शनिबाधाविनाशाय घोरसंतापहारिणे ।
कानकालयवासाय भूतनाथाय ते नमः ॥1॥
दारिद्र्यजातान्रोगऽतीन्बुद्धिमांद्यादि संकटान् ।
क्षिप्रं नाशाय हे देवा शनिबाधाविनाशक ॥2॥
भूतबाधामहा दुःखमध्यवर्तिनमीशमां ।
पालय त्वं महाबाहो सर्वदुःखविनाशक ॥3॥
अवाच्यानि महादुःखान्यमेयानि निरंतरं ।
संभवंति दुरंतानि तानि नाशय मे प्रभो ॥4॥
मायामोहान्यनंतानि सर्वाणि करुणाकर ।
दूरीकुरु सदा भक्तहृदयानंददायक ॥5॥
अनेकजन्म संभूतांतापपापान्गुहेश्वर ।
चूर्णीकुरु कृपासिंधोसिंधुजाकांत संतते ॥6॥
उन्मत्तोत्भूत संतापकान् कृपान् महेश्वर ।
हस्तावलंबं दत्वं मां रक्ष रक्ष शनैश्चर ॥7॥
देहि मे बुद्धिवैशिष्ट्यं देहि मे नित्ययौवनं ।
देहि मे परमानंदं देव देव जगत्पते ॥8॥
इति श्रीशनिबाधा विमोचन शबरीश्वराष्टकं संपूर्णं ।
अर्थ
श्री शनिबाधा विमोचन शबरीश्वराष्टकं भगवान श्री अयप्पा स्वामी को समर्पित एक शक्तिशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र विशेष रूप से शनि ग्रह के दुष्प्रभावों, जीवन के दुखों और विभिन्न प्रकार की बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए रचा गया है। शबरीश्वर, जिन्हें अयप्पा स्वामी के नाम से जाना जाता है, भक्तों के सभी कष्टों को हरने वाले, शांति और आनंद प्रदान करने वाले देवता हैं। इस अष्टकम् का पाठ करने से न केवल शनि दोष से मुक्ति मिलती है, बल्कि यह गरीबी, रोग, मानसिक अशांति और भूत-प्रेत बाधाओं से भी रक्षा करता है।
इस अष्टकम् का पहला श्लोक शनि की पीड़ा को नष्ट करने वाले, भयंकर संतापों को हरने वाले, कानकालया में निवास करने वाले भूतनाथा अयप्पा को नमस्कार करता है। दूसरा श्लोक दरिद्रता, रोगों, बुद्धि की मंदता जैसे संकटों को शीघ्र नष्ट करने और शनि बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना करता है। तीसरा श्लोक भूत बाधाओं और महान दुःखों के बीच फंसे भक्त को बचाने के लिए, सभी दुःखों को नष्ट करने वाले महाबाहु अयप्पा से याचना करता है। चौथे श्लोक में, अकथनीय और निरंतर आने वाले असहनीय दुःखों को पूरी तरह से नष्ट करने के लिए प्रभु से निवेदन किया गया है।
पांचवें श्लोक में, माया और मोह से उत्पन्न होने वाले अनन्त बंधनों को दूर करने के लिए, भक्तों के हृदय में आनंद भरने वाले करुणाकर अयप्पा से प्रार्थना की जाती है। छठे श्लोक में, अनेक जन्मों से संचित पापों और तापों को नष्ट करने के लिए गुहेश्वर (कार्तिकेय के सार रूप) अयप्पा से प्रार्थना की जाती है, उन्हें सागर पुत्री लक्ष्मी के समान तेजस्वी बताया गया है। सातवें श्लोक में, उन्माद, भूत बाधा और दुःखों से बचाने के लिए, कृपा का हाथ बढ़ाकर, शनिदेव स्वरूप अयप्पा से रक्षा करने का आह्वान किया जाता है। अंत में, आठवें श्लोक में, बुद्धि की विशिष्टता, नित्य यौवन और परमानंद प्रदान करने के लिए देवों के देव, जगत्पति अयप्पा से निरंतर सुरक्षा की याचना की जाती है।
यह स्तोत्र भक्तों को शनि ग्रह के प्रतिकूल प्रभावों से मुक्ति दिलाने, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार लाने, आर्थिक कठिनाइयों से उबरने और आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने में मदद करता है। अयप्पा स्वामी की करुणा और शक्ति का आह्वान करके, भक्त सभी प्रकार के कष्टों से मुक्त होकर शांतिपूर्ण जीवन जी सकते हैं। इस अष्टकम् का नियमित पाठ करने से शनि दोष का प्रभाव कम होता है और शुभ फल प्राप्त होते हैं, ऐसी भक्तों की दृढ़ आस्था है।
लाभ (Benefits):
- शनि दोष निवारण: शनि ग्रह के कारण होने वाली बाधाओं, रुकावटों और नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति मिलती है।
- आर्थिक स्थिति में सुधार: दरिद्रता और आर्थिक संकट दूर होते हैं, जिससे समृद्धि और स्थिरता प्राप्त होती है।
- उत्तम स्वास्थ्य: रोगों, शारीरिक और मानसिक परेशानियों से छुटकारा मिलता है, जिससे अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त होता है।
- बुद्धि और यौवन: बुद्धि तेज होती है, मन प्रखर होता है, और नित्य यौवन तथा उत्साह प्राप्त होता है।
- मानसिक शांति और आनंद: माया, मोह, दुःख, उन्माद और भूत-प्रेत बाधाओं से मुक्ति मिलती है, जिससे परम शांति और आनंद का अनुभव होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री शनिबाधा विमोचन शबरीश्वराष्टकं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री शनिबाधा विमोचन शबरीश्वराष्टकं का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का उद्गम या पृष्ठभूमि क्या है?
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