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पूर्णिमा व्रत कथा: धनेश्वर ब्राह्मण, देवदास और बत्तीस पूर्णिमा का व्रत

संक्षेप में:पूर्णिमा व्रत हर महीने शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को स्नान-दान, विष्णु पूजा और रात को चंद्र अर्घ्य के साथ रखा जाता है। घरों में इसकी सबसे प्रचलित कथा धनेश्वर ब्राह्मण के बेटे देवदास की है, जिसके प्राण माँ के बत्तीस पूर्णिमा व्रत से बचे।

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पूर्णिमा व्रत हर महीने शुक्ल पक्ष की पंद्रहवीं तिथि, यानी पूरे चाँद वाले दिन रखा जाता है। इस दिन सुबह स्नान-दान, दिन में भगवान विष्णु या सत्यनारायण की पूजा और रात को चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा है। उत्तर भारत में महीने का नाम ही पूर्णिमा से तय होता है, इसलिए हर पूर्णिमा अपने आप में एक छोटा पर्व है, और कार्तिक, माघ, वैशाख, आषाढ़ (गुरु पूर्णिमा) और आश्विन (शरद पूर्णिमा) की पूर्णिमा सबसे बड़ी मानी जाती हैं। पूर्णिमा व्रत की कोई एक पुराण-कथा नहीं है; घरों में जो कथा सबसे ज़्यादा पढ़ी जाती है, वह व्रत-कथा पुस्तकों में चली आ रही "बत्तीस पूर्णिमा" की लोक-कथा है, जिसे नीचे दिया गया है।

पूर्णिमा व्रत कथा

कथा-पुस्तकों के अनुसार एक बार माता यशोदा ने श्रीकृष्ण से पूछा कि कोई ऐसा व्रत बताओ जिससे स्त्री का सौभाग्य बना रहे और संतान सुरक्षित रहे। तब कृष्ण ने बत्तीस पूर्णिमाओं के व्रत की महिमा बताई और यह कथा सुनाई।

कांतिका नगर में धनेश्वर नाम का एक ब्राह्मण अपनी पत्नी रूपवती के साथ रहता था। घर में धन-धान्य की कमी न थी, पर संतान न होने का दुख दोनों को भीतर ही भीतर खाता रहता था। एक दिन नगर में एक योगी भिक्षा माँगने आए। उन्होंने हर घर से भिक्षा ली, पर धनेश्वर के घर से भिक्षा लेने से मना कर दिया, यह कहकर कि निःसंतान घर का अन्न वे नहीं लेते।

यह बात धनेश्वर के मन में चुभ गई। वह योगी के पीछे-पीछे गया, उनके पैर पकड़कर रो पड़ा और पूछा कि इस दुख का कोई उपाय है या नहीं। योगी का मन पिघला। उन्होंने कहा, "तुम दोनों चंडी देवी की आराधना करो और पूर्णिमा का व्रत रखो। हर पूर्णिमा पर दीपक जलाओ और हर बार एक दीपक बढ़ाते जाओ, जब तक बत्तीस न हो जाएँ। देवी की कृपा से तुम्हारी गोद भरेगी।"

धनेश्वर ने घर आकर रूपवती को सब बताया। दोनों ने श्रद्धा से देवी की पूजा शुरू की और पूर्णिमा का नियम लिया। देवी प्रसन्न हुईं और समय पर रूपवती ने एक सुंदर बेटे को जन्म दिया। उसका नाम देवदास रखा गया। कई कथाओं में आता है कि देवी ने वर के साथ ही यह संकेत भी दे दिया था कि बालक की आयु लंबी नहीं है, पर माता-पिता का पूर्णिमा व्रत उसकी रक्षा करेगा। रूपवती ने बेटे के जन्म के बाद भी व्रत नहीं छोड़ा।

देवदास बड़ा हुआ तो माता-पिता ने उसे मामा के साथ पढ़ने के लिए काशी भेजा। रास्ते में एक नगर में किसी कन्या का विवाह हो रहा था। ऐन मौके पर दूल्हा अचानक बीमार पड़ गया। लड़की वालों की लाज बचाने के लिए वर पक्ष ने देवदास से विनती की कि विवाह की रस्में वह निभा दे। मामा के कहने पर देवदास तैयार हो गया और विवाह संपन्न हुआ।

देवदास का मन साफ़ था। विदा होने से पहले उसने पत्नी को सच बता दिया कि वह पढ़ने काशी जा रहा है और उसकी आयु कम बताई गई है। पत्नी ने कहा कि जो भी हो, वह सुख-दुख में उसी की है। उसने देवदास को एक अँगूठी दी और कहा कि वह अपने आँगन में फूलों की एक क्यारी लगाएगी; जब तक फूल खिले रहेंगे, समझेगी कि पति सकुशल है, और फूल मुरझाए तो जानेगी कि उस पर संकट है।

