Bhaktise – भक्ति से

प्रदोष व्रत कथा: ब्राह्मणी, राजकुमार धर्मगुप्त और वार अनुसार प्रदोष

संक्षेप में:प्रदोष व्रत हर महीने दोनों पक्षों की त्रयोदशी को सूर्यास्त के समय शिवजी की पूजा के साथ रखा जाता है। इसकी कथा स्कन्द पुराण की है, जिसमें प्रदोष व्रत के प्रभाव से एक गरीब ब्राह्मणी के पाले हुए राजकुमार धर्मगुप्त को अपना खोया राज्य वापस मिलता है।

कोई रेटिंग नहीं
0 व्यूज़

प्रदोष व्रत भगवान शिव का व्रत है, जो हर महीने दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। पूजा सूर्यास्त के आसपास के लगभग डेढ़ घंटे के समय में होती है, जिसे प्रदोष काल कहते हैं। मान्यता है कि इस समय शिवजी कैलास पर प्रसन्न होकर नृत्य करते हैं और सब देवता उनकी स्तुति करते हैं। स्त्री-पुरुष दोनों यह व्रत रखते हैं, और जिस वार को त्रयोदशी पड़े, उसी के नाम से प्रदोष जाना जाता है, जैसे सोम प्रदोष या शनि प्रदोष।

प्रदोष व्रत कथा

यह कथा स्कन्द पुराण में आती है। एक गाँव में एक ब्राह्मणी रहती थी, जिसके पति का देहांत हो चुका था। घर में कमाने वाला कोई न था, इसलिए वह रोज़ सुबह अपने छोटे बेटे को साथ लेकर भिक्षा माँगने निकलती और शाम को जो मिलता, उसी से दोनों का पेट भरता।

एक दिन भिक्षा से लौटते समय नदी किनारे उसे एक बालक दिखाई दिया। कपड़े फटे थे, चेहरा उतरा हुआ, पर उसके रूप-रंग और बोलचाल में कुछ ऐसा था जो किसी साधारण घर का नहीं लगता था। ब्राह्मणी के पूछने पर वह कुछ ठीक से बता न सका, बस इतना कि उसका कोई नहीं है। ब्राह्मणी का मन पसीज गया। उसने सोचा, "जहाँ दो पेट भरते हैं, वहाँ तीसरा भी भर जाएगा," और उसे अपने घर ले आई।

वह बालक असल में विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। शत्रुओं ने उसके पिता को युद्ध में मार दिया था और राज्य पर कब्ज़ा कर लिया था। माँ भी इस दुख में चल बसी थीं, और राजकुमार जान बचाकर भटकता हुआ यहाँ तक पहुँचा था। ब्राह्मणी ने उसे अपने बेटे की तरह पाला। दोनों लड़के साथ खेलते, साथ खाते और साथ ही भिक्षा में माँ का हाथ बँटाते।

कुछ समय बाद ब्राह्मणी दोनों बच्चों को लेकर एक शिव मंदिर गई। वहाँ शांडिल्य ऋषि बैठे थे। उन्होंने राजकुमार को देखते ही पहचान लिया और ब्राह्मणी को उसकी पूरी कहानी सुनाई। फिर कहा, "बेटी, तुम तीनों प्रदोष का व्रत करो। त्रयोदशी की शाम शिवजी की पूजा करो। इसी से तुम्हारा भी कष्ट कटेगा और इस बालक का खोया हुआ भी लौटेगा।" ब्राह्मणी ने ऋषि से विधि सीखी और उसी दिन से तीनों नियम से प्रदोष रखने लगे।

कई प्रदोष बीते। एक दिन दोनों लड़के जंगल की ओर घूमने निकले। वहाँ एक सरोवर के पास कुछ गंधर्व कन्याएँ खेल रही थीं। ब्राह्मण का बेटा संकोच में वहीं से लौट आया, पर धर्मगुप्त वहीं रुक गया। उन कन्याओं में अंशुमती नाम की एक गंधर्व राजकुमारी थी। उसने धर्मगुप्त से बात की, उसका परिचय पूछा, और दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे। अंशुमती ने उसे अगले दिन अपने पिता से मिलने बुलाया।

उधर गंधर्व राज को रात में भगवान शिव ने स्वप्न में आदेश दिया कि अपनी बेटी का विवाह इसी राजकुमार से कर दो। अगले दिन जब धर्मगुप्त पहुँचा तो गंधर्व राज ने आदर से उसका स्वागत किया और अंशुमती का विवाह उससे कर दिया। साथ ही अपनी गंधर्व सेना भी उसके साथ भेजी।

उस सेना की मदद से धर्मगुप्त ने विदर्भ पर चढ़ाई की, शत्रुओं को हराया और अपने पिता का राज्य फिर से पा लिया। राजा बनने के बाद वह सबसे पहले उस ब्राह्मणी के पास गया जिसने उसे अनाथ अवस्था में अपनाया था। वह ब्राह्मणी और उसके बेटे को आदर के साथ राजमहल ले आया, ब्राह्मणी को माँ का स्थान दिया और उसके बेटे को अपने दरबार में ऊँचा पद दिया।

