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शरद पूर्णिमा व्रत कथा: साहूकार की दो बेटियाँ, चाँदनी की खीर और कोजागरी लक्ष्मी

संक्षेप में:शरद पूर्णिमा आश्विन महीने की पूर्णिमा है, जब रात भर चाँदनी में खीर रखकर सुबह प्रसाद के रूप में खाई जाती है और कोजागरी लक्ष्मी पूजा होती है। व्रत कथा में साहूकार की बड़ी बेटी ने पूर्णिमा का व्रत पूरा रखा और छोटी ने अधूरा, जिसका फल दोनों को अलग-अलग मिला; इसी से पूरा व्रत रखने की सीख मिलती है।

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शरद पूर्णिमा आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को आती है। मान्यता है कि साल में इसी रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है। घर-घर में खीर बनाकर रात भर खुली चाँदनी में रखी जाती है और अगली सुबह प्रसाद के रूप में बाँटी जाती है। इसी रात को कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं, जब माता लक्ष्मी की पूजा करके रात भर जागरण किया जाता है। ब्रज में इसे रास पूर्णिमा कहते हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण ने इसी रात गोपियों के साथ महारास किया था।

शरद पूर्णिमा व्रत कथा

बहुत समय पहले एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसकी दो बेटियाँ थीं। दोनों बहनें हर महीने पूर्णिमा का व्रत रखती थीं, पर दोनों के व्रत रखने के ढंग में बड़ा अंतर था।

बड़ी बेटी पूरे मन से व्रत रखती थी। वह दिन भर उपवास करती, शाम को भगवान की पूजा करती, कथा सुनती और चंद्रमा के निकलने पर उन्हें अर्घ्य देकर ही व्रत खोलती थी। छोटी बेटी व्रत तो रखती, पर उसे बीच में ही छोड़ देती। कभी भूख लगती तो दोपहर में कुछ खा लेती, कभी कहती कि चाँद निकलने तक कौन बैठा रहे। उसका व्रत हमेशा अधूरा रह जाता।

समय आने पर साहूकार ने दोनों बेटियों का विवाह कर दिया। बड़ी बेटी के घर स्वस्थ और सुंदर संतानें हुईं, परिवार में सुख-शांति रही। पर छोटी बेटी के साथ अजीब दुख होता रहा। उसके घर जो भी संतान होती, वह जन्म के कुछ ही दिनों में चल बसती। माँ बनकर भी वह बार-बार सूनी गोद लिए रह जाती।

दुखी होकर छोटी बेटी और उसके पति ने विद्वान पंडितों से इसका कारण पूछा। पंडितों ने ध्यान से उसकी बात सुनी और कहा, बेटी, तुमने पूर्णिमा के व्रत हमेशा अधूरे छोड़े हैं। व्रत का संकल्प लेकर उसे बीच में तोड़ देना ठीक नहीं होता। इसी कारण तुम्हें व्रत का पूरा फल नहीं मिल रहा। अब तुम विधि-विधान से पूर्णिमा का पूरा व्रत करो, ख़ासकर शरद पूर्णिमा का, तो तुम्हारा दुख दूर होगा।

छोटी बेटी ने पंडितों की बात मानी। उसने शरद पूर्णिमा का व्रत पूरे नियम से रखा, शाम को पूजा की और चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही अन्न ग्रहण किया। कुछ समय बाद उसके घर एक बेटा हुआ। पर दुर्भाग्य ने पीछा नहीं छोड़ा था; कुछ ही दिनों में वह बच्चा भी निर्जीव हो गया।

छोटी बेटी टूट गई, पर उसने हिम्मत नहीं हारी। उसके मन में एक विचार आया। उसने बच्चे को एक पीढ़े (लकड़ी की छोटी चौकी) पर लिटाया और ऊपर से कपड़ा ढक दिया। फिर वह अपनी बड़ी बहन को बुलाने गई और उसे घर ले आई। आदर से बैठने के लिए उसने वही पीढ़ा आगे कर दिया।

बड़ी बहन बैठने लगी तो उसके लहँगे का घेर बच्चे से छू गया। छूते ही बच्चा ज़ोर से रोने लगा। बड़ी बहन चौंककर खड़ी हो गई और नाराज़ होकर बोली, यह क्या कर रही थी तू? मुझे अपने ही बच्चे पर बिठाना चाहती थी? अगर इसे कुछ हो जाता तो सारा दोष मुझ पर आता।

छोटी बहन की आँखों में आँसू थे। उसने कहा, दीदी, यह बच्चा तो पहले ही मर चुका था। तुम्हारे पूरे किए हुए पूर्णिमा व्रतों का इतना पुण्य है कि तुम्हारे छूने भर से इसमें प्राण लौट आए। मैंने व्रत अधूरे छोड़कर जो भूल की, उसका दुख मैं भुगत रही थी। आज तुम्हारे पुण्य ने मेरी गोद भर दी।