काशी में पढ़ाई चलती रही। फिर वह रात आई जब देवदास की आयु पूरी होनी थी। एक विषैला साँप उसे डसने आया, पर माँ के व्रत के प्रभाव से उसका वार खाली गया। उसके बाद स्वयं यमराज प्राण लेने आए और देवदास अचेत होकर गिर पड़ा। उसी समय भगवान शिव और माता पार्वती उधर से गुज़र रहे थे। पार्वती जी ने कहा कि इस बालक की माँ ने बत्तीस पूर्णिमा का व्रत किया है, इसकी रक्षा कीजिए। शिवजी की कृपा से देवदास के प्राण लौट आए।

उधर पत्नी ने देखा कि क्यारी के फूल अचानक मुरझा गए हैं। वह बेचैन होकर प्रार्थना करने लगी। कुछ ही देर में फूल फिर पहले की तरह खिल उठे और वह समझ गई कि संकट टल गया। पढ़ाई पूरी होने पर देवदास मामा के साथ लौटा, रास्ते से अपनी पत्नी को साथ लिया और घर पहुँचा। धनेश्वर और रूपवती की आँखों से ख़ुशी के आँसू बहने लगे। तभी से माना जाता है कि श्रद्धा से रखा गया पूर्णिमा व्रत परिवार पर आने वाले संकट को टालता है।

पूर्णिमा पर और कौन-सी कथा पढ़ी जाती है

बहुत से परिवार हर पूर्णिमा को सत्यनारायण व्रत कथा कराते हैं; स्कन्द पुराण की उसी कथा में व्यापारी साधु पूर्णिमा और संक्रांति पर पूजा का नियम लेता है। आश्विन की शरद पूर्णिमा पर साहूकार की दो बेटियों वाली कथा और रात को चाँदनी में रखी खीर की परंपरा है, और कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान व दीपदान होता है, जिसे देव दीपावली भी कहते हैं।

पूर्णिमा व्रत पूजा विधि

  1. सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान हो सके तो उत्तम, नहीं तो नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिला लें।
  2. सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का संकल्प लें। दिन भर फलाहार रखें या एक समय सात्विक भोजन करें।
  3. भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करें: पीले फूल, तुलसी, पंचामृत, खीर या मिठाई का भोग। चाहें तो इसी दिन सत्यनारायण की कथा कराएँ।
  4. शाम को घी का दीपक जलाएँ। जो बत्तीस पूर्णिमा का संकल्प लेते हैं, वे हर पूर्णिमा पर दीपों की संख्या बढ़ाते जाते हैं।
  5. परिवार के साथ बैठकर पूर्णिमा व्रत की कथा सुनें।
  6. चंद्रोदय के बाद लोटे में जल, कच्चा दूध, अक्षत और सफ़ेद फूल डालकर चंद्रमा को अर्घ्य दें, फिर प्रसाद लेकर व्रत खोलें।

नियम और दान

  • पूर्णिमा पर अन्न, वस्त्र, गुड़, घी या सफ़ेद चीज़ों (चावल, दूध, चीनी) का दान शुभ माना जाता है।
  • सत्य बोलें, क्रोध और कटु वचन से बचें; यही इस व्रत का असली नियम है।
  • बत्तीस पूर्णिमा का संकल्प पूरा होने पर उद्यापन में ब्राह्मण भोजन, दान और कथा कराई जाती है।
  • पूर्णिमा की तिथि दो दिन पड़ जाए तो व्रत उस दिन रखा जाता है जिस शाम चंद्रोदय के समय पूर्णिमा हो; स्नान-दान अगली सुबह की उदया तिथि पर।

इस महीने की पूर्णिमा और चंद्रोदय का समय पूर्णिमा कैलेंडर और आज के पंचांग में देखें। शरद पूर्णिमा की पूरी कथा शरद पूर्णिमा व्रत कथा में है, और दीपदान की तिथि कार्तिक पूर्णिमा पृष्ठ पर मिलेगी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पूर्णिमा व्रत कब रखा जाता है?

हर महीने शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को। व्रत उस दिन रखा जाता है जिस शाम चंद्रोदय के समय पूर्णिमा तिथि हो।

पूर्णिमा व्रत की कथा किस ग्रंथ से है?

धनेश्वर-देवदास वाली बत्तीस पूर्णिमा की कथा व्रत-कथा पुस्तकों में चली आ रही लोक-कथा है, किसी एक पुराण से नहीं। पुराण आधारित कथा के लिए बहुत से लोग पूर्णिमा पर सत्यनारायण कथा पढ़ते हैं।

बत्तीस पूर्णिमा व्रत क्या है?

लगातार बत्तीस पूर्णिमाओं तक व्रत रखने का संकल्प, जिसमें हर पूर्णिमा पर दीपक जलाए जाते हैं। संकल्प पूरा होने पर उद्यापन किया जाता है।

पूर्णिमा पर चंद्रमा को अर्घ्य कैसे दें?

चंद्रोदय के बाद लोटे में जल, थोड़ा कच्चा दूध, अक्षत और सफ़ेद फूल डालकर चंद्रमा की ओर मुख करके धीरे-धीरे अर्घ्य दें।

साल की सबसे बड़ी पूर्णिमा कौन-सी हैं?

कार्तिक, माघ, वैशाख, आषाढ़ (गुरु पूर्णिमा) और आश्विन (शरद पूर्णिमा) की पूर्णिमा को विशेष माना जाता है।