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वट सावित्री व्रत कथा: सावित्री, सत्यवान और यमराज

संक्षेप में:वट सावित्री व्रत उत्तर भारत में ज्येष्ठ अमावस्या को और महाराष्ट्र-गुजरात में ज्येष्ठ पूर्णिमा (वट पूर्णिमा) को रखा जाता है। कथा के अनुसार सावित्री ने बरगद के नीचे यमराज का पीछा करके, अपनी बुद्धि और पतिव्रत से पति सत्यवान के प्राण लौटा लिए थे।

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वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाएँ पति की लंबी उम्र और परिवार की ख़ुशहाली के लिए रखती हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और उत्तराखंड में यह ज्येष्ठ अमावस्या को होता है, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात और गोवा में पंद्रह दिन बाद ज्येष्ठ पूर्णिमा को, जिसे वट पूर्णिमा कहते हैं। दोनों में कथा एक ही है: सावित्री और सत्यवान की, जो महाभारत के वन पर्व में मार्कंडेय ऋषि युधिष्ठिर को सुनाते हैं। इस दिन बरगद (वट) के पेड़ की पूजा होती है, क्योंकि मान्यता है कि सावित्री ने इसी पेड़ के नीचे पति के प्राण वापस पाए थे।

वट सावित्री व्रत कथा

मद्र देश में अश्वपति नाम के धर्मात्मा राजा थे। उनके कोई संतान नहीं थी। संतान के लिए उन्होंने अठारह वर्ष तक देवी सावित्री की उपासना की। देवी प्रसन्न हुईं और उनके घर एक तेजस्वी कन्या का जन्म हुआ। देवी की कृपा से जन्मी इसलिए उसका नाम सावित्री रखा गया।

सावित्री बड़ी हुई तो उसका रूप और तेज ऐसा था कि कोई राजकुमार विवाह का प्रस्ताव लेकर आने का साहस नहीं करता था। तब राजा ने बेटी से कहा कि वह ख़ुद अपने योग्य वर चुन ले। सावित्री मंत्रियों के साथ तीर्थों और वनों में घूमी और लौटकर बोली, "पिताजी, शाल्व देश के राजा द्युमत्सेन अंधे हो गए हैं और शत्रुओं ने उनका राज्य छीन लिया है। वे पत्नी और बेटे के साथ वन में रहते हैं। उनके पुत्र सत्यवान को मैंने मन से पति चुन लिया है।"

उसी समय देवर्षि नारद वहाँ आए। उन्होंने कहा, "सत्यवान गुणों में अद्वितीय है, सच्चा, उदार और वीर। पर उसमें एक ही दोष है: आज से ठीक एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी।" राजा अश्वपति घबरा गए और बेटी से कोई और वर चुनने को कहा। सावित्री ने शांत होकर उत्तर दिया, "कन्यादान एक ही बार होता है। मैंने मन से जिसे चुन लिया, वही मेरे पति हैं।" नारद जी ने भी उसकी दृढ़ता देखकर विवाह का समर्थन किया।

विवाह हुआ। सावित्री ने राजसी गहने और कपड़े उतारकर वल्कल वस्त्र पहने और वन में सास-ससुर की सेवा करने लगी। वह सबके साथ प्रेम से रहती, पर नारद की बात उसके मन में दिन गिनती रही।

जब सत्यवान की मृत्यु में तीन दिन बचे, तो सावित्री ने तीन दिन का कठिन उपवास शुरू किया। चौथे दिन, जो वही नियत दिन था, सत्यवान कुल्हाड़ी लेकर लकड़ी काटने जंगल जाने लगा। सावित्री ने सास-ससुर से आज्ञा ली और ज़िद करके उसके साथ चल पड़ी।

जंगल में लकड़ी काटते-काटते सत्यवान के सिर में तेज़ दर्द उठा। वह बोला, "सावित्री, मुझसे खड़ा नहीं रहा जा रहा।" सावित्री उसे एक बड़े बरगद की छाँव में ले गई और उसका सिर अपनी गोद में रख लिया। कुछ ही देर में वहाँ लाल वस्त्र पहने, हाथ में पाश लिए एक तेजस्वी पुरुष प्रकट हुए। वे यमराज थे। उन्होंने सत्यवान के शरीर से अँगूठे जितना प्राण-पुरुष निकाला और दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े।

सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल दी। यमराज ने मुड़कर कहा, "लौट जाओ, पुत्री। तुमने पत्नी का धर्म पूरा निभा दिया। इसके आगे कोई जीवित मनुष्य नहीं आ सकता।" सावित्री ने विनम्रता से कहा, "जहाँ मेरे पति जाएँगे, वहीं मेरा धर्म है। सज्जनों के साथ सात कदम चलने से मित्रता हो जाती है।" फिर उसने धर्म पर ऐसी समझदारी भरी बातें कीं कि यमराज प्रसन्न हो गए।

यमराज बोले, "सत्यवान के प्राणों को छोड़कर कोई वर माँग लो।" सावित्री ने पहला वर माँगा कि उसके ससुर की आँखों की रोशनी और बल लौट आए। यमराज ने "तथास्तु" कहा और आगे बढ़े। सावित्री फिर भी पीछे चलती रही। दूसरे वर में उसने ससुर का खोया राज्य वापस माँगा। तीसरे वर में अपने पिता अश्वपति के लिए सौ पुत्र माँगे। हर बार यमराज वर देकर उसे लौटने को कहते, और हर बार सावित्री अपनी मीठी, धर्म भरी बातों से उन्हें और प्रसन्न कर देती।