जब अंशुमती ने पूछा कि यह सब कैसे हुआ, तो धर्मगुप्त ने कहा कि यह उन प्रदोष व्रतों का फल है जो उसने ब्राह्मणी के साथ रखे थे। तभी से माना जाता है कि जो प्रदोष के दिन शिवजी की पूजा करके यह कथा सुनता है, उसके जीवन की बड़ी से बड़ी कमी भी समय आने पर पूरी होती है।

वार के अनुसार प्रदोष और उनका फल

परंपरा में हर वार के प्रदोष का अलग महत्व बताया गया है। नीचे वही मान्यताएँ हैं जो पुरानी व्रत-पुस्तकों में मिलती हैं:

प्रदोषवारमान्य फल
रवि प्रदोषरविवारआरोग्य और लंबी आयु
सोम प्रदोषसोमवारमनोकामना की पूर्ति, मन की शांति; शिवभक्तों में सबसे प्रिय
भौम प्रदोषमंगलवाररोग और कर्ज़ से राहत
बुध प्रदोषबुधवारकार्य सिद्धि और बुद्धि
गुरु प्रदोषगुरुवारशत्रु पर विजय, पितरों का आशीर्वाद
शुक्र प्रदोषशुक्रवारसौभाग्य और दाम्पत्य सुख
शनि प्रदोषशनिवारसंतान सुख; शनि की पीड़ा में राहत

प्रदोष व्रत पूजा विधि

  1. त्रयोदशी की सुबह स्नान करके शिवजी के सामने व्रत का संकल्प लें। दिन भर फलाहार रखें या केवल एक बार सात्विक भोजन करें।
  2. सूर्यास्त से पहले दोबारा स्नान करें या हाथ-पैर धोकर साफ़ कपड़े पहनें। उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुँह करके बैठें।
  3. प्रदोष काल में शिवलिंग पर जल, कच्चा दूध, दही, शहद और गंगाजल से अभिषेक करें। बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, सफ़ेद चंदन और अक्षत चढ़ाएँ।
  4. घी का दीपक जलाकर "ॐ नमः शिवाय" का जप करें। नंदी और माता पार्वती की भी पूजा करें।
  5. इसी समय परिवार के साथ बैठकर प्रदोष व्रत कथा सुनें या पढ़ें।
  6. शिवजी की आरती करें और प्रसाद बाँटें। कई घरों में व्रत उसी रात फलाहार से, और कई में अगले दिन सुबह खोला जाता है।

नियम और उद्यापन

  • पूजा का सही समय सूर्यास्त के आसपास है, सुबह की पूजा से प्रदोष का नियम पूरा नहीं माना जाता।
  • शिवलिंग पर तुलसी, हल्दी और केतकी का फूल न चढ़ाएँ।
  • प्रायः 11 या 26 प्रदोष का संकल्प लिया जाता है। संकल्प पूरा होने पर उद्यापन में हवन, ब्राह्मण भोजन और दान किया जाता है।
  • किसी विशेष कामना के लिए लोग उसी वार का प्रदोष चुनते हैं, जैसे संतान के लिए शनि प्रदोष।

इस महीने की त्रयोदशी और प्रदोष काल का समय प्रदोष व्रत कैलेंडर और आज के पंचांग में देखें। पूजा के बाद ॐ जय शिव ओंकारा आरती और शिव चालीसा का पाठ करें। शिवजी के दूसरे व्रतों के लिए सोमवार व्रत कथा और मासिक शिवरात्रि भी देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रदोष व्रत कब रखा जाता है?

हर महीने शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को, यानी महीने में दो बार। पूजा सूर्यास्त के आसपास के प्रदोष काल में होती है।

प्रदोष काल कितने समय का होता है?

आम तौर पर सूर्यास्त से कुछ पहले से लेकर सूर्यास्त के बाद तक लगभग डेढ़ घंटे का समय प्रदोष काल माना जाता है। सटीक समय अपने शहर के पंचांग से देखें।

सोम प्रदोष और शनि प्रदोष में क्या अंतर है?

सोमवार को पड़ने वाली त्रयोदशी सोम प्रदोष और शनिवार वाली शनि प्रदोष कहलाती है। परंपरा में सोम प्रदोष मनोकामना के लिए और शनि प्रदोष संतान सुख के लिए विशेष माना जाता है।

प्रदोष व्रत की कथा किस पुराण में है?

ब्राह्मणी और विदर्भ के राजकुमार धर्मगुप्त की यह कथा स्कन्द पुराण में मिलती है।

प्रदोष व्रत कितने रखने चाहिए?

अधिकतर लोग 11 या 26 प्रदोष का संकल्प लेते हैं और फिर उद्यापन करते हैं। कुछ लोग जीवन भर नियम से रखते हैं।