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श्री हरिहरपुत्र सहस्रनाम अभिषेक मंत्रं

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प्राणापान-व्यानोदान-समाना मे शुध्यंतां ।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासग्ं स्वाहा ॥1॥

वाङ्मनश्चक्षुश्रोत्रजिह्वाघ्राणरेतोबुद्ध्याकूतिस्संकल्पा मे शुध्यंतां ।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासग्ं स्वाहा ॥2॥

त्वक्चर्म-माग्ंस-रुधिर-मेदो-मज्जा-स्नायवोऽस्थीनि मे शुध्यंतां ।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासग्ं स्वाहा ॥3॥

शिरःपाणि-पाद-पार्श्वपृष्ठोरूदर-जंघा-शिश्नोपस्थ-पायवो मे शुध्यंतां ।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासग्ं स्वाहा ॥4॥

पृथिव्यापस्तेजोवायुराकाशा मे शुध्यंतां ।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासग्ं स्वाहा ॥5॥

शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंधा मे शुध्यंतां ।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासग्ं स्वाहा ॥6॥

(मनो-बुद्ध्यहंकारश्वित्तं मे शुध्यंतां ।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासग्ं स्वाहा ॥
मनो-वाक्काय-कर्माणि मे शुध्यंतां ।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासग्ं स्वाहा ॥7॥

देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे अश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां
अश्विनो भेषज्येन तेजसे ब्रह्मवर्चसायाभिषिंचामि ॥8॥

देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे अश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां
सरस्वत्यै भेषज्येन वीर्यायान्नाद्यायाभिषिंचामि ॥9॥

देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे अश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां
इंद्रस्येंद्रियेण श्रियै यशसे बलायाभिषिंचामि ॥10॥

इति श्रीहरिहरपुत्रसहस्रनामाभिषेकमंत्रं संपूर्णं । 

अर्थ

श्री हरिहरपुत्र सहस्रनाम अभिषेक मंत्रं भगवान अयप्पा की आराधना में एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली मंत्र है। यह केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि भक्त के शरीर, मन और आत्मा को पूर्ण रूप से शुद्ध करने की एक समग्र प्रक्रिया है। अभिषेक के दौरान इस मंत्र का पाठ करने से, भक्त दिव्य ऊर्जा और तेज से भरा एक पवित्र पात्र बन जाता है। यह वैदिक परंपरा में गहराई से निहित है, जो आंतरिक और बाहरी शुद्धि के माध्यम से दिव्य अनुभव प्राप्त करने का मार्ग दिखाता है।

इस मंत्र का प्रत्येक भाग भक्त के अस्तित्व के विभिन्न स्तरों को शुद्ध करने के उद्देश्य से है। सर्वप्रथम, प्राणापान-व्यानोदान-समाना नामक पंच प्राण वायुओं को शुद्ध करके, शरीर में प्राण शक्ति को संतुलित किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप भक्त ज्योतिर्मय, पापरहित अवस्था को प्राप्त करता है। तत्पश्चात, वाक्, मन, चक्षु, श्रोत्र, जिह्वा, घ्राण, बुद्धि और संकल्प जैसी ज्ञानेंद्रियों और मन के कार्यों को पवित्र किया जाता है। यह बाहरी दुनिया की धारणा को शुद्ध करता है और आंतरिक जागरूकता को बढ़ाता है।

मंत्र आगे बढ़ते हुए, हमारे भौतिक शरीर के प्रत्येक घटक को शुद्ध करने पर ध्यान केंद्रित करता है। त्वक् (त्वचा), चर्म, मांस, रुधिर (रक्त), मेद, मज्जा, स्नायु और अस्थि (हड्डियां) – ये सभी सप्त धातुएं दिव्य ज्योति से भरकर पवित्र हो जाएं, ऐसी प्रार्थना की जाती है। सिर से पैर तक शरीर का प्रत्येक अंग पूर्णतः शुद्ध होकर, दिव्य शक्ति का वाहक बने, ऐसी मंत्र की कामना है। इसका उद्देश्य शरीर को केवल एक भौतिक अस्तित्व के रूप में न देखकर, उसे दिव्यता के मंदिर में परिवर्तित करना है।