आख़िर में यमराज ने फिर वर माँगने को कहा। सावित्री ने कहा, "मुझे सत्यवान से सौ पुत्र होने का वर दीजिए।" यमराज ने बिना सोचे "तथास्तु" कह दिया। तब सावित्री ने हाथ जोड़कर कहा, "महाराज, पति के बिना पुत्र कैसे होंगे? आपका वर तभी सच होगा जब आप मेरे पति को लौटा देंगे।" यमराज मुस्कुरा दिए। वे समझ गए कि इस स्त्री की निष्ठा और बुद्धि के आगे मृत्यु भी हार गई है। उन्होंने सत्यवान के प्राण लौटा दिए और उसे लंबी आयु का आशीर्वाद दिया।

सावित्री उसी बरगद के नीचे लौटी। सत्यवान ऐसे उठ बैठा जैसे लंबी नींद से जागा हो। दोनों आश्रम पहुँचे तो देखा कि द्युमत्सेन की आँखों की रोशनी लौट आई है। कुछ ही दिनों में शाल्व देश के मंत्री आए और बताया कि शत्रु मारा गया है और प्रजा अपने राजा को वापस बुला रही है। यमराज के सारे वर सच हुए।

तब से सुहागिनें सावित्री की याद में बरगद की पूजा करती हैं। बरगद लंबी आयु का प्रतीक है, और मान्यता है कि उसकी जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में शिव का वास है।

वट सावित्री पूजा विधि

  1. सुबह स्नान करके सोलह शृंगार करें और व्रत का संकल्प लें। कुछ महिलाएँ सावित्री की तरह त्रयोदशी से तीन दिन का व्रत रखती हैं, पर ज़्यादातर एक दिन का।
  2. पूजा की थाली में जल का लोटा, रोली, हल्दी, अक्षत, कच्चा सूत (कलावा या सफ़ेद धागा), भीगे चने, फल, पूड़ी-गुलगुले, बाँस का पंखा, फूल, धूप-दीप और सुहाग का सामान रखें।
  3. बरगद के पेड़ के पास जाकर उसकी जड़ में जल चढ़ाएँ, रोली-अक्षत लगाएँ और सावित्री-सत्यवान व यमराज का ध्यान करें। कई घरों में मिट्टी या चित्र से उनकी प्रतिमा बनाकर रखी जाती है।
  4. कच्चा सूत लपेटते हुए पेड़ की परिक्रमा करें। परंपरा में 7, 21 या 108 परिक्रमा का चलन है।
  5. पेड़ के नीचे बैठकर सब महिलाएँ मिलकर यह कथा सुनें। बाँस के पंखे से बरगद और पति को हवा करने की रस्म भी कई जगह होती है।
  6. पूजा के बाद भीगे चने, फल और कुछ पैसे बायना के रूप में सास या घर की बड़ी महिला को देकर पैर छुएँ। व्रत अपने कुल की रीति से, शाम को या अगले दिन, भीगे चने और जल लेकर खोलें।

नियम और सावधानियाँ

  • बरगद की टहनी तोड़कर घर लाने के बजाय पेड़ के पास जाकर पूजा करें। पास में पेड़ न हो तो गमले के बरगद या चित्र की पूजा भी मान्य है।
  • गर्भवती या बीमार महिलाएँ फलाहार और जल लेकर व्रत रख सकती हैं।
  • अमावस्या या पूर्णिमा, जो भी आपके परिवार की परंपरा हो, उसी दिन व्रत रखें; दोनों का फल समान माना जाता है।
  • पहली बार व्रत रखने वाली नई बहू को मायके से सुहाग का सामान और पंखा भेजने का चलन कई जगह है।

इस साल अमावस्या की तिथि और पूजा मुहूर्त वट सावित्री व्रत पृष्ठ पर देखें, और वट पूर्णिमा मानने वाले परिवार ज्येष्ठ पूर्णिमा का समय देखें। हर महीने की अमावस्या की सूची भी उपलब्ध है। सुहाग के एक और बड़े व्रत के लिए करवा चौथ व्रत कथा और पूर्णिमा के लिए पूर्णिमा व्रत कथा पढ़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वट सावित्री व्रत कब रखा जाता है?

उत्तर भारत में ज्येष्ठ अमावस्या को, और महाराष्ट्र, गुजरात व गोवा में ज्येष्ठ पूर्णिमा को, जिसे वट पूर्णिमा कहते हैं। कथा और पूजा दोनों में लगभग एक जैसी है।

वट सावित्री व्रत में बरगद की पूजा क्यों होती है?

मान्यता है कि सावित्री ने बरगद के नीचे ही यमराज से सत्यवान के प्राण वापस पाए थे। बरगद लंबी आयु का प्रतीक है और उसमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव का वास माना जाता है।

सावित्री ने यमराज से कौन-कौन से वर माँगे?

ससुर की आँखों की रोशनी, उनका खोया राज्य, अपने पिता के लिए सौ पुत्र और ख़ुद सत्यवान से सौ पुत्र। आख़िरी वर पूरा करने के लिए यमराज को सत्यवान को जीवित करना पड़ा।

वट सावित्री की कथा किस ग्रंथ में है?

यह कथा महाभारत के वन पर्व में है, जहाँ मार्कंडेय ऋषि युधिष्ठिर को पतिव्रता सावित्री की कहानी सुनाते हैं।

बरगद की कितनी परिक्रमा करनी चाहिए?

कच्चा सूत लपेटते हुए 7, 21 या 108 परिक्रमा करने का चलन है। अपने घर की परंपरा के अनुसार संख्या चुनें।