बड़ी बहन ने उसे गले लगा लिया। इसके बाद छोटी बहन ने पूरे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि पूर्णिमा का व्रत कोई अधूरा न छोड़े, उसे पूरे नियम और श्रद्धा से करे। तभी से शरद पूर्णिमा का व्रत पूरा रखने और कथा सुनने की परंपरा चली आ रही है।

कोजागरी लक्ष्मी की कथा

एक दूसरी मान्यता के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात माता लक्ष्मी धरती पर विचरण करती हैं और पूछती हैं, "को जागर्ति?", यानी कौन जाग रहा है। जो भक्त रात में जागकर दीप जलाए उनका स्मरण कर रहा होता है, उसके घर वे धन-धान्य का आशीर्वाद देती हैं। इसी से इसका नाम कोजागरी पड़ा। बंगाल, ओडिशा और मिथिला में इस रात लक्ष्मी पूजा बड़े उत्साह से होती है; मिथिला में नवविवाहित वर के घर कोजागरा का विशेष उत्सव होता है।

शरद पूर्णिमा व्रत और पूजा विधि

  1. सुबह स्नान करके पूर्णिमा व्रत का संकल्प लें। दिन भर उपवास या फलाहार रखें।
  2. घर के मंदिर में लाल कपड़े पर माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की तस्वीर रखें। रोली, अक्षत, कमल या लाल फूल, धूप-दीप से पूजा करें।
  3. शाम को गाय के दूध में चावल और मिश्री डालकर खीर बनाएँ और पहले भगवान को भोग लगाएँ।
  4. चंद्रमा निकलने पर लोटे में जल, दूध और अक्षत लेकर चंद्र देव को अर्घ्य दें। फिर बैठकर शरद पूर्णिमा की कथा सुनें।
  5. खीर को जालीदार कपड़े से ढककर छत या आँगन में खुली चाँदनी में रख दें। कई घरों में रात भर लक्ष्मी जी के आगे घी का दीपक जलाकर जागरण और भजन होते हैं।
  6. अगली सुबह स्नान के बाद वह खीर पहले भगवान को अर्पित करें, फिर परिवार में प्रसाद के रूप में बाँटें।

नियम

  • व्रत का संकल्प लिया है तो उसे चंद्र अर्घ्य तक पूरा करें; यही इस कथा की सीख है। बीमार, बुज़ुर्ग या गर्भवती महिलाएँ फलाहार या दूध लेकर व्रत रख सकती हैं।
  • खीर को ढककर रखें ताकि उसमें कीड़े-मकोड़े न पड़ें।
  • इसी दिन महर्षि वाल्मीकि की जयंती भी मनाई जाती है, और कार्तिक स्नान भी इसी पूर्णिमा से शुरू होता है।

इस साल शरद पूर्णिमा की तिथि और चंद्रोदय का समय कोजागरी पूजा (शरद पूर्णिमा) पृष्ठ पर देखें। हर महीने की पूर्णिमा की सूची पूर्णिमा व्रत कैलेंडर में है, और सामान्य पूर्णिमा व्रत कथा अलग से पढ़ें। पूजा के बाद लक्ष्मी जी की आरती गाएँ; बहुत से परिवार इस दिन सत्यनारायण कथा भी करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शरद पूर्णिमा कब होती है?

शरद पूर्णिमा आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को होती है, जो आमतौर पर अक्टूबर में पड़ती है।

शरद पूर्णिमा पर खीर चाँदनी में क्यों रखते हैं?

मान्यता है कि इस रात चंद्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी किरणें अमृत जैसी होती हैं। इसलिए खीर रात भर चाँदनी में रखकर सुबह प्रसाद के रूप में खाई जाती है।

शरद पूर्णिमा व्रत कथा क्या है?

एक साहूकार की दो बेटियाँ पूर्णिमा का व्रत रखती थीं; बड़ी पूरा और छोटी अधूरा। छोटी की संतानें जीवित नहीं रहती थीं, पर पूरा व्रत करने और बड़ी बहन के पुण्य से उसका बेटा जीवित हो उठा।

कोजागरी पूर्णिमा का क्या अर्थ है?

को जागर्ति का अर्थ है कौन जाग रहा है। मान्यता है कि इस रात लक्ष्मी जी जागकर पूजा करने वालों के घर कृपा करती हैं।

शरद पूर्णिमा का व्रत कब खोलें?

चंद्रमा को अर्घ्य देने और कथा सुनने के बाद व्रत खोला जाता है। कई लोग चाँदनी में रखी खीर अगली सुबह ही ग्रहण करते हैं।