इसके अतिरिक्त, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश नामक पंच महाभूतों तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध नामक पंच तन्मात्राओं को शुद्ध करने के लिए मंत्र प्रार्थना करता है। इसका अर्थ है कि हमारे अस्तित्व के मूलभूत तत्व और उनके माध्यम से हम जिस तरह से दुनिया का अनुभव करते हैं, वे भी पवित्र हो जाते हैं। मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त और हमारे वचन तथा कर्म भी पापरहित होकर दिव्य उद्देश्य के लिए समर्पित हों, ऐसा मंत्र संकल्प करता है। अंत में, सविता (सूर्य देव), अश्विनी देवता, पूषण, सरस्वती और इंद्र जैसे देवताओं का आशीर्वाद मांगा जाता है। यह ज्ञान, तेज, स्वास्थ्य, समृद्धि, शक्ति और विवेक को भक्त को प्रदान करता है।

लाभ (Benefits):

  • समग्र शुद्धि: शरीर, मन, आत्मा और इंद्रियों को पूर्णतः शुद्ध करके आंतरिक शांति और पवित्रता प्रदान करता है।
  • आध्यात्मिक जागरण: मंत्र के नियमित पाठ से सुप्त आध्यात्मिक शक्तियाँ जागृत होती हैं और दिव्य चेतना बढ़ती है।
  • दिव्य तेज और ज्ञान: भक्त ज्योतिर्मय, पापरहित होकर ज्ञान और विवेक प्राप्त करता है। सविता और सरस्वती के आशीर्वाद से बुद्धि तीव्र होती है।
  • नकारात्मक शक्तियों का निवारण: सभी प्रकार के पाप, नकारात्मक कर्म और विचार दूर होते हैं, और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • स्वास्थ्य और समृद्धि: पंच प्राणों, पंच महाभूतों और शारीरिक अंगों की शुद्धि से उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त होता है। इंद्र के आशीर्वाद से यश, शक्ति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री हरिहरपुत्र सहस्रनाम अभिषेक मंत्रं क्या है?
यह भगवान अयप्पा के अभिषेक के दौरान पढ़ा जाने वाला एक पवित्र मंत्र है, जिसका उद्देश्य शरीर, मन और आत्मा को पूरी तरह से शुद्ध करना है। यह वैदिक परंपरा का एक गहरा आध्यात्मिक अभ्यास है।
इस मंत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस मंत्र का पाठ आमतौर पर अयप्पा स्वामी के अभिषेक के समय, विशेषकर मंडल पूजा या मकरज्योति उत्सव के दौरान किया जाता है। इसे शुद्ध मन और भक्ति के साथ पढ़ना महत्वपूर्ण है।
श्री हरिहरपुत्र सहस्रनाम अभिषेक मंत्रं के प्रमुख लाभ क्या हैं?
इस मंत्र का पाठ करने से समग्र शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि होती है। यह दिव्य तेज, ज्ञान, उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि प्रदान करता है, साथ ही पापों का निवारण भी करता है।
इस मंत्र का पाठ कौन कर सकता है?
भगवान अयप्पा के भक्त, विशेष रूप से अभिषेक में भाग लेने वाले या आंतरिक शुद्धि और आध्यात्मिक प्रगति की इच्छा रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस मंत्र का पाठ कर सकता है। शुद्ध मन और भक्ति आवश्यक है।
इस मंत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
अभिषेक के संदर्भ में, मंत्र का पाठ आमतौर पर पुरोहितों या भक्तों द्वारा निर्धारित संख्या में (जैसे 11, 21, 108 बार) किया जाता है। व्यक्तिगत अभ्यास के लिए, इसे प्रतिदिन कुछ बार पढ़ा जा सकता है।
इस मंत्र का मूल या पृष्ठभूमि क्या है?
यह मंत्र वैदिक परंपरा से आता है और भगवान हरिहरपुत्र (अयप्पा) की पूजा में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसमें प्राण शक्ति, इंद्रियों और पंच महाभूतों की शुद्धि की प्राचीन अवधारणाएं शामिल हैं।

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