जय जय श्री शनिदेव आरती
संक्षेप में:जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी शनि देव की प्रचलित आरती है, जो शनिवार, शनि जयंती और शनि त्रयोदशी को गाई जाती है। इसमें शनि देव को सूर्य और छाया का पुत्र बताया गया है और उन्हें चढ़ने वाली चीज़ें गिनाई गई हैं।
पाठ
जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।
सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी॥
॥ जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी ॥
श्याम अंग वक्र दृष्टि चतुर्भुजा धारी।
नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी॥
॥ जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी ॥
क्रीट मुकुट शीश राजित दिपत है लिलारी।
मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी॥
॥ जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी ॥
मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी।
लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी॥
॥ जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी ॥
देव दनुज ऋषि मुनि सुमिरत नर नारी।
विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी॥
॥ जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी ॥
आरती का परिचय
शनि देव को न्याय और कर्मफल का देवता माना जाता है। उत्तर भारत में शनिवार की शाम पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीया जलाकर और शनि मंदिरों में तेल चढ़ाकर यही छोटी-सी आरती गाई जाती है। इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है। अंतिम पद में 'विश्वनाथ धरत ध्यान' आता है, जिसे कुछ लोग कवि की छाप मानते हैं और कुछ भगवान विश्वनाथ (शिव) का उल्लेख।
पहला पद: टेक
भक्तों का भला करने वाले श्री शनिदेव, आपकी जय हो। आप सूर्य देव के पुत्र हैं और छाया आपकी माता हैं।
दूसरा और तीसरा पद: शनि देव का रूप
आपका शरीर सांवला है, दृष्टि टेढ़ी है और आप चार भुजाएँ धारण करते हैं। नीले वस्त्र पहनते हैं और हाथी की सवारी करते हैं। सिर पर किरीट मुकुट है, माथा चमक रहा है और गले में मोतियों की माला शोभा पा रही है।
चौथा पद: भोग
आपको लड्डू, मिठाई, पान और सुपारी चढ़ाई जाती है। लोहा, तिल, तेल, उड़द और भैंस आपको बहुत प्रिय हैं। इसीलिए शनिवार को लोग काला तिल, सरसों का तेल, उड़द की दाल और लोहे की चीज़ें दान करते हैं।
पाँचवाँ पद
देवता, दानव, ऋषि, मुनि और सभी स्त्री-पुरुष आपका स्मरण करते हैं। विश्वनाथ आपका ध्यान धरते हैं और आपकी शरण में हैं।
पाठ-भेद
द्रिक पंचांग के पाठ में तीसरे पद में 'क्रीट मुकुट शीश सहज' और चौथे पद में 'मोदक और मिष्ठान चढ़े, चढ़ती पान सुपारी' मिलता है। भारतकोश के पाठ में छपाई की कुछ गलतियाँ ('श्याम अंक', 'सुमरिन') थीं, जिन्हें द्रिक पंचांग से मिलाकर 'श्याम अंग' और 'सुमिरत' किया गया है; 'शीश रजित' को उसके प्रचलित रूप 'शीश राजित' (सुशोभित) में लिखा गया है। बाकी पाठ भारतकोश का है।
कब और कैसे पढ़ें
हर शनिवार शाम पीपल या शनि शिला के पास सरसों के तेल का दीपक जलाकर, काले तिल और उड़द चढ़ाकर यह आरती गाएं। शनि जयंती (ज्येष्ठ अमावस्या) और शनि त्रयोदशी पर इसका विशेष महत्व है। शनिवार का व्रत रखने वाले पहले शनिवार व्रत कथा सुनते हैं। कई लोग शनिवार को हनुमान जी की आरती भी साथ में करते हैं, क्योंकि लोक-मान्यता है कि हनुमान भक्तों को शनि पीड़ा नहीं देते।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शनि देव की आरती कब करनी चाहिए?
हर शनिवार की शाम, और शनि जयंती व शनि त्रयोदशी पर। आरती सरसों के तेल के दीपक से करने का चलन है।
शनि देव के माता-पिता कौन हैं?
आरती के अनुसार शनि देव सूर्य देव के पुत्र हैं और उनकी माता छाया हैं।
शनि देव को क्या चढ़ाया जाता है?
आरती में बताया गया है कि लोहा, तिल, तेल और उड़द उन्हें प्रिय हैं। शनिवार को काले तिल, सरसों का तेल और उड़द चढ़ाने या दान करने की परंपरा है।
क्या शनिवार को हनुमान जी की पूजा भी करते हैं?
हाँ, लोक-मान्यता है कि हनुमान जी के भक्तों को शनि कष्ट नहीं देते, इसलिए शनिवार को दोनों की पूजा का चलन है।
