाते हैं।

शनिवार को क्या दान करें?

सरसों का तेल, काले तिल, उड़द, काला कपड़ा, जूते-चप्पल और लोहे की वस्तुएँ दान करना शुभ माना जाता